ghazalKuch Alfaaz

बात करने में तो जाती है मुलाक़ात की रात क्या बरी बात है रह जाओ यहीं रात की रात ज़र्रे अफ़्शाँ के नहीं किर्मक-ए-शब-ताब से कम है वो ज़ुल्फ़-ए-अरक़-आलूद कि बरसात की रात ज़ाहिद उस ज़ुल्फ़ फँस जाए तो इतना पूछूँ कहिए किस तरह कटी क़िबला-ए-हाजात की रात शाम से सुब्ह तलक चलते हैं जाम-ए-मय-ए-ऐश ख़ूब होती है बसर अहल-ए-ख़राबात की रात वस्ल चाहा शब-ए-मेराज तो ये उज़्र किया है ये अल्लाह ओ पयम्बर की मुलाक़ात की रात हम मुसाफ़िर हैं ये दुनिया है हक़ीक़त में सरा है तवक़्क़ुफ़ हमें इस जा तो फ़क़त रात की रात चल के अब सो रहो बातें न बनाओ साहिब वस्ल की शब है नहीं हर्फ़-ए-हिकायात की रात लैलतुल-क़द्र है वसलत की दुआ माँग 'अमीर' इस से बेहतर है कहाँ कोई मुनाजात की रात

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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा

Fahmi Badayuni

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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चुप भी हो बक रहा है क्या वाइज़ मग़्ज़ रिंदों का खा गया वाइज़ तेरे कहने से रिंद जाएँगे ये तो है ख़ाना-ए-ख़ुदा वाइज़ अल्लाह अल्लाह ये किब्र और ये ग़ुरूर क्या ख़ुदा का है दूसरा वाइज़ बे-ख़ता मय-कशों पे चश्म-ए-ग़ज़ब हश्र होने दे देखना वाइज़ हम हैं क़हत-ए-शराब से बीमार किस मरज़ की है तू दवा वाइज़ रह चुका मय-कदे में सारी उम्र कभी मय-ख़ाने में भी आ वाइज़ हज्व-ए-मय कर रहा था मिम्बर पर हम जो पहुँचे तो पी गया वाइज़ दुख़्त-ए-रज़ को बुरा मिरे आगे फिर न कहना कभी सुना वाइज़ आज करता हूँ वस्फ़-ए-मय मैं 'अमीर' देखूँ कहता है इस में क्या वाइज़

Ameer Minai

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मिरे बस में या तो या-रब वो सितम-शिआर होता ये न था तो काश दिल पर मुझे इख़्तियार होता पस-ए-मर्ग काश यूँँ ही मुझे वस्ल-ए-यार होता वो सर-ए-मज़ार होता मैं तह-ए-मज़ार होता तिरा मय-कदा सलामत तिरे ख़ुम की ख़ैर साक़ी मिरा नश्शा क्यूँँ उतरता मुझे क्यूँँ ख़ुमार होता मैं हूँ ना-मुराद ऐसा कि बिलक के यास रोती कहीं पा के आसरा कुछ जो उमीद-वार होता नहीं पूछता है मुझ को कोई फूल इस चमन में दिल-ए-दाग़-दार होता तो गले का हार होता वो मज़ा दिया तड़प ने कि ये आरज़ू है या-रब मिरे दोनों पहलुओं में दिल-ए-बे-क़रार होता दम-ए-नज़अ भी जो वो बुत मुझे आ के मुँह दिखाता तो ख़ुदा के मुँह से इतना न मैं शर्मसार होता न मलक सवाल करते न लहद फ़िशार देती सर-ए-राह-ए-कू-ए-क़ातिल जो मिरा मज़ार होता जो निगाह की थी ज़ालिम तो फिर आँख क्यूँँ चुराई वही तीर क्यूँँ न मारा जो जिगर के पार होता मैं ज़बाँ से तुम को सच्चा कहो लाख बार कह दूँ इसे क्या करूँँ कि दिल को नहीं ए'तिबार होता मिरी ख़ाक भी लहद में न रही 'अमीर' बाक़ी उन्हें मरने ही का अब तक नहीं ए'तिबार होता

Ameer Minai

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तीर पर तीर लगाओ तुम्हें डर किस का है सीना किस का है मिरी जान जिगर किस का है ख़ौफ़-ए-मीज़ान-ए-क़यामत नहीं मुझ को ऐ दोस्त तू अगर है मिरे पल्ले में तो डर किस का है कोई आता है अदम से तो कोई जाता है सख़्त दोनों में ख़ुदा जाने सफ़र किस का है छुप रहा है क़फ़स-ए-तन में जो हर ताइर-ए-दिल आँख खोले हुए शाहीन-ए-नज़र किस का है नाम-ए-शाइर न सही शे'र का मज़मून हो ख़ूब फल से मतलब हमें क्या काम शजर किस का है सैद करने से जो है ताइर-ए-दिल के मुंकिर ऐ कमाँ-दार तिरे तीर में पर किस का है मेरी हैरत का शब-ए-वस्ल ये बाइ'से है 'अमीर' सर ब-ज़ानू हूँ कि ज़ानू पे ये सर किस का है

Ameer Minai

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मैं रो के आह करूँँगा जहाँ रहे न रहे ज़मीं रहे न रहे आसमाँ रहे न रहे रहे वो जान-ए-जहाँ ये जहाँ रहे न रहे मकीं की ख़ैर हो या रब मकाँ रहे न रहे अभी मज़ार पर अहबाब फ़ातिहा पढ़ लें फिर इस क़दर भी हमारा निशाँ रहे न रहे ख़ुदा के वास्ते क़लमा बुतों का पढ़ ज़ाहिद फिर इख़्तियार में ग़ाफ़िल ज़बाँ रहे न रहे ख़िज़ाँ तो ख़ैर से गुज़री चमन में बुलबुल की बहार आई है अब आशियाँ रहे न रहे चला तो हूँ पए इज़हार-ए-दर्द-ए-दिल देखूँ हुज़ूर-ए-यार मजाल-ए-बयाँ रहे न रहे 'अमीर' जमा हैं अहबाब दर्द-ए-दिल कह ले फिर इल्तिफ़ात-ए-दिल-ए-दोस्ताँ रहे न रहे

Ameer Minai

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सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता निकलता आ रहा है आफ़्ताब आहिस्ता आहिस्ता जवाँ होने लगे जब वो तो हम से कर लिया पर्दा हया यक-लख़्त आई और शबाब आहिस्ता आहिस्ता शब-ए-फ़ुर्क़त का जागा हूँ फ़रिश्तो अब तो सोने दो कभी फ़ुर्सत में कर लेना हिसाब आहिस्ता आहिस्ता सवाल-ए-वस्ल पर उन को अदू का ख़ौफ़ है इतना दबे होंटों से देते हैं जवाब आहिस्ता आहिस्ता वो बे-दर्दी से सर काटें 'अमीर' और मैं कहूँ उन से हुज़ूर आहिस्ता आहिस्ता जनाब आहिस्ता आहिस्ता

Ameer Minai

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