तीर पर तीर लगाओ तुम्हें डर किस का है सीना किस का है मिरी जान जिगर किस का है ख़ौफ़-ए-मीज़ान-ए-क़यामत नहीं मुझ को ऐ दोस्त तू अगर है मिरे पल्ले में तो डर किस का है कोई आता है अदम से तो कोई जाता है सख़्त दोनों में ख़ुदा जाने सफ़र किस का है छुप रहा है क़फ़स-ए-तन में जो हर ताइर-ए-दिल आँख खोले हुए शाहीन-ए-नज़र किस का है नाम-ए-शाइर न सही शे'र का मज़मून हो ख़ूब फल से मतलब हमें क्या काम शजर किस का है सैद करने से जो है ताइर-ए-दिल के मुंकिर ऐ कमाँ-दार तिरे तीर में पर किस का है मेरी हैरत का शब-ए-वस्ल ये बाइ'से है 'अमीर' सर ब-ज़ानू हूँ कि ज़ानू पे ये सर किस का है
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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जिस तरह वक़्त गुज़रने के लिए होता है आदमी शक्ल पे मरने के लिए होता है तेरी आँखों से मुलाक़ात हुई तब ये खुला डूबने वाला उभरने के लिए होता है इश्क़ क्यूँँ पीछे हटा बात निभाने से मियाँ हुस्न तो ख़ैर मुकरने के लिए होता है आँख होती है किसी राह को तकने के लिए दिल किसी पाँव पे धरने के लिए होता है दिल की दिल्ली का चुनाव ही अलग है साहब जब भी होता है ये हरने के लिए होता है कोई बस्ती हो उजड़ने के लिए बसती है कोई मज़मा हो बिखरने के लिए होता है
Ali Zaryoun
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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते
Rahat Indori
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जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो
Tehzeeb Hafi
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चुप भी हो बक रहा है क्या वाइज़ मग़्ज़ रिंदों का खा गया वाइज़ तेरे कहने से रिंद जाएँगे ये तो है ख़ाना-ए-ख़ुदा वाइज़ अल्लाह अल्लाह ये किब्र और ये ग़ुरूर क्या ख़ुदा का है दूसरा वाइज़ बे-ख़ता मय-कशों पे चश्म-ए-ग़ज़ब हश्र होने दे देखना वाइज़ हम हैं क़हत-ए-शराब से बीमार किस मरज़ की है तू दवा वाइज़ रह चुका मय-कदे में सारी उम्र कभी मय-ख़ाने में भी आ वाइज़ हज्व-ए-मय कर रहा था मिम्बर पर हम जो पहुँचे तो पी गया वाइज़ दुख़्त-ए-रज़ को बुरा मिरे आगे फिर न कहना कभी सुना वाइज़ आज करता हूँ वस्फ़-ए-मय मैं 'अमीर' देखूँ कहता है इस में क्या वाइज़
Ameer Minai
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हम लोटते हैं वो सो रहे हैं क्या नाज़-ओ-नियाज़ हो रहे हैं क्या रंग जहाँ में हो रहे हैं दो हँसते हैं चार रो रहे हैं दुनिया से अलग जो हो रहे हैं तकियों में मज़े से सो रहे हैं पहुँची है हमारी अब ये हालत जो हँसते थे वो भी रो रहे हैं तन्हा तह-ए-ख़ाक भी नहीं हम हसरत के साथ सो रहे हैं सोते हैं लहद में सोने वाले जो जागते हैं वो रो रहे हैं अरबाब-ए-कमाल चल बसे सब सौ में कहीं एक दो रहे हैं पलकों की झपक दिखा के ये बुत दिल में नश्तर चुभो रहे हैं मुझ दाग़-नसीब की लहद पर लाले का वो बीज बो रहे हैं पीरी में भी हम हज़ार अफ़्सोस बचपन की नींद सौ रहे हैं दामन से हम अपने दाग़-ए-हस्ती आब-ए-ख़ंजर से दो रहे हैं में जाग रहा हूँ ए शब-ए-ग़म पर मेरे नसीब सौ रहे हैं रोएँगे हमें रुलाने वाले डूबेंगे वो जो डुबो रहे हैं ऐ हश्र मदीने में न कर शोर चुप चुप सरकार सौ रहे हैं आईने पे भी कड़ी निगाहें किस पर ये इताब हो रहे