चौंक चौंक उठती है महलों की फ़ज़ा रात गए कौन देता है ये गलियों में सदा रात गए ये हक़ाएक़ की चटानों से तराशी दुनिया ओढ़ लेती है तिलिस्मों की रिदा रात गए चुभ के रह जाती है सीने में बदन की ख़ुश्बू खोल देता है कोई बंद-ए-क़बा रात गए आओ हम जिस्म की शम्ओं से उजाला कर लें चाँद निकला भी तो निकलेगा ज़रा रात गए तू न अब आए तो क्या आज तलक आती है सीढ़ियों से तिरे क़दमों की सदा रात गए
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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है
Shabeena Adeeb
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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जाम सिगरेट कश और बस कुछ धुआँ आख़िरश और बस मौत तक ज़िंदगी का सफ़र रात-दिन कश्मकश और बस पी गया पेड़ आँधी मगर गिर पड़ा खा के ग़श और बस ज़िंदगी जलती सिगरेट है सिर्फ़ दो-चार कश और बस सूखते पेड़ की लकड़ियाँ आख़िरी पेशकश और बस
Sandeep Thakur
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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है
Waseem Barelvi
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कोई हसीं तो कोई दर्दनाक समझेगा मेरा मिजाज़ वही ठीक ठाक समझेगा मैं जिस के साथ कई रातों से हूँ उस का नाम बता तो दूँगा मगर तू मज़ाक़ समझेगा वो जिस हिसाब से गाता है उस से लगता है कि मेरे दुख को तो बस बी प्राक समझेगा
Kushal Dauneria
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तमाम उम्र अज़ाबों का सिलसिला तो रहा ये कम नहीं हमें जीने का हौसला तो रहा गुज़र ही आए किसी तरह तेरे दीवाने क़दम क़दम पे कोई सख़्त मरहला तो रहा चलो न इश्क़ ही जीता न अक़्ल हार सकी तमाम वक़्त मज़े का मुक़ाबला तो रहा मैं तेरी ज़ात में गुम हो सका न तू मुझ में बहुत क़रीब थे हम फिर भी फ़ासला तो रहा ये और बात कि हर छेड़ ला-उबाली थी तिरी नज़र का दिलों से मोआ'मला तो रहा
Jaan Nisar Akhtar
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हर एक शख़्स परेशान-ओ-दर-बदर सा लगे ये शहर मुझ को तो यारो कोई भँवर सा लगे अब उस के तर्ज़-ए-तजाहुल को क्या कहे कोई वो बे-ख़बर तो नहीं फिर भी बे-ख़बर सा लगे हर एक ग़म को ख़ुशी की तरह बरतना है ये दौर वो है कि जीना भी इक हुनर सा लगे नशात-ए-सोहबत-ए-रिंदाँ बहुत ग़नीमत है कि लम्हा लम्हा पुर-आशोब-ओ-पुर-ख़तर सा लगे किसे ख़बर है कि दुनिया का हश्र क्या होगा कभी कभी तो मुझे आदमी से डर सा लगे वो तुंद वक़्त की रौ है कि पाँव टिक न सकें हर आदमी कोई उखड़ा हुआ शजर सा लगे जहान-ए-नौ के मुकम्मल सिंगार की ख़ातिर सदी सदी का ज़माना भी मुख़्तसर सा लगे
Jaan Nisar Akhtar
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ज़िंदगी तुझ को भुलाया है बहुत दिन हम ने वक़्त ख़्वाबों में गँवाया है बहुत दिन हम ने अब ये नेकी भी हमें जुर्म नज़र आती है सब के ऐबों को छुपाया है बहुत दिन हम ने तुम भी इस दिल को दुखा लो तो कोई बात नहीं अपना दिल आप दुखाया है बहुत दिन हम ने मुद्दतों तर्क-ए-तमन्ना पे लहू रोया है इश्क़ का क़र्ज़ चुकाया है बहुत दिन हम ने क्या पता हो भी सके इस की तलाफ़ी कि नहीं शा'इरी तुझ को गँवाया है बहुत दिन हम ने
Jaan Nisar Akhtar
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मय-कशी अब मिरी आदत के सिवा कुछ भी नहीं ये भी इक तल्ख़ हक़ीक़त के सिवा कुछ भी नहीं फ़ित्ना-ए-अक़्ल के जूया मिरी दुनिया से गुज़र मेरी दुनिया में मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं दिल में वो शोरिश-ए-जज़्बात कहाँ तेरे बग़ैर एक ख़ामोश क़यामत के सिवा कुछ भी नहीं मुझ को ख़ुद अपनी जवानी की क़सम है कि ये इश्क़ इक जवानी की शरारत के सिवा कुछ भी नहीं
Jaan Nisar Akhtar
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वो लोग ही हर दौर में महबूब रहे हैं जो इश्क़ में तालिब नहीं मतलूब रहे हैं तूफ़ान की आवाज़ तो आती नहीं लेकिन लगता है सफ़ीने से कहीं डूब रहे हैं उन को न पुकारो ग़म-ए-दौराँ के लक़ब से जो दर्द किसी नाम से मंसूब रहे हैं हम भी तिरी सूरत के परस्तार हैं लेकिन कुछ और भी चेहरे हमें मर्ग़ूब रहे हैं अल्फ़ाज़ में इज़हार-ए-मोहब्बत के तरीक़े ख़ुद इश्क़ की नज़रों में भी मायूब रहे हैं इस अहद-ए-बसीरत में भी नक़्क़ाद हमारे हर एक बड़े नाम से मरऊब रहे हैं इतना भी न घबराओ नई तर्ज़-ए-अदास हर दौर में बदले हुए उस्लूब रहे हैं
Jaan Nisar Akhtar
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