ghazalKuch Alfaaz

चुप भी हो बक रहा है क्या वाइज़ मग़्ज़ रिंदों का खा गया वाइज़ तेरे कहने से रिंद जाएँगे ये तो है ख़ाना-ए-ख़ुदा वाइज़ अल्लाह अल्लाह ये किब्र और ये ग़ुरूर क्या ख़ुदा का है दूसरा वाइज़ बे-ख़ता मय-कशों पे चश्म-ए-ग़ज़ब हश्र होने दे देखना वाइज़ हम हैं क़हत-ए-शराब से बीमार किस मरज़ की है तू दवा वाइज़ रह चुका मय-कदे में सारी उम्र कभी मय-ख़ाने में भी आ वाइज़ हज्व-ए-मय कर रहा था मिम्बर पर हम जो पहुँचे तो पी गया वाइज़ दुख़्त-ए-रज़ को बुरा मिरे आगे फिर न कहना कभी सुना वाइज़ आज करता हूँ वस्फ़-ए-मय मैं 'अमीर' देखूँ कहता है इस में क्या वाइज़

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ

Mehshar Afridi

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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन

Varun Anand

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तीर पर तीर लगाओ तुम्हें डर किस का है सीना किस का है मिरी जान जिगर किस का है ख़ौफ़-ए-मीज़ान-ए-क़यामत नहीं मुझ को ऐ दोस्त तू अगर है मिरे पल्ले में तो डर किस का है कोई आता है अदम से तो कोई जाता है सख़्त दोनों में ख़ुदा जाने सफ़र किस का है छुप रहा है क़फ़स-ए-तन में जो हर ताइर-ए-दिल आँख खोले हुए शाहीन-ए-नज़र किस का है नाम-ए-शाइर न सही शे'र का मज़मून हो ख़ूब फल से मतलब हमें क्या काम शजर किस का है सैद करने से जो है ताइर-ए-दिल के मुंकिर ऐ कमाँ-दार तिरे तीर में पर किस का है मेरी हैरत का शब-ए-वस्ल ये बाइ'से है 'अमीर' सर ब-ज़ानू हूँ कि ज़ानू पे ये सर किस का है

Ameer Minai

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मैं रो के आह करूँँगा जहाँ रहे न रहे ज़मीं रहे न रहे आसमाँ रहे न रहे रहे वो जान-ए-जहाँ ये जहाँ रहे न रहे मकीं की ख़ैर हो या रब मकाँ रहे न रहे अभी मज़ार पर अहबाब फ़ातिहा पढ़ लें फिर इस क़दर भी हमारा निशाँ रहे न रहे ख़ुदा के वास्ते क़लमा बुतों का पढ़ ज़ाहिद फिर इख़्तियार में ग़ाफ़िल ज़बाँ रहे न रहे ख़िज़ाँ तो ख़ैर से गुज़री चमन में बुलबुल की बहार आई है अब आशियाँ रहे न रहे चला तो हूँ पए इज़हार-ए-दर्द-ए-दिल देखूँ हुज़ूर-ए-यार मजाल-ए-बयाँ रहे न रहे 'अमीर' जमा हैं अहबाब दर्द-ए-दिल कह ले फिर इल्तिफ़ात-ए-दिल-ए-दोस्ताँ रहे न रहे

Ameer Minai

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जब से बुलबुल तू ने दो तिनके लिए टूटती हैं बिजलियाँ इन के लिए है जवानी ख़ुद जवानी का सिंगार सादगी गहना है इस सिन के लिए कौन वीराने में देखेगा बहार फूल जंगल में खिले किन के लिए सारी दुनिया के हैं वो मेरे सिवा मैं ने दुनिया छोड़ दी जिन के लिए बाग़बाँ कलियाँ हों हल्के रंग की भेजनी है एक कम-सिन के लिए सब हसीं हैं ज़ाहिदों को ना-पसंद अब कोई हूर आएगी इन के लिए वस्ल का दिन और इतना मुख़्तसर दिन गिने जाते थे इस दिन के लिए सुब्ह का सोना जो हाथ आता 'अमीर' भेजते तोहफ़ा मोअज़्ज़िन के लिए