हैं भारी है जो मोतियों का माला आठ आठ आँसू वो रो रहे हैं दिल छीन के हो गए हैं ग़ाफ़िल फ़ित्ने वो जगा के सौ रहे हैं है ग़ैर के घर जो इन की दावत हम जान से हाथ धो रहे हैं सद शुक्र ख़याल है उसी का हम जिस से लिपट के सौ रहे हैं हो जाएँ न ख़ुश्क दाग़ के फूल आँसू उन को भिगो रहे हैं आएगी न फिर के उम्र-ए-रफ़्ता हम मुफ़्त में जान खो रहे हैं क्या गिर्या-ए-बे-असर से हासिल इस रोने पे हम तो रो रहे हैं फ़रियाद कि नाख़ुदा-ए-कश्ती कश्ती को मिरी डुबो रहे हैं क्यूँ करते हैं ग़म-गुसार तकलीफ़ आँसू मिरे मुँह को धो रहे हैं महफ़िल बरख़ास्त है पतंगे रुख़्सत शम्ओं' से हो रहे हैं है कोच का वक़्त आसमाँ पर तारे कहीं नाम को रहे हैं उन की भी नुमूद है कोई दम वो भी न रहेंगे जो रहे हैं दुनिया का ये रंग और हम को कुछ होश नहीं है सो रहे हैं ठहरो दम-ए-नज़्अ' दो घड़ी और दो चार नफ़स ही तो रहे हैं फूल उन को पिन्हा पिन्हा के अग़्यार काँटे मिरे हक़ में बो रहे हैं ज़ानू पे 'अमीर' सर को रक्खे पहरों गुज़रे कि रो रहे हैं
Ameer Minai
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बात करने में तो जाती है मुलाक़ात की रात क्या बरी बात है रह जाओ यहीं रात की रात ज़र्रे अफ़्शाँ के नहीं किर्मक-ए-शब-ताब से कम है वो ज़ुल्फ़-ए-अरक़-आलूद कि बरसात की रात ज़ाहिद उस ज़ुल्फ़ फँस जाए तो इतना पूछूँ कहिए किस तरह कटी क़िबला-ए-हाजात की रात शाम से सुब्ह तलक चलते हैं जाम-ए-मय-ए-ऐश ख़ूब होती है बसर अहल-ए-ख़राबात की रात वस्ल चाहा शब-ए-मेराज तो ये उज़्र किया है ये अल्लाह ओ पयम्बर की मुलाक़ात की रात हम मुसाफ़िर हैं ये दुनिया है हक़ीक़त में सरा है तवक़्क़ुफ़ हमें इस जा तो फ़क़त रात की रात चल के अब सो रहो बातें न बनाओ साहिब वस्ल की शब है नहीं हर्फ़-ए-हिकायात की रात लैलतुल-क़द्र है वसलत की दुआ माँग 'अमीर' इस से बेहतर है कहाँ कोई मुनाजात की रात
Ameer Minai
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मैं रो के आह करूँँगा जहाँ रहे न रहे ज़मीं रहे न रहे आसमाँ रहे न रहे रहे वो जान-ए-जहाँ ये जहाँ रहे न रहे मकीं की ख़ैर हो या रब मकाँ रहे न रहे अभी मज़ार पर अहबाब फ़ातिहा पढ़ लें फिर इस क़दर भी हमारा निशाँ रहे न रहे ख़ुदा के वास्ते क़लमा बुतों का पढ़ ज़ाहिद फिर इख़्तियार में ग़ाफ़िल ज़बाँ रहे न रहे ख़िज़ाँ तो ख़ैर से गुज़री चमन में बुलबुल की बहार आई है अब आशियाँ रहे न रहे चला तो हूँ पए इज़हार-ए-दर्द-ए-दिल देखूँ हुज़ूर-ए-यार मजाल-ए-बयाँ रहे न रहे 'अमीर' जमा हैं अहबाब दर्द-ए-दिल कह ले फिर इल्तिफ़ात-ए-दिल-ए-दोस्ताँ रहे न रहे
Ameer Minai
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जब से बुलबुल तू ने दो तिनके लिए टूटती हैं बिजलियाँ इन के लिए है जवानी ख़ुद जवानी का सिंगार सादगी गहना है इस सिन के लिए कौन वीराने में देखेगा बहार फूल जंगल में खिले किन के लिए सारी दुनिया के हैं वो मेरे सिवा मैं ने दुनिया छोड़ दी जिन के लिए बाग़बाँ कलियाँ हों हल्के रंग की भेजनी है एक कम-सिन के लिए सब हसीं हैं ज़ाहिदों को ना-पसंद अब कोई हूर आएगी इन के लिए वस्ल का दिन और इतना मुख़्तसर दिन गिने जाते थे इस दिन के लिए सुब्ह का सोना जो हाथ आता 'अमीर' भेजते तोहफ़ा मोअज़्ज़िन के लिए
Ameer Minai
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