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चांदनी में रात भर सारा जहांअच्छा लगा धूप जब फैली तो अपना ही मकांअच्छा लगा अब तो ये एहसास भी बाक़ी नहीं है दोस्तों किस जगह हम मुज़महिल थे और कहांअच्छा लगा आके अब ठहरे हुए पानी से दिलचस्पी हुई एक मुद्दत तक हमें आबे रवांअच्छा लगा लुट गए जब रास्ते में जाके तब आँखें खुली पहले तो एख़लाक़-ए-मीर कारवांअच्छा लगा जब हक़ीक़त सामने आई तो हैरत में पड़े मुद्दतों हम को भी हुस्ने दास्तांअच्छा लगा

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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पराया कौन है और कौन अपना सब भुला देंगे मता-ए-ज़िंदगानी एक दिन हम भी लुटा देंगे तुम अपने सामने की भीड़ से होकर गुज़र जाओ कि आगे वाले तो हर गिज़ न तुम को रास्ता देंगे जलाए हैं दिए तो फिर हवाओ पर नज़र रखो ये झोकें एक पल में सब चराग़ों को बुझा देंगे कोई पूछेगा जिस दिन वाक़ई ये ज़िन्दगी क्या है ज़मीं से एक मुठ्ठी ख़ाक ले कर हम उड़ा देंगे गिला, शिकवा, हसद, कीना, के तोहफ़े मेरी किस्मत है मेरे अहबाब अब इस सेे ज़ियादा और क्या देंगे मुसलसल धूप में चलना चिराग़ों की तरह जलना ये हंगा में तो मुझ को वक़्त से पहले थका देंगे अगर तुम आ समाँ पर जा रहे हो, शौक़ से जाओ मेरे नक़्शे क़दम आगे की मंज़िल का पता देंगे

Anwar Jalalpuri

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सोच रहा हूँ घर आंगन में एक लगाऊँ आम का पेड़ खट्टा खट्टा, मीठा मीठा या'नी तेरे नाम का पेड़ एक जोगी ने बचपन और बुढ़ापे को ऐसे समझाया वो था मेरे आग़ाज़ का पौधाये है मेरे अंजाम का पेड़ सारे जीवन की अब इस सेे बेहतर होगी क्या तस्वीर भोर की कोंपल, सुब्ह के मेवे, धूप की शाख़ें, शाम का पेड़ कल तक जिस की डाल डाल पर फूल मसर्रत के खिलते थे आज उसी को सब कहते हैं रंज-ओ-ग़म-ओ-आलाम का पेड़ इक आंधी ने सब बच्चों से उन का साया छीन लिया छांव में जिन की चैन बहुत था जो था जो था बड़े आराम का पेड़ नीम हमारे घर की शोभा जामुन से बचपन का रिश्ता हम क्या जाने किस रंगत का होता है बादाम का पेड़

Anwar Jalalpuri

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