bhaven tanti hain khanjar haath men hai tan ke baithe hain kisi se aaj bigdi hai ki vo yuun ban ke baithe hain dilon par saikdon sikke tire joban ke baithe hain kalejon par hazaron tiir is chitvan ke baithe hain ilahi kyuun nahin uthti qayamat majra kya hai hamare samne pahlu men vo dushman ke baithe hain ye gustakhi ye chhed achchhi nahin hai ai dil-e-nadan abhi phir ruuth jaenge abhi to man ke baithe hain asar hai jazb-e-ulfat men to khinch kar aa hi jaenge hamen parva nahin ham se agar vo tan ke baithe hain subuk ho jaenge gar jaenge vo bazm-e-dushman men ki jab tak ghar men baithe hain vo lakhon man ke baithe hain fusun hai ya dua hai ya muamma khul nahin sakta vo kuchh padhte hue aage mire madfan ke baithe hain bahut roya huun main jab se ye main ne khvab dekha hai ki aap aansu bahate samne dushman ke baithe hain khade hon zer-e-tuba vo na dam lene ko dam bhar bhi jo hasrat-mand tere saya-e-daman ke baithe hain talash-e-manzil-e-maqsad ki gardish uth nahin sakti kamar khole hue raste men ham rahzan ke baithe hain ye josh-e-girya to dekho ki jab furqat men roya huun dar o divar ik pal men mire madfan ke baithe hain nigah-e-shokh o chashm-e-shauq men dar-parda chhanti hai ki vo chilman men hain nazdik ham chilman ke baithe hain ye uthna baithna mahfil men un ka rang laega qayamat ban ke utthenge bhabuka ban ke baithe hain kisi ki shamat aaegi kisi ki jaan jaegi kisi ki taak men vo baam par ban-than ke baithe hain qasam de kar unhen ye puchh lo tum rang-dhang us ke tumhari bazm men kuchh dost bhi dushman ke baithe hain koi chhinta pade to 'daghh' kalkatte chale jaaen azimabad men ham muntazir savan ke baithe hain bhawen tanti hain khanjar hath mein hai tan ke baithe hain kisi se aaj bigdi hai ki wo yun ban ke baithe hain dilon par saikdon sikke tere joban ke baithe hain kalejon par hazaron tir is chitwan ke baithe hain ilahi kyun nahin uthti qayamat majra kya hai hamare samne pahlu mein wo dushman ke baithe hain ye gustakhi ye chhed achchhi nahin hai ai dil-e-nadan abhi phir ruth jaenge abhi to man ke baithe hain asar hai jazb-e-ulfat mein to khinch kar aa hi jaenge hamein parwa nahin hum se agar wo tan ke baithe hain subuk ho jaenge gar jaenge wo bazm-e-dushman mein ki jab tak ghar mein baithe hain wo lakhon man ke baithe hain fusun hai ya dua hai ya muamma khul nahin sakta wo kuchh padhte hue aage mere madfan ke baithe hain bahut roya hun main jab se ye main ne khwab dekha hai ki aap aansu bahate samne dushman ke baithe hain khade hon zer-e-tuba wo na dam lene ko dam bhar bhi jo hasrat-mand tere saya-e-daman ke baithe hain talash-e-manzil-e-maqsad ki gardish uth nahin sakti kamar khole hue raste mein hum rahzan ke baithe hain ye josh-e-girya to dekho ki jab furqat mein roya hun dar o diwar ek pal mein mere madfan