ghazalKuch Alfaaz

जब से बुलबुल तू ने दो तिनके लिए टूटती हैं बिजलियाँ इन के लिए है जवानी ख़ुद जवानी का सिंगार सादगी गहना है इस सिन के लिए कौन वीराने में देखेगा बहार फूल जंगल में खिले किन के लिए सारी दुनिया के हैं वो मेरे सिवा मैं ने दुनिया छोड़ दी जिन के लिए बाग़बाँ कलियाँ हों हल्के रंग की भेजनी है एक कम-सिन के लिए सब हसीं हैं ज़ाहिदों को ना-पसंद अब कोई हूर आएगी इन के लिए वस्ल का दिन और इतना मुख़्तसर दिन गिने जाते थे इस दिन के लिए सुब्ह का सोना जो हाथ आता 'अमीर' भेजते तोहफ़ा मोअज़्ज़िन के लिए

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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर

Anwar Shaoor

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मुझे उदास कर गए हो ख़ुश रहो मिरे मिज़ाज पर गए हो ख़ुश रहो मिरे लिए न रुक सके तो क्या हुआ जहाँ कहीं ठहर गए हो ख़ुश रहो ख़ुशी हुई है आज तुम को देख कर बहुत निखर सँवर गए हो ख़ुश रहो उदास हो किसी की बे-वफ़ाई पर वफ़ा कहीं तो कर गए हो ख़ुश रहो गली में और लोग भी थे आश्ना हमें सलाम कर गए हो ख़ुश रहो तुम्हें तो मेरी दोस्ती पे नाज़ था इसी से अब मुकर गए हो ख़ुश रहो किसी की ज़िन्दगी बनो कि बंदगी मिरे लिए तो मर गए हो ख़ुश रहो

Fazil Jamili

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सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो कहीं नहीं कोई सूरज धुआँ धुआँ है फ़ज़ा ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो

Nida Fazli

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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चुप भी हो बक रहा है क्या वाइज़ मग़्ज़ रिंदों का खा गया वाइज़ तेरे कहने से रिंद जाएँगे ये तो है ख़ाना-ए-ख़ुदा वाइज़ अल्लाह अल्लाह ये किब्र और ये ग़ुरूर क्या ख़ुदा का है दूसरा वाइज़ बे-ख़ता मय-कशों पे चश्म-ए-ग़ज़ब हश्र होने दे देखना वाइज़ हम हैं क़हत-ए-शराब से बीमार किस मरज़ की है तू दवा वाइज़ रह चुका मय-कदे में सारी उम्र कभी मय-ख़ाने में भी आ वाइज़ हज्व-ए-मय कर रहा था मिम्बर पर हम जो पहुँचे तो पी गया वाइज़ दुख़्त-ए-रज़ को बुरा मिरे आगे फिर न कहना कभी सुना वाइज़ आज करता हूँ वस्फ़-ए-मय मैं 'अमीर' देखूँ कहता है इस में क्या वाइज़

Ameer Minai

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तीर पर तीर लगाओ तुम्हें डर किस का है सीना किस का है मिरी जान जिगर किस का है ख़ौफ़-ए-मीज़ान-ए-क़यामत नहीं मुझ को ऐ दोस्त तू अगर है मिरे पल्ले में तो डर किस का है कोई आता है अदम से तो कोई जाता है सख़्त दोनों में ख़ुदा जाने सफ़र किस का है छुप रहा है क़फ़स-ए-तन में जो हर ताइर-ए-दिल आँख खोले हुए शाहीन-ए-नज़र किस का है नाम-ए-शाइर न सही शे'र का मज़मून हो ख़ूब फल से मतलब हमें क्या काम शजर किस का है सैद करने से जो है ताइर-ए-दिल के मुंकिर ऐ कमाँ-दार तिरे तीर में पर किस का है मेरी हैरत का शब-ए-वस्ल ये बाइ'से है 'अमीर' सर ब-ज़ानू हूँ कि ज़ानू पे ये सर किस का है

Ameer Minai

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मैं रो के आह करूँँगा जहाँ रहे न रहे ज़मीं रहे न रहे आसमाँ रहे न रहे रहे वो जान-ए-जहाँ ये जहाँ रहे न रहे मकीं की ख़ैर हो या रब मकाँ रहे न रहे अभी मज़ार पर अहबाब फ़ातिहा पढ़ लें फिर इस क़दर भी हमारा निशाँ रहे न रहे ख़ुदा के वास्ते क़लमा बुतों का पढ़ ज़ाहिद फिर इख़्तियार में ग़ाफ़िल ज़बाँ रहे न रहे ख़िज़ाँ तो ख़ैर से गुज़री चमन में बुलबुल की बहार आई है अब आशियाँ रहे न रहे चला तो हूँ पए इज़हार-ए-दर्द-ए-दिल देखूँ हुज़ूर-ए-यार मजाल-ए-बयाँ रहे न रहे 'अमीर' जमा हैं अहबाब दर्द-ए-दिल कह ले फिर इल्तिफ़ात-ए-दिल-ए-दोस्ताँ रहे न रहे

