ghazalKuch Alfaaz

चलती साँसों को जाम करने लगा वो नज़र से कलाम करने लगा रात फ़रहाद ख़्वाब में आया और फ़र्शी सलाम करने लगा फिर मैं ज़हरीले कार-ख़ानों में ज़िंदा रहने का काम करने लगा साफ़ इनकार कर नहीं पाया वो मिरा एहतिराम करने लगा लैला घर में सिलाई करने लगी क़ैस दिल्ली में काम करने लगा हिज्र के माल से दिल-ए-नादाँ वस्ल का इंतिज़ाम करने लगा

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जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो

Tehzeeb Hafi

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जाम सिगरेट कश और बस कुछ धुआँ आख़िरश और बस मौत तक ज़िंदगी का सफ़र रात-दिन कश्मकश और बस पी गया पेड़ आँधी मगर गिर पड़ा खा के ग़श और बस ज़िंदगी जलती सिगरेट है सिर्फ़ दो-चार कश और बस सूखते पेड़ की लकड़ियाँ आख़िरी पेशकश और बस

Sandeep Thakur

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इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए

Khumar Barabankvi

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बिछड़ कर उस का दिल लग भी गया तो क्या लगेगा वो थक जाएगा और मेरे गले से आ लगेगा मैं मुश्किल में तुम्हारे काम आऊँ या ना आऊँ मुझे आवाज़ दे लेना तुम्हें अच्छा लगेगा मैं जिस कोशिश से उस को भूल जाने में लगा हूँ ज़्यादा भी अगर लग जाए तो हफ़्ता लगेगा

Tehzeeb Hafi

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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सहराओं ने माँगा पानी दरियाओं पर बरसा पानी बुनियादें कमज़ोर नहीं थीं दीवारों से आया पानी आख़िर किस किस नीम की जड़ में कब तक डालें मीठा पानी छत का हाल बता देता है परनाले से गिरता पानी फ़िक्र-ओ-मसाइल याद-ए-जानाँ गर्म हवाएँ ठंडा पानी प्यासे बच्चे खेल रहे हैं मछली मछली कितना पानी

Fahmi Badayuni

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जब रेतीले हो जाते हैं पर्वत टीले हो जाते हैं तोड़े जाते हैं जो शीशे वो नोकीले हो जाते हैं बाग़ धुएँ में रहता है तो फल ज़हरीले हो जाते हैं नादारी में आग़ोशों के बंधन ढीले हो जाते हैं फूलों को सुर्ख़ी देने में पत्ते पीले हो जाते हैं

Fahmi Badayuni

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चारासाज़ों के बस की बात नहीं मैं दवाओं के बस की बात नहीं चाहता हूँ मैं दीमकों से नजात जो किताबों के बस की बात नहीं तेरी ख़ुशबू को क़ैद में रखना इत्रदानों के बस की बात नहीं ख़त्म कर दे अज़ाब क़ब्रों का ताज-महलों के बस की बात नहीं आँसुओं में जो झिलमिलाहट है वो सितारों के बस की बात नहीं ऐसा लगता है अब तेरा दीदार सिर्फ़ आँखों के बस की बात नहीं

Fahmi Badayuni

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दिल जब ख़ाली हो जाता है और भी भारी हो जाता है जब तू साक़ी हो जाता है इश्क़ शराबी हो जाता है मैं जब तक कुछ तय करता हूँ सब कुछ माज़ी हो जाता है उस के छूते ही क़िस्मत का ताला चाभी हो जाता है पहले तू काफ़ी होता था अब नाकाफ़ी हो जाता है

Fahmi Badayuni

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नहीं हो तुम तो ऐसा लग रहा है कि जैसे शहर में कर्फ़्यूँँ लगा है मिरे साए में उस का नक़्श-ए-पा है बड़ा एहसान मुझ पर धूप का है कोई बर्बाद हो कर जा चुका है कोई बर्बाद होना चाहता है लहू आँखों में आ कर छुप गया है न जाने शहर-ए-दिल में क्या हुआ है कटी है उम्र बस ये सोचने में मिरे बारे में वो क्या सोचता है बराए नाम हैं उन से मरासिम बराए नाम जीना पड़ रहा है सितारे जगमगाते जा रहे हैं ख़ुदा अपना क़सीदा लिख रहा है गुलों की बातें छुप कर सुन रहा हूँ तुम्हारा ज़िक्र अच्छा लग रहा है

Fahmi Badayuni

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