ke baithe hain nigah-e-shokh o chashm-e-shauq mein dar-parda chhanti hai ki wo chilman mein hain nazdik hum chilman ke baithe hain ye uthna baithna mahfil mein un ka rang laega qayamat ban ke utthenge bhabuka ban ke baithe hain kisi ki shamat aaegi kisi ki jaan jaegi kisi ki tak mein wo baam par ban-than ke baithe hain qasam de kar unhen ye puchh lo tum rang-dhang us ke tumhaari bazm mein kuchh dost bhi dushman ke baithe hain koi chhinta pade to 'dagh' kalkatte chale jaen azimabaad mein hum muntazir sawan ke baithe hain
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है
Shabeena Adeeb
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
Tehzeeb Hafi
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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ख़ातिर से या लिहाज़ से मैं मान तो गया झूटी क़सम से आप का ईमान तो गया दिल ले के मुफ़्त कहते हैं कुछ काम का नहीं उल्टी शिकायतें हुईं एहसान तो गया डरता हूँ देख कर दिल-ए-बे-आरज़ू को मैं सुनसान घर ये क्यूँँ न हो मेहमान तो गया क्या आए राहत आई जो कुंज-ए-मज़ार में वो वलवला वो शौक़ वो अरमान तो गया देखा है बुत-कदे में जो ऐ शैख़ कुछ न पूछ ईमान की तो ये है कि ईमान तो गया इफ़्शा-ए-राज़-ए-इश्क़ में गो ज़िल्लतें हुईं लेकिन उसे जता तो दिया जान तो गया गो नामा-बर से ख़ुश न हुआ पर हज़ार शुक्र मुझ को वो मेरे नाम से पहचान तो गया बज़्म-ए-अदू में सूरत-ए-परवाना दिल मिरा गो रश्क से जला तिरे क़ुर्बान तो गया होश ओ हवा से ओ ताब ओ तवाँ 'दाग़' जा चुके अब हम भी जाने वाले हैं सामान तो गया
Dagh Dehlvi
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इस अदास वो जफ़ा करते हैं कोई जाने कि वफ़ा करते हैं यूँँ वफ़ा अहद-ए-वफ़ा करते हैं आप क्या कहते हैं क्या करते हैं हम को छेड़ोगे तो पछताओगे हँसने वालों से हँसा करते हैं नामा-बर तुझ को सलीक़ा ही नहीं काम बातों में बना करते हैं चलिए आशिक़ का जनाज़ा उट्ठा आप बैठे हुए क्या करते हैं ये बताता नहीं कोई मुझ को दिल जो आता है तो क्या करते हैं हुस्न का हक़ नहीं रहता बाक़ी हर अदा में वो अदा करते हैं तीर आख़िर बदल-ए-काफ़िर है हम अख़ीर आज दुआ करते हैं रोते हैं ग़ैर का रोना पहरों ये हँसी मुझ से हँसा करते हैं इस लिए दिल को लगा रक्खा है इस में महबूब रहा करते हैं तुम मिलोगे न वहाँ भी हम से हश्र से पहले गिला करते हैं झाँक कर रौज़न-ए-दर से मुझ को क्या वो शोख़ी से हया करते हैं उस ने एहसान जता कर ये कहा आप किस मुँह से गिला करते हैं रोज़ लेते हैं नया दिल दिलबर नहीं मालूम ये क्या करते हैं 'दाग़' तू देख तो क्या होता है जब्र पर सब्र किया करते हैं
Dagh Dehlvi
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दिल को क्या हो गया ख़ुदा जाने क्यूँँ है ऐसा उदास क्या जाने अपने ग़म में भी उस को सरफ़ा है न खिला जाने वो न खा जाने इस तजाहुल का क्या ठिकाना है जान कर जो न मुद्दआ' जाने कह दिया मैं ने राज़-ए-दिल अपना उस को तुम जानो या ख़ुदा जाने क्या ग़रज़ क्यूँँ इधर तवज्जोह हो हाल-ए-दिल आप की बला जाने जानते जानते ही जानेगा मुझ में क्या है अभी वो क्या जाने क्या हम उस बद-गुमाँ से बात करें जो सताइश को भी गिला जाने तुम न पाओगे सादा-दिल मुझ सा जो तग़ाफ़ुल को भी हया जाने है अबस जुर्म-ए-इश्क़ पर इल्ज़ाम जब ख़ता-वार भी ख़ता जाने नहीं कोताह दामन-ए-उम्मीद आगे अब दस्त-ए-ना-रसा जाने जो हो अच्छा हज़ार अच्छों का वाइ'ज़ उस बुत को तू बुरा जाने की मिरी क़द्र मिस्ल-ए-शाह-ए-दकन किसी नव्वाब ने न राजा ने उस से उट्ठेगी क्या मुसीबत-ए-इश्क़ इब्तिदा को जो इंतिहा जाने 'दाग़' से कह दो अब न घबराओ काम अपना बता हुआ जाने