Ameer Minai

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मिरे बस में या तो या-रब वो सितम-शिआर होता ये न था तो काश दिल पर मुझे इख़्तियार होता पस-ए-मर्ग काश यूँँ ही मुझे वस्ल-ए-यार होता वो सर-ए-मज़ार होता मैं तह-ए-मज़ार होता तिरा मय-कदा सलामत तिरे ख़ुम की ख़ैर साक़ी मिरा नश्शा क्यूँँ उतरता मुझे क्यूँँ ख़ुमार होता मैं हूँ ना-मुराद ऐसा कि बिलक के यास रोती कहीं पा के आसरा कुछ जो उमीद-वार होता नहीं पूछता है मुझ को कोई फूल इस चमन में दिल-ए-दाग़-दार होता तो गले का हार होता वो मज़ा दिया तड़प ने कि ये आरज़ू है या-रब मिरे दोनों पहलुओं में दिल-ए-बे-क़रार होता दम-ए-नज़अ भी जो वो बुत मुझे आ के मुँह दिखाता तो ख़ुदा के मुँह से इतना न मैं शर्मसार होता न मलक सवाल करते न लहद फ़िशार देती सर-ए-राह-ए-कू-ए-क़ातिल जो मिरा मज़ार होता जो निगाह की थी ज़ालिम तो फिर आँख क्यूँँ चुराई वही तीर क्यूँँ न मारा जो जिगर के पार होता मैं ज़बाँ से तुम को सच्चा कहो लाख बार कह दूँ इसे क्या करूँँ कि दिल को नहीं ए'तिबार होता मिरी ख़ाक भी लहद में न रही 'अमीर' बाक़ी उन्हें मरने ही का अब तक नहीं ए'तिबार होता

Ameer Minai

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हम लोटते हैं वो सो रहे हैं क्या नाज़-ओ-नियाज़ हो रहे हैं क्या रंग जहाँ में हो रहे हैं दो हँसते हैं चार रो रहे हैं दुनिया से अलग जो हो रहे हैं तकियों में मज़े से सो रहे हैं पहुँची है हमारी अब ये हालत जो हँसते थे वो भी रो रहे हैं तन्हा तह-ए-ख़ाक भी नहीं हम हसरत के साथ सो रहे हैं सोते हैं लहद में सोने वाले जो जागते हैं वो रो रहे हैं अरबाब-ए-कमाल चल बसे सब सौ में कहीं एक दो रहे हैं पलकों की झपक दिखा के ये बुत दिल में नश्तर चुभो रहे हैं मुझ दाग़-नसीब की लहद पर लाले का वो बीज बो रहे हैं पीरी में भी हम हज़ार अफ़्सोस बचपन की नींद सौ रहे हैं दामन से हम अपने दाग़-ए-हस्ती आब-ए-ख़ंजर से दो रहे हैं में जाग रहा हूँ ए शब-ए-ग़म पर मेरे नसीब सौ रहे हैं रोएँगे हमें रुलाने वाले डूबेंगे वो जो डुबो रहे हैं ऐ हश्र मदीने में न कर शोर चुप चुप सरकार सौ रहे हैं आईने पे भी कड़ी निगाहें किस पर ये इताब हो रहे हैं भारी है जो मोतियों का माला आठ आठ आँसू वो रो रहे हैं दिल छीन के हो गए हैं ग़ाफ़िल फ़ित्ने वो जगा के सौ रहे हैं है ग़ैर के घर जो इन की दावत हम जान से हाथ धो रहे हैं सद शुक्र ख़याल है उसी का हम जिस से लिपट के सौ रहे हैं हो जाएँ न ख़ुश्क दाग़ के फूल आँसू उन को भिगो रहे हैं आएगी न फिर के उम्र-ए-रफ़्ता हम मुफ़्त में जान खो रहे हैं क्या गिर्या-ए-बे-असर से हासिल इस रोने पे हम तो रो रहे हैं फ़रियाद कि नाख़ुदा-ए-कश्ती कश्ती को मिरी डुबो रहे हैं क्यूँ करते हैं ग़म-गुसार तकलीफ़ आँसू मिरे मुँह को धो रहे हैं महफ़िल बरख़ास्त है पतंगे रुख़्सत शम्ओं' से हो रहे हैं है कोच का वक़्त आसमाँ पर तारे कहीं नाम को रहे हैं उन की भी नुमूद है कोई दम वो भी न रहेंगे जो रहे हैं दुनिया का ये रंग और हम को कुछ होश नहीं है सो रहे हैं ठहरो दम-ए-नज़्अ' दो घड़ी और दो चार नफ़स ही तो रहे हैं फूल उन को पिन्हा पिन्हा के अग़्यार काँटे मिरे हक़ में बो रहे हैं ज़ानू पे 'अमीर' सर को रक्खे पहरों गुज़रे कि रो रहे हैं

Ameer Minai

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