ghazalKuch Alfaaz

तिरा क्या काम अब दिल में ग़म-ए-जानाना आता है निकल ऐ सब्र इस घर से कि साहिब-ख़ाना आता है नज़र में तेरी आँखें सर में सौदा तेरी ज़ुल्फ़ों का कई परियों के साए में तिरा दीवाना आता है वफ़ूर-ए-रहमत-ए-बारी है मय-ख़्वारों पे इन रोज़ों जिधर से अब्र उठता है सू-ए-मय-ख़ाना आता है लगी दिल की बुझाए बेकसी में कौन है ऐसा मगर इक गिर्या-ए-हसरत कि बे-ताबाना आता है उन्हीं से ग़म्ज़े करती है जो तुझ पर जान देते हैं अजल तुझ को भी कितना नाज़-ए-मअशूक़ाना आता है परेशानी में ये आलम तिरी ज़ुल्फ़ों का देखा है कि इक इक बाल पर क़ुर्बान होने शाना आता है छलक जाता है जाम-ए-उम्र अपना वाए-नाकामी हमारे मुँह तलक साक़ी अगर पैमाना आता है वो बुत ही मेहरबाँ सब अपना अपना हाल कहते हैं लब-ए-ख़ामोश तुझ को भी कोई अफ़्साना आता है तिलिस्म-ए-ताज़ा तेरा साया-ए-दीवार रखता है बदलता है परी का भेस जो दीवाना आता है ये अज़्मत रह के ज़ाहिद इन बुतों में हम ने पाई है कि का'बा हम को लेने ता-दर-ए-मय-ख़ाना आता है दो-रंगी से नहीं ख़ाली अदम भी सूरत-ए-हस्ती कोई होश्यार आता है कोई दीवाना आता है हुमा यूँँ उस्तुख़्वान-ए-सोख़्ता पर मेरे गिरता है तड़प कर शम्अ' पर जैसे कोई परवाना आता है उधर हैं हुस्न की घातें इधर हैं इश्क़ की बातें तुझे अफ़्सूँ तो मुझ को उसे परी अफ़्साना आता है कलेजा हाथ से अहल-ए-तमअ के चाक होता है सदफ़-आसा अगर मुझ को मुयस्सर दाना आता है नमक जल्लाद छिड़का चाहता है मेरे ज़ख़्मों पर मज़े का वक़्त अब ऐ हिम्मत-ए-मर्दाना आता है ज़बरदस्ती का धड़का वस्ल में तुम को समाया है किधर हो होश में आओ कोई आया न आता है इलाही किस की शम्-ए-हुस्न से रौशन है घर मेरा कि बन जाता है जुगनू आज जो परवाना आता है वो आशिक़ ख़ाल-ओ-ख़त का हूँ नज़्र-ए-मोर करता हूँ मुयस्सर तीसरे दिन भी जो मुझ को दाना आता है 'अमीर' और आने वाला कौन है गोर-ए-ग़रीबाँ पर जो रौशन शम्अ' होती है तो हाँ परवाना आता है

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर

Anwar Shaoor

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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तीर पर तीर लगाओ तुम्हें डर किस का है सीना किस का है मिरी जान जिगर किस का है ख़ौफ़-ए-मीज़ान-ए-क़यामत नहीं मुझ को ऐ दोस्त तू अगर है मिरे पल्ले में तो डर किस का है कोई आता है अदम से तो कोई जाता है सख़्त दोनों में ख़ुदा जाने सफ़र किस का है छुप रहा है क़फ़स-ए-तन में जो हर ताइर-ए-दिल आँख खोले हुए शाहीन-ए-नज़र किस का है नाम-ए-शाइर न सही शे'र का मज़मून हो ख़ूब फल से मतलब हमें क्या काम शजर किस का है सैद करने से जो है ताइर-ए-दिल के मुंकिर ऐ कमाँ-दार तिरे तीर में पर किस का है मेरी हैरत का शब-ए-वस्ल ये बाइ'से है 'अमीर' सर ब-ज़ानू हूँ कि ज़ानू पे ये सर किस का है

