चाहता ये हूँ कि बेनाम-ओ-निशाँ हो जाऊँ शाम की तरह जलूँ और धुआँ हो जाऊँ पहले दहलीज़ पे रौशन करूँँ आँखों के चराग़ और फिर ख़ुद किसी पर्दे में निहाँ हो जाऊँ तोड़ कर फेंक दूँ ये फ़िरक़ा-परस्ती के महल और पेशानी पे सज्दे का निशाँ हो जाऊँ दिल से फिर दर्द महकने की सदाएँ उट्ठें काश ऐसा हो मैं तेरी रग-ए-जाँ हो जाऊँ बस तिरे ज़िक्र में कट जाएँ मिरे रोज़-ओ-शब नूर की शाख़ पे चिड़ियों की ज़बाँ हो जाऊँ ख़ाक जिस कूचे की मलते हैं फ़रिश्ते आ कर मैं उसी ख़ाक के ज़र्रों में निहाँ हो जाऊँ मेरी आवारा-मिज़ाजी को सुकूँ मिल जाए दर्द बन कर तिरे सीने में रवाँ हो जाऊँ
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो
Jaun Elia
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दिल में हसरत कोई बची ही नहीं आग ऐसी लगी बुझी ही नहीं उस ने जब ख़ुद को बे-नक़ाब किया फिर किसी की नज़र उठी ही नहीं जैसा इस बार खुल के रोए हम ऐसी बारिश कभी हुई ही नहीं ज़िंदगी को गले लगाते क्या ज़िंदगी उम्र-भर मिली ही नहीं मुंतज़िर कब से चाँद छत पर है कोई खिड़की अभी खुली ही नहीं मैं जिसे अपनी ज़िंदगी समझा सच तो ये है वो मेरी थी ही नहीं
Azm Shakri
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जितना तेरा हुक्म था उतनी सँवारी ज़िंदगी अपनी मर्ज़ी से कहाँ हम ने गुज़ारी ज़िंदगी मेरे अंदर इक नया ग़म रोज़ रख जाता है कौन रफ़्ता रफ़्ता हो रही है और भारी ज़िंदगी रूह की तस्कीन के सारे दरीचे खुल गए दर्द के पहलू में जब आई हमारी ज़िंदगी सिर्फ़ थी ख़ाना-बदोशी या मोहब्बत का जुनूँ हिजरतें करता रहा इक शख़्स सारी ज़िंदगी एक लफ़्ज़-ए-कुन कहा आबाद सन्नाटे हुए आसमानों से ज़मीनों पर उतारी ज़िंदगी
Azm Shakri
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ये मत कहो कि भीड़ में तन्हा खड़ा हूँ मैं टकरा के आबगीने से पत्थर हुआ हूँ मैं आँखों के जंगलों में मुझे मत करो तलाश दामन पे आँसुओं की तरह आ गया हूँ मैं यूँँ बे-रुख़ी के साथ न मुँह फेर के गुज़र ऐ साहब-ए-जमाल तिरा आइना हूँ मैं यूँँ बार बार मुझ को सदाएँ न दीजिए अब वो नहीं रहा हूँ कोई दूसरा हूँ मैं मेरी बुराइयों पे किसी की नज़र नहीं सब ये समझ रहे हैं बड़ा पारसा हूँ मैं वो बे-वफ़ा समझता है मुझ को उसे कहो आँखों में उस के ख़्वाब लिए फिर रहा हूँ मैं
Azm Shakri
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ख़ून आँसू बन गया आँखों में भर जाने के बा'द आप आए तो मगर तूफ़ाँ गुज़र जाने के बा'द चाँद का दुख बाँटने निकले हैं अब अहल-ए-वफ़ा रौशनी का सारा शीराज़ा बिखर जाने के बा'द होश क्या आया मुसलसल जल रहा हूँ हिज्र में इक सुनहरी रात का नश्शा उतर जाने के बा'द ज़ख़्म जो तुम ने दिया वो इस लिए रक्खा हरा ज़िंदगी में क्या बचेगा ज़ख़्म भर जाने के बा'द शाम होते ही चराग़ों से तुम्हारी गुफ़्तुगू हम बहुत मसरूफ़ हो जाते हैं घर जाने के बा'द ज़िंदगी के नाम पर हम उमर भर जीते रहे ज़िंदगी को हम ने पाया भी तो मर जाने के बा'द
Azm Shakri
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ज़िंदगी यूँँ भी गुज़ारी जा रही है जैसे कोई जंग हारी जा रही है जिस जगह पहले के ज़ख़्मों के निशाँ में फिर वहीं पर चोट मारी जा रही है वक़्त-ए-रुख़्सत आब-दीदा आप क्यूँँ हैं जिस्म से तो जाँ हमारी जा रही है बोल कर ता'रीफ़ में कुछ लफ़्ज़ उस की शख़्सियत अपनी निखारी जा रही है धूप के दस्ताने हाथों में पहन कर बर्फ़ की चादर उतारी जा रही है
Azm Shakri
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