Ameer Minai

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तिरा क्या काम अब दिल में ग़म-ए-जानाना आता है निकल ऐ सब्र इस घर से कि साहिब-ख़ाना आता है नज़र में तेरी आँखें सर में सौदा तेरी ज़ुल्फ़ों का कई परियों के साए में तिरा दीवाना आता है वफ़ूर-ए-रहमत-ए-बारी है मय-ख़्वारों पे इन रोज़ों जिधर से अब्र उठता है सू-ए-मय-ख़ाना आता है लगी दिल की बुझाए बेकसी में कौन है ऐसा मगर इक गिर्या-ए-हसरत कि बे-ताबाना आता है उन्हीं से ग़म्ज़े करती है जो तुझ पर जान देते हैं अजल तुझ को भी कितना नाज़-ए-मअशूक़ाना आता है परेशानी में ये आलम तिरी ज़ुल्फ़ों का देखा है कि इक इक बाल पर क़ुर्बान होने शाना आता है छलक जाता है जाम-ए-उम्र अपना वाए-नाकामी हमारे मुँह तलक साक़ी अगर पैमाना आता है वो बुत ही मेहरबाँ सब अपना अपना हाल कहते हैं लब-ए-ख़ामोश तुझ को भी कोई अफ़्साना आता है तिलिस्म-ए-ताज़ा तेरा साया-ए-दीवार रखता है बदलता है परी का भेस जो दीवाना आता है ये अज़्मत रह के ज़ाहिद इन बुतों में हम ने पाई है कि का'बा हम को लेने ता-दर-ए-मय-ख़ाना आता है दो-रंगी से नहीं ख़ाली अदम भी सूरत-ए-हस्ती कोई होश्यार आता है कोई दीवाना आता है हुमा यूँँ उस्तुख़्वान-ए-सोख़्ता पर मेरे गिरता है तड़प कर शम्अ' पर जैसे कोई परवाना आता है उधर हैं हुस्न की घातें इधर हैं इश्क़ की बातें तुझे अफ़्सूँ तो मुझ को उसे परी अफ़्साना आता है कलेजा हाथ से अहल-ए-तमअ के चाक होता है सदफ़-आसा अगर मुझ को मुयस्सर दाना आता है नमक जल्लाद छिड़का चाहता है मेरे ज़ख़्मों पर मज़े का वक़्त अब ऐ हिम्मत-ए-मर्दाना आता है ज़बरदस्ती का धड़का वस्ल में तुम को समाया है किधर हो होश में आओ कोई आया न आता है इलाही किस की शम्-ए-हुस्न से रौशन है घर मेरा कि बन जाता है जुगनू आज जो परवाना आता है वो आशिक़ ख़ाल-ओ-ख़त का हूँ नज़्र-ए-मोर करता हूँ मुयस्सर तीसरे दिन भी जो मुझ को दाना आता है 'अमीर' और आने वाला कौन है गोर-ए-ग़रीबाँ पर जो रौशन शम्अ' होती है तो हाँ परवाना आता है

Ameer Minai

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हम लोटते हैं वो सो रहे हैं क्या नाज़-ओ-नियाज़ हो रहे हैं क्या रंग जहाँ में हो रहे हैं दो हँसते हैं चार रो रहे हैं दुनिया से अलग जो हो रहे हैं तकियों में मज़े से सो रहे हैं पहुँची है हमारी अब ये हालत जो हँसते थे वो भी रो रहे हैं तन्हा तह-ए-ख़ाक भी नहीं हम हसरत के साथ सो रहे हैं सोते हैं लहद में सोने वाले जो जागते हैं वो रो रहे हैं अरबाब-ए-कमाल चल बसे सब सौ में कहीं एक दो रहे हैं पलकों की झपक दिखा के ये बुत दिल में नश्तर चुभो रहे हैं मुझ दाग़-नसीब की लहद पर लाले का वो बीज बो रहे हैं पीरी में भी हम हज़ार अफ़्सोस बचपन की नींद सौ रहे हैं दामन से हम अपने दाग़-ए-हस्ती आब-ए-ख़ंजर से दो रहे हैं में जाग रहा हूँ ए शब-ए-ग़म पर मेरे नसीब सौ रहे हैं रोएँगे हमें रुलाने वाले डूबेंगे वो जो डुबो रहे हैं ऐ हश्र मदीने में न कर शोर चुप चुप सरकार सौ रहे हैं आईने पे भी कड़ी निगाहें किस पर ये इताब हो रहे हैं भारी है जो मोतियों का माला आठ आठ आँसू वो रो रहे हैं दिल छीन के हो गए हैं ग़ाफ़िल फ़ित्ने वो जगा के सौ रहे हैं है ग़ैर के घर जो इन की दावत हम जान से हाथ धो रहे हैं सद शुक्र ख़याल है उसी का हम जिस से लिपट के सौ रहे हैं हो जाएँ न ख़ुश्क दाग़ के फूल आँसू उन को भिगो रहे हैं आएगी न फिर के उम्र-ए-रफ़्ता हम मुफ़्त में जान खो रहे हैं क्या गिर्या-ए-बे-असर से हासिल इस रोने पे हम तो रो रहे हैं फ़रियाद कि नाख़ुदा-ए-कश्ती कश्ती को मिरी डुबो रहे हैं क्यूँ करते हैं ग़म-गुसार तकलीफ़ आँसू मिरे मुँह को धो रहे हैं महफ़िल बरख़ास्त है पतंगे रुख़्सत शम्ओं' से हो रहे हैं है कोच का वक़्त आसमाँ पर तारे कहीं नाम को रहे हैं उन की भी नुमूद है कोई दम वो भी न रहेंगे जो रहे हैं दुनिया का ये रंग और हम को कुछ होश नहीं है सो रहे हैं ठहरो दम-ए-नज़्अ' दो घड़ी और दो चार नफ़स ही तो रहे हैं फूल उन को पिन्हा पिन्हा के अग़्यार काँटे मिरे हक़ में बो रहे हैं ज़ानू पे 'अमीर' सर को रक्खे पहरों गुज़रे कि रो रहे हैं

Ameer Minai

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