ghazalKuch Alfaaz

भंग खाते हैं न गाँजा न चरस पीते हैं हम वो भंवरे हैं जो एहसास का रस पीते हैं आप इस ढंग से अमृत भी नहीं पी सकते जिस हुनर-मंदी से हम अश्क-ए-नफ़स पीते हैं सब यहीं छोड़ के जाना है ख़बर है लेकिन फिर ये हम किस लिए दुनिया की हवस पीते हैं जो तिरी याद के कीड़े हैं बदन के अंदर वो मिरी रूह को खाते हैं प्लस पीते हैं तब कहीं होता है इक शहद का छत्ता तय्यार अन-गिनत फूलों का ख़ूँ जब ये मगस पीते हैं आप इक बूँद भी पी लें तो ग़शी आ जाए ग़म के आँसू जो असीरान-ए-क़फ़स पीते हैं 'फ़ैज़' की फ़िक्र की बोतल में है जो ज़हर-ए-सुख़न देखना है की अभी कितने बरस पीते हैं

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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अपनी आँखों में भर कर ले जाने हैं मुझ को उस के आँसू काम में लाने है देखो हम कोई वहशी नइँ दीवाने हैं तुम सेे बटन खुलवाने नइँ लगवाने हैं हम तुम इक दूजे की सीढ़ी है जानाँ बाक़ी दुनिया तो साँपों के ख़ाने हैं पाक़ीज़ा चीज़ों को पाक़ीज़ा लिखो मत लिक्खो उस की आँखें मय-ख़ाने हैं

Varun Anand

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मैं ने चाहा तो नहीं था कि कभी ऐसा हो लेकिन अब ठान चुके हो तो चलो अच्छा हो तुम से नाराज़ तो मैं और किसी बात पे हूँ तुम मगर और किसी वजह से शर्मिंदा हो अब कहीं जा के ये मालूम हुआ है मुझ को ठीक रह जाता है जो शख़्स तेरे जैसा हो ऐसे हालात में हो भी कोई हस्सास तो क्या और बे-हिस भी अगर हो तो कोई कितना हो ताकि तू समझे कि मर्दों के भी दुख होते हैं मैं ने चाहा भी यही था कि तेरा बेटा हो

Jawwad Sheikh

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तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं तुझे हर बहाने से हम देखते हैं हमारी तरफ़ अब वो कम देखते हैं वो नज़रें नहीं जिन को हम देखते हैं ज़माने के क्या क्या सितम देखते हैं हमीं जानते हैं जो हम देखते हैं

Dagh Dehlvi

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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