बे-सबब मुस्कुरा रहा है चाँद कोई साज़िश छुपा रहा है चाँद जाने किस की गली से निकला है झेंपा झेंपा सा आ रहा है चाँद कितना ग़ाज़ा लगाया है मुँह पर धूल ही धूल उड़ा रहा है चाँद कैसा बैठा है छुप के पत्तों में बाग़बाँ को सता रहा है चाँद सीधा-सादा उफ़ुक़ से निकला था सर पे अब चढ़ता जा रहा है चाँद छू के देखा तो गर्म था माथा धूप में खेलता रहा है चाँद
Related Ghazal
पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा
Fahmi Badayuni
96 likes
अपनी आँखों में भर कर ले जाने हैं मुझ को उस के आँसू काम में लाने है देखो हम कोई वहशी नइँ दीवाने हैं तुम सेे बटन खुलवाने नइँ लगवाने हैं हम तुम इक दूजे की सीढ़ी है जानाँ बाक़ी दुनिया तो साँपों के ख़ाने हैं पाक़ीज़ा चीज़ों को पाक़ीज़ा लिखो मत लिक्खो उस की आँखें मय-ख़ाने हैं
Varun Anand
63 likes
मैं ने चाहा तो नहीं था कि कभी ऐसा हो लेकिन अब ठान चुके हो तो चलो अच्छा हो तुम से नाराज़ तो मैं और किसी बात पे हूँ तुम मगर और किसी वजह से शर्मिंदा हो अब कहीं जा के ये मालूम हुआ है मुझ को ठीक रह जाता है जो शख़्स तेरे जैसा हो ऐसे हालात में हो भी कोई हस्सास तो क्या और बे-हिस भी अगर हो तो कोई कितना हो ताकि तू समझे कि मर्दों के भी दुख होते हैं मैं ने चाहा भी यही था कि तेरा बेटा हो
Jawwad Sheikh
50 likes
चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
406 likes
ये सात आठ पड़ोसी कहाँ से आए मेरे तुम्हारे दिल में तो कोई न था सिवाए मेरे किसी ने पास बिठाया बस आगे याद नहीं मुझे तो दोस्त वहाँ से उठा के लाए मेरे ये सोच कर न किए अपने दर्द उस के सुपुर्द वो लालची है असासे न बेच खाए मेरे इधर किधर तू नया है यहाँ कि पागल है किसी ने क्या तुझे क़िस्से नहीं सुनाए मेरे वो आज़माए मेरे दोस्त को ज़रूर मगर उसे कहो कि तरीके न आज़माए मेरे
Umair Najmi
59 likes
More from Gulzar
हर एक ग़म निचोड़ के हर इक बरस जिए दो दिन की ज़िंदगी में हज़ारों बरस जिए सदियों पे इख़्तियार नहीं था हमारा दोस्त दो चार लम्हे बस में थे दो चार बस जिए सहरा के उस तरफ़ से गए सारे कारवाँ सुन सुन के हम तो सिर्फ़ सदा-ए-जरस जिए होंटों में ले के रात के आँचल का इक सिरा आँखों पे रख के चाँद के होंटों का मस जिए महदूद हैं दुआएँ मिरे इख़्तियार में हर साँस पुर-सुकून हो तू सौ बरस जिए
Gulzar
3 likes
तुझ को देखा है जो दरिया ने इधर आते हुए कुछ भँवर डूब गए पानी में चकराते हुए हम ने तो रात को दाँतों से पकड़ कर रक्खा छीना-झपटी में उफ़ुक़ खुलता गया जाते हुए मैं न हूँगा तो ख़िज़ाँ कैसे कटेगी तेरी शोख़ पत्ते ने कहा शाख़ से मुरझाते हुए हसरतें अपनी बिलक्तीं न यतीमों की तरह हम को आवाज़ ही दे लेते ज़रा जाते हुए सी लिए होंट वो पाकीज़ा निगाहें सुन कर मैली हो जाती है आवाज़ भी दोहराते हुए
Gulzar
1 likes
जब भी आँखों में अश्क भर आए लोग कुछ डूबते नज़र आए अपना मेहवर बदल चुकी थी ज़मीं हम ख़ला से जो लौट कर आए चाँद जितने भी गुम हुए शब के सब के इल्ज़ाम मेरे सर आए चंद लम्हे जो लौट कर आए रात के आख़िरी पहर आए एक गोली गई थी सू-ए-फ़लक इक परिंदे के बाल-ओ-पर आए कुछ चराग़ों की साँस टूट गई कुछ ब-मुश्किल दम-ए-सहर आए मुझ को अपना पता-ठिकाना मिले वो भी इक बार मेरे घर आए
Gulzar
0 likes
ऐसा ख़ामोश तो मंज़र न फ़ना का होता मेरी तस्वीर भी गिरती तो छनाका होता यूँँ भी इक बार तो होता कि समुंदर बहता कोई एहसास तो दरिया की अना का होता साँस मौसम की भी कुछ देर को चलने लगती कोई झोंका तिरी पलकों की हवा का होता काँच के पार तिरे हाथ नज़र आते हैं काश ख़ुशबू की तरह रंग हिना का होता क्यूँँ मिरी शक्ल पहन लेता है छुपने के लिए एक चेहरा कोई अपना भी ख़ुदा का होता
Gulzar
3 likes
ज़िक्र आए तो मिरे लब से दुआएँ निकलें शम्अ''' जलती है तो लाज़िम है शुआएँ निकलें वक़्त की ज़र्ब से कट जाते हैं सब के सीने चाँद का छलका उतर जाए तो क़ाशें निकलें दफ़्न हो जाएँ कि ज़रख़ेज़ ज़मीं लगती है कल इसी मिट्टी से शायद मिरी शाख़ें निकलें चंद उम्मीदें निचोड़ी थीं तो आहें टपकीं दिल को पिघलाएँ तो हो सकता है साँसें निकलें ग़ार के मुँह पे रखा रहने दो संग-ए-ख़ुर्शीद ग़ार में हाथ न डालो कहीं रातें निकलें
Gulzar
2 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Gulzar.
Similar Moods
More moods that pair well with Gulzar's ghazal.







