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सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता निकलता आ रहा है आफ़्ताब आहिस्ता आहिस्ता जवाँ होने लगे जब वो तो हम से कर लिया पर्दा हया यक-लख़्त आई और शबाब आहिस्ता आहिस्ता शब-ए-फ़ुर्क़त का जागा हूँ फ़रिश्तो अब तो सोने दो कभी फ़ुर्सत में कर लेना हिसाब आहिस्ता आहिस्ता सवाल-ए-वस्ल पर उन को अदू का ख़ौफ़ है इतना दबे होंटों से देते हैं जवाब आहिस्ता आहिस्ता वो बे-दर्दी से सर काटें 'अमीर' और मैं कहूँ उन से हुज़ूर आहिस्ता आहिस्ता जनाब आहिस्ता आहिस्ता

Ameer Minai10 Likes

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उस के हाथों में जो ख़ंजर है ज़्यादा तेज है और फिर बचपन से ही उस का निशाना तेज है जब कभी उस पार जाने का ख़याल आता मुझे कोई आहिस्ता से कहता था की दरिया तेज है आज मिलना था बिछड़ जाने की निय्यत से हमें आज भी वो देर से पहुँचा है कितना तेज है अपना सब कुछ हार के लौट आए हो न मेरे पास मैं तुम्हें कहता भी रहता की दुनिया तेज है आज उस के गाल चू में हैं तो अंदाज़ा हुआ चाय अच्छी है मगर थोडा सा मीठा तेज है

Tehzeeb Hafi

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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अब मेरे साथ नहीं है समझे ना समझाने की बात नहीं है समझे ना तुम माँगोगे और तुम्हें मिल जाएगा प्यार है ये ख़ैरात नहीं है समझे ना मैं बादल हूँ जिस पर चाहूँ बरसूँगा मेरी कोई ज़ात नहीं है समझे ना अपना ख़ाली हाथ मुझे मत दिखलाओ इस में मेरा हाथ नहीं है समझे ना

Zubair Ali Tabish

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दिल को तेरी ख़्वाहिश पहली बार हुई इस सहरा में बारिश पहली बार हुई माँगने वाले हीरे मोती माँगते हैं अश्कों की फ़रमाइश पहली बार हुई डूबने वाले इक इक कर के आ जाएँ दरिया में गुंजाइश पहली बार हुई

Abrar Kashif

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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

Rahat Indori

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चुप भी हो बक रहा है क्या वाइज़ मग़्ज़ रिंदों का खा गया वाइज़ तेरे कहने से रिंद जाएँगे ये तो है ख़ाना-ए-ख़ुदा वाइज़ अल्लाह अल्लाह ये किब्र और ये ग़ुरूर क्या ख़ुदा का है दूसरा वाइज़ बे-ख़ता मय-कशों पे चश्म-ए-ग़ज़ब हश्र होने दे देखना वाइज़ हम हैं क़हत-ए-शराब से बीमार किस मरज़ की है तू दवा वाइज़ रह चुका मय-कदे में सारी उम्र कभी मय-ख़ाने में भी आ वाइज़ हज्व-ए-मय कर रहा था मिम्बर पर हम जो पहुँचे तो पी गया वाइज़ दुख़्त-ए-रज़ को बुरा मिरे आगे फिर न कहना कभी सुना वाइज़ आज करता हूँ वस्फ़-ए-मय मैं 'अमीर' देखूँ कहता है इस में क्या वाइज़