Dagh Dehlvi
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ये बात बात में क्या नाज़ुकी निकलती है दबी दबी तिरे लब से हँसी निकलती है ठहर ठहर के जला दिल को एक बार न फूँक कि इस में बू-ए-मोहब्बत अभी निकलती है बजाए शिकवा भी देता हूँ मैं दुआ उस को मिरी ज़बाँ से करूँँ क्या यही निकलती है ख़ुशी में हम ने ये शोख़ी कभी नहीं देखी दम-ए-इताब जो रंगत तिरी निकलती है हज़ार बार जो माँगा करो तो क्या हासिल दुआ वही है जो दिल से कभी निकलती है अदास तेरी मगर खिंच रहीं हैं तलवारें निगह निगह से छुरी पर छुरी निकलती है मुहीत-ए-इश्क़ में है क्या उमीद ओ बीम मुझे कि डूब डूब के कश्ती मिरी निकलती है झलक रही है सर-ए-शाख़-ए-मिज़ा ख़ून की बूँद शजर में पहले समर से कली निकलती है शब-ए-फ़िराक़ जो खोले हैं हम ने ज़ख़्म-ए-जिगर ये इंतिज़ार है कब चाँदनी निकलती है समझ तो लीजिए कहने तो दीजिए मतलब बयाँ से पहले ही मुझ पर छुरी निकलती है ये दिल की आग है या दिल के नूर का है ज़ुहूर नफ़स नफ़स में मिरे रौशनी निकलती है कहा जो मैं ने कि मर जाऊँगा तो कहते हैं हमारे ज़ाइचे में ज़िंदगी निकलती है समझने वाले समझते हैं पेच की तक़रीर कि कुछ न कुछ तिरी बातों में फ़ी निकलती है दम-ए-अख़ीर तसव्वुर है किस परी-वश का कि मेरी रूह भी बन कर परी निकलती है सनम-कदे में भी है हुस्न इक ख़ुदाई का कि जो निकलती है सूरत परी निकलती है मिरे निकाले न निकलेगी आरज़ू मेरी जो तुम निकालना चाहो अभी निकलती है ग़म-ए-फ़िराक़ में हो 'दाग़' इस क़दर बेताब ज़रा से रंज में जाँ आप की निकलती है
Dagh Dehlvi
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इस नहीं का कोई इलाज नहीं रोज़ कहते हैं आप आज नहीं कल जो था आज वो मिज़ाज नहीं इस तलव्वुन का कुछ इलाज नहीं आइना देखते ही इतराए फिर ये क्या है अगर मिज़ाज नहीं ले के दिल रख लो काम आएगा गो अभी तुम को एहतियाज नहीं हो सकें हम मिज़ाज-दाँ क्यूँँकर हम को मिलता तिरा मिज़ाज नहीं चुप लगी लाल-ए-जाँ-फ़ज़ा को तिरे इस मसीहा का कुछ इलाज नहीं दिल-ए-बे-मुद्दआ ख़ुदा ने दिया अब किसी शय की एहतियाज नहीं खोटे दामों में ये भी क्या ठहरा दिरहम-ए-'दाग़' का रिवाज नहीं बे-नियाज़ी की शान कहती है बंदगी की कुछ एहतियाज नहीं दिल-लगी कीजिए रक़ीबों से इस तरह का मिरा मिज़ाज नहीं इश्क़ है पादशाह-ए-आलम-गीर गरचे ज़ाहिर में तख़्त-ओ-ताज नहीं दर्द-ए-फ़ुर्क़त की गो दवा है विसाल इस के क़ाबिल भी हर मिज़ाज नहीं यास ने क्या बुझा दिया दिल को कि तड़प कैसी इख़्तिलाज नहीं हम तो सीरत-पसंद आशिक़ हैं ख़ूब-रू क्या जो ख़ुश-मिज़ाज नहीं हूर से पूछता हूँ जन्नत में इस जगह क्या बुतों का राज नहीं सब्र भी दिल को 'दाग़' दे लेंगे अभी कुछ इस की एहतियाज नहीं
Dagh Dehlvi
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