Ameer Minai

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जब से बुलबुल तू ने दो तिनके लिए टूटती हैं बिजलियाँ इन के लिए है जवानी ख़ुद जवानी का सिंगार सादगी गहना है इस सिन के लिए कौन वीराने में देखेगा बहार फूल जंगल में खिले किन के लिए सारी दुनिया के हैं वो मेरे सिवा मैं ने दुनिया छोड़ दी जिन के लिए बाग़बाँ कलियाँ हों हल्के रंग की भेजनी है एक कम-सिन के लिए सब हसीं हैं ज़ाहिदों को ना-पसंद अब कोई हूर आएगी इन के लिए वस्ल का दिन और इतना मुख़्तसर दिन गिने जाते थे इस दिन के लिए सुब्ह का सोना जो हाथ आता 'अमीर' भेजते तोहफ़ा मोअज़्ज़िन के लिए

Ameer Minai

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मैं रो के आह करूँँगा जहाँ रहे न रहे ज़मीं रहे न रहे आसमाँ रहे न रहे रहे वो जान-ए-जहाँ ये जहाँ रहे न रहे मकीं की ख़ैर हो या रब मकाँ रहे न रहे अभी मज़ार पर अहबाब फ़ातिहा पढ़ लें फिर इस क़दर भी हमारा निशाँ रहे न रहे ख़ुदा के वास्ते क़लमा बुतों का पढ़ ज़ाहिद फिर इख़्तियार में ग़ाफ़िल ज़बाँ रहे न रहे ख़िज़ाँ तो ख़ैर से गुज़री चमन में बुलबुल की बहार आई है अब आशियाँ रहे न रहे चला तो हूँ पए इज़हार-ए-दर्द-ए-दिल देखूँ हुज़ूर-ए-यार मजाल-ए-बयाँ रहे न रहे 'अमीर' जमा हैं अहबाब दर्द-ए-दिल कह ले फिर इल्तिफ़ात-ए-दिल-ए-दोस्ताँ रहे न रहे

Ameer Minai

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बात करने में तो जाती है मुलाक़ात की रात क्या बरी बात है रह जाओ यहीं रात की रात ज़र्रे अफ़्शाँ के नहीं किर्मक-ए-शब-ताब से कम है वो ज़ुल्फ़-ए-अरक़-आलूद कि बरसात की रात ज़ाहिद उस ज़ुल्फ़ फँस जाए तो इतना पूछूँ कहिए किस तरह कटी क़िबला-ए-हाजात की रात शाम से सुब्ह तलक चलते हैं जाम-ए-मय-ए-ऐश ख़ूब होती है बसर अहल-ए-ख़राबात की रात वस्ल चाहा शब-ए-मेराज तो ये उज़्र किया है ये अल्लाह ओ पयम्बर की मुलाक़ात की रात हम मुसाफ़िर हैं ये दुनिया है हक़ीक़त में सरा है तवक़्क़ुफ़ हमें इस जा तो फ़क़त रात की रात चल के अब सो रहो बातें न बनाओ साहिब वस्ल की शब है नहीं हर्फ़-ए-हिकायात की रात लैलतुल-क़द्र है वसलत की दुआ माँग 'अमीर' इस से बेहतर है कहाँ कोई मुनाजात की रात

Ameer Minai

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चुप भी हो बक रहा है क्या वाइज़ मग़्ज़ रिंदों का खा गया वाइज़ तेरे कहने से रिंद जाएँगे ये तो है ख़ाना-ए-ख़ुदा वाइज़ अल्लाह अल्लाह ये किब्र और ये ग़ुरूर क्या ख़ुदा का है दूसरा वाइज़ बे-ख़ता मय-कशों पे चश्म-ए-ग़ज़ब हश्र होने दे देखना वाइज़ हम हैं क़हत-ए-शराब से बीमार किस मरज़ की है तू दवा वाइज़ रह चुका मय-कदे में सारी उम्र कभी मय-ख़ाने में भी आ वाइज़ हज्व-ए-मय कर रहा था मिम्बर पर हम जो पहुँचे तो पी गया वाइज़ दुख़्त-ए-रज़ को बुरा मिरे आगे फिर न कहना कभी सुना वाइज़ आज करता हूँ वस्फ़-ए-मय मैं 'अमीर' देखूँ कहता है इस में क्या वाइज़

Ameer Minai

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