Ameer Minai

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तीर पर तीर लगाओ तुम्हें डर किस का है सीना किस का है मिरी जान जिगर किस का है ख़ौफ़-ए-मीज़ान-ए-क़यामत नहीं मुझ को ऐ दोस्त तू अगर है मिरे पल्ले में तो डर किस का है कोई आता है अदम से तो कोई जाता है सख़्त दोनों में ख़ुदा जाने सफ़र किस का है छुप रहा है क़फ़स-ए-तन में जो हर ताइर-ए-दिल आँख खोले हुए शाहीन-ए-नज़र किस का है नाम-ए-शाइर न सही शे'र का मज़मून हो ख़ूब फल से मतलब हमें क्या काम शजर किस का है सैद करने से जो है ताइर-ए-दिल के मुंकिर ऐ कमाँ-दार तिरे तीर में पर किस का है मेरी हैरत का शब-ए-वस्ल ये बाइ'से है 'अमीर' सर ब-ज़ानू हूँ कि ज़ानू पे ये सर किस का है

Ameer Minai

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जब से बुलबुल तू ने दो तिनके लिए टूटती हैं बिजलियाँ इन के लिए है जवानी ख़ुद जवानी का सिंगार सादगी गहना है इस सिन के लिए कौन वीराने में देखेगा बहार फूल जंगल में खिले किन के लिए सारी दुनिया के हैं वो मेरे सिवा मैं ने दुनिया छोड़ दी जिन के लिए बाग़बाँ कलियाँ हों हल्के रंग की भेजनी है एक कम-सिन के लिए सब हसीं हैं ज़ाहिदों को ना-पसंद अब कोई हूर आएगी इन के लिए वस्ल का दिन और इतना मुख़्तसर दिन गिने जाते थे इस दिन के लिए सुब्ह का सोना जो हाथ आता 'अमीर' भेजते तोहफ़ा मोअज़्ज़िन के लिए

Ameer Minai

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बात करने में तो जाती है मुलाक़ात की रात क्या बरी बात है रह जाओ यहीं रात की रात ज़र्रे अफ़्शाँ के नहीं किर्मक-ए-शब-ताब से कम है वो ज़ुल्फ़-ए-अरक़-आलूद कि बरसात की रात ज़ाहिद उस ज़ुल्फ़ फँस जाए तो इतना पूछूँ कहिए किस तरह कटी क़िबला-ए-हाजात की रात शाम से सुब्ह तलक चलते हैं जाम-ए-मय-ए-ऐश ख़ूब होती है बसर अहल-ए-ख़राबात की रात वस्ल चाहा शब-ए-मेराज तो ये उज़्र किया है ये अल्लाह ओ पयम्बर की मुलाक़ात की रात हम मुसाफ़िर हैं ये दुनिया है हक़ीक़त में सरा है तवक़्क़ुफ़ हमें इस जा तो फ़क़त रात की रात चल के अब सो रहो बातें न बनाओ साहिब वस्ल की शब है नहीं हर्फ़-ए-हिकायात की रात लैलतुल-क़द्र है वसलत की दुआ माँग 'अमीर' इस से बेहतर है कहाँ कोई मुनाजात की रात

Ameer Minai

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मैं रो के आह करूँँगा जहाँ रहे न रहे ज़मीं रहे न रहे आसमाँ रहे न रहे रहे वो जान-ए-जहाँ ये जहाँ रहे न रहे मकीं की ख़ैर हो या रब मकाँ रहे न रहे अभी मज़ार पर अहबाब फ़ातिहा पढ़ लें फिर इस क़दर भी हमारा निशाँ रहे न रहे ख़ुदा के वास्ते क़लमा बुतों का पढ़ ज़ाहिद फिर इख़्तियार में ग़ाफ़िल ज़बाँ रहे न रहे ख़िज़ाँ तो ख़ैर से गुज़री चमन में बुलबुल की बहार आई है अब आशियाँ रहे न रहे चला तो हूँ पए इज़हार-ए-दर्द-ए-दिल देखूँ हुज़ूर-ए-यार मजाल-ए-बयाँ रहे न रहे 'अमीर' जमा हैं अहबाब दर्द-ए-दिल कह ले फिर इल्तिफ़ात-ए-दिल-ए-दोस्ताँ रहे न रहे

Ameer Minai

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