पराया कौन है और कौन अपना सब भुला देंगे मता-ए-ज़िंदगानी एक दिन हम भी लुटा देंगे तुम अपने सामने की भीड़ से होकर गुज़र जाओ कि आगे वाले तो हर गिज़ न तुम को रास्ता देंगे जलाए हैं दिए तो फिर हवाओ पर नज़र रखो ये झोकें एक पल में सब चराग़ों को बुझा देंगे कोई पूछेगा जिस दिन वाक़ई ये ज़िन्दगी क्या है ज़मीं से एक मुठ्ठी ख़ाक ले कर हम उड़ा देंगे गिला, शिकवा, हसद, कीना, के तोहफ़े मेरी किस्मत है मेरे अहबाब अब इस सेे ज़ियादा और क्या देंगे मुसलसल धूप में चलना चिराग़ों की तरह जलना ये हंगा में तो मुझ को वक़्त से पहले थका देंगे अगर तुम आ समाँ पर जा रहे हो, शौक़ से जाओ मेरे नक़्शे क़दम आगे की मंज़िल का पता देंगे
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अब मेरे साथ नहीं है समझे ना समझाने की बात नहीं है समझे ना तुम माँगोगे और तुम्हें मिल जाएगा प्यार है ये ख़ैरात नहीं है समझे ना मैं बादल हूँ जिस पर चाहूँ बरसूँगा मेरी कोई ज़ात नहीं है समझे ना अपना ख़ाली हाथ मुझे मत दिखलाओ इस में मेरा हाथ नहीं है समझे ना
Zubair Ali Tabish
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है
Shabeena Adeeb
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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उस के हाथों में जो ख़ंजर है ज़्यादा तेज है और फिर बचपन से ही उस का निशाना तेज है जब कभी उस पार जाने का ख़याल आता मुझे कोई आहिस्ता से कहता था की दरिया तेज है आज मिलना था बिछड़ जाने की निय्यत से हमें आज भी वो देर से पहुँचा है कितना तेज है अपना सब कुछ हार के लौट आए हो न मेरे पास मैं तुम्हें कहता भी रहता की दुनिया तेज है आज उस के गाल चू में हैं तो अंदाज़ा हुआ चाय अच्छी है मगर थोडा सा मीठा तेज है
Tehzeeb Hafi
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चांदनी में रात भर सारा जहांअच्छा लगा धूप जब फैली तो अपना ही मकांअच्छा लगा अब तो ये एहसास भी बाक़ी नहीं है दोस्तों किस जगह हम मुज़महिल थे और कहांअच्छा लगा आके अब ठहरे हुए पानी से दिलचस्पी हुई एक मुद्दत तक हमें आबे रवांअच्छा लगा लुट गए जब रास्ते में जाके तब आँखें खुली पहले तो एख़लाक़-ए-मीर कारवांअच्छा लगा जब हक़ीक़त सामने आई तो हैरत में पड़े मुद्दतों हम को भी हुस्ने दास्तांअच्छा लगा
Anwar Jalalpuri
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सोच रहा हूँ घर आंगन में एक लगाऊँ आम का पेड़ खट्टा खट्टा, मीठा मीठा या'नी तेरे नाम का पेड़ एक जोगी ने बचपन और बुढ़ापे को ऐसे समझाया वो था मेरे आग़ाज़ का पौधाये है मेरे अंजाम का पेड़ सारे जीवन की अब इस सेे बेहतर होगी क्या तस्वीर भोर की कोंपल, सुब्ह के मेवे, धूप की शाख़ें, शाम का पेड़ कल तक जिस की डाल डाल पर फूल मसर्रत के खिलते थे आज उसी को सब कहते हैं रंज-ओ-ग़म-ओ-आलाम का पेड़ इक आंधी ने सब बच्चों से उन का साया छीन लिया छांव में जिन की चैन बहुत था जो था जो था बड़े आराम का पेड़ नीम हमारे घर की शोभा जामुन से बचपन का रिश्ता हम क्या जाने किस रंगत का होता है बादाम का पेड़
Anwar Jalalpuri
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