नहीं हो तुम तो ऐसा लग रहा है कि जैसे शहर में कर्फ़्यूँँ लगा है मिरे साए में उस का नक़्श-ए-पा है बड़ा एहसान मुझ पर धूप का है कोई बर्बाद हो कर जा चुका है कोई बर्बाद होना चाहता है लहू आँखों में आ कर छुप गया है न जाने शहर-ए-दिल में क्या हुआ है कटी है उम्र बस ये सोचने में मिरे बारे में वो क्या सोचता है बराए नाम हैं उन से मरासिम बराए नाम जीना पड़ रहा है सितारे जगमगाते जा रहे हैं ख़ुदा अपना क़सीदा लिख रहा है गुलों की बातें छुप कर सुन रहा हूँ तुम्हारा ज़िक्र अच्छा लग रहा है
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं
Ali Zaryoun
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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते
Rahat Indori
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चारासाज़ों के बस की बात नहीं मैं दवाओं के बस की बात नहीं चाहता हूँ मैं दीमकों से नजात जो किताबों के बस की बात नहीं तेरी ख़ुशबू को क़ैद में रखना इत्रदानों के बस की बात नहीं ख़त्म कर दे अज़ाब क़ब्रों का ताज-महलों के बस की बात नहीं आँसुओं में जो झिलमिलाहट है वो सितारों के बस की बात नहीं ऐसा लगता है अब तेरा दीदार सिर्फ़ आँखों के बस की बात नहीं
Fahmi Badayuni
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मौत की सम्त जान चलती रही ज़िंदगी की दुकान चलती रही सारे किरदार सो गए थक कर बस तिरी दास्तान चलती रही मैं लरज़ता रहा हदफ़ बन कर मश्क़-ए-तीर-ओ-कमान चलती रही उल्टी सीधी चराग़ सुनते रहे और हवा की ज़बान चलती रही दो ही मौसम थे धूप या बारिश छतरियों की दुकान चलती रही जिस्म लम्बे थे चादरें छोटी रात भर खींच-तान चलती रही पर निकलते रहे बिखरते रहे ऊँची नीची उड़ान चलती रही
Fahmi Badayuni
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वो कहीं था कहीं दिखाई दिया मैं जहाँ था वहीं दिखाई दिया ख़्वाब में इक हसीं दिखाई दिया वो भी पर्दा-नशीं दिखाई दिया जब तलक तू नहीं दिखाई दिया घर कहीं का कहीं दिखाई दिया रोज़ चेहरे ने आइने बदले जो नहीं था नहीं दिखाई दिया बद-मज़ा क्यूँँ हैं आसमाँ वाले मैं ज़मीं था ज़मीं दिखाई दिया उस को ले कर चली गई गाड़ी फिर हमें कुछ नहीं दिखाई दिया
Fahmi Badayuni
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सहराओं ने माँगा पानी दरियाओं पर बरसा पानी बुनियादें कमज़ोर नहीं थीं दीवारों से आया पानी आख़िर किस किस नीम की जड़ में कब तक डालें मीठा पानी छत का हाल बता देता है परनाले से गिरता पानी फ़िक्र-ओ-मसाइल याद-ए-जानाँ गर्म हवाएँ ठंडा पानी प्यासे बच्चे खेल रहे हैं मछली मछली कितना पानी
Fahmi Badayuni
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चलती साँसों को जाम करने लगा वो नज़र से कलाम करने लगा रात फ़रहाद ख़्वाब में आया और फ़र्शी सलाम करने लगा फिर मैं ज़हरीले कार-ख़ानों में ज़िंदा रहने का काम करने लगा साफ़ इनकार कर नहीं पाया वो मिरा एहतिराम करने लगा लैला घर में सिलाई करने लगी क़ैस दिल्ली में काम करने लगा हिज्र के माल से दिल-ए-नादाँ वस्ल का इंतिज़ाम करने लगा
Fahmi Badayuni
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