ghazalKuch Alfaaz

दाद तो बा'द में कमाएँगे पहले हम सोचना सिखाएँगे मैं कहीं जा नहीं रहा लेकिन आप क्या मेरे साथ आएँगे कोई खिड़की खुलेगी रात गए कई अपनी मुराद पाएँगे खुल के रोने पे इख़्तियार नहीं हम कोई जश्न क्या मनाएँगे हँसेंगे तेरी बद-हवा सेी पर लोग रस्ता नहीं बताएँगे तुम उठाओगे कोई रंज मिरा दोस्त अहबाब हज़ उठाएँगे हमें अपनी तलाश में मत भेज खड़ी फ़सलें उजाड़ आएँगे

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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दर-गुज़र जितना किया है वही काफ़ी है मुझे अब तुझे क़त्ल भी कर दूँ तो मुआ'फ़ी है मुझे मसअला ऐसे कोई हल तो न होगा शायद शे'र कहना ही मिरे ग़म की तलाफ़ी है मुझे दफ़अ'तन इक नए एहसास ने चौंका सा दिया मैं तो समझा था कि हर साँस इज़ाफ़ी है मुझे मैं न कहता था दवाएँ नहीं काम आएँगी जानता था तिरी आवाज़ ही शाफ़ी है मुझे इस से अंदाज़ा लगाओ कि मैं किस हाल में हूँ ग़ैर का ध्यान भी अब वा'दा-ख़िलाफ़ी है मुझे वो कहीं सामने आ जाए तो क्या हो 'जव्वाद' याद ही उस की अगर सीना-शिगाफ़ी है मुझे

Jawwad Sheikh

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नहीं ऐसा भी कि यकसर नहीं रहने वाला दिल में ये शोर बराबर नहीं रहने वाला जिस तरह ख़ामुशी लफ़्ज़ों में ढली जाती है इस में तासीर का उंसुर नहीं रहने वाला अब ये किस शक्ल में ज़ाहिर हो, ख़ुदा ही जाने रंज ऐसा है कि अंदर नहीं रहने वाला मैं उसे छोड़ना चाहूँ भी तो कैसे छोड़ूँ? वो किसी और का हो कर नहीं रहने वाला ग़ौर से देख उन आँखों में नज़र आता है वो समुंदर जो समुंदर नहीं रहने वाला जुर्म वो करने का सोचा है कि बस अब की बार कोई इल्ज़ाम मिरे सर नहीं रहने वाला मैं ने हालाँकि बहुत वक़्त गुज़ारा है यहाँ अब मैं इस शहर में पल भर नहीं रहने वाला मस्लहत लफ़्ज़ पे दो हर्फ़ न भेजूँ? 'जव्वाद' जब मिरे साथ मुक़द्दर नहीं रहने वाला

Jawwad Sheikh

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ग़म-ए-जहाँ से मैं उकता गया तो क्या होगा ख़ुद अपनी फ़िक्र में घुलने लगा तो क्या होगा ये ना-गुज़ीर है उम्मीद की नुमू के लिए गुज़रता वक़्त कहीं थम गया तो क्या होगा यही बहुत है कि हम को सुकूँ से जीने दे किसी के हाथों हमारा भला तो क्या होगा ये लोग मेरी ख़मोशी पे मुझ से नालाँ हैं कोई ये पूछे मैं गोया हुआ तो क्या होगा मैं इस लिए भी बहुत मुख़्तलिफ़ हूँ लोगों से वो सोचते हैं कि ऐसा हुआ तो क्या होगा जुनूँ की राह अजब है कि पाँव धरने को ज़मीन तक भी नहीं नक़्श-ए-पा तो क्या होगा ये एक ख़ौफ़ भी मेरी ख़ुशी में शामिल है तिरा भी ध्यान अगर हट गया तो क्या होगा जो हो रहा है वो होता चला गया तो फिर? जो होने को है वही हो गया तो क्या होगा

Jawwad Sheikh

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उस ने कोई तो दम पढ़ा हुआ है जिस ने देखा वो मुब्तला हुआ है अब तिरे रास्ते से बच निकलूँ इक यही रास्ता बचा हुआ है आओ तक़रीब-ए-रू-नुमाई करें पाँव में एक आबला हुआ है फिर वही बहस छेड़ देते हो इतनी मुश्किल से राब्ता हुआ है रात की वारदात मत पूछो वाक़ई एक वाक़िआ' हुआ है लग रहा है ये नर्म लहजे से फिर तुझे कोई मसअला हुआ है मैं कहाँ और वो फ़सील कहाँ फ़ासले का ही फ़ैसला हुआ है इतना मसरूफ़ हो गया हूँ कि बस 'मीर' भी इक तरफ़ पड़ा हुआ है आज कुछ भी नहीं हुआ 'जव्वाद' हाँ मगर एक सानेहा हुआ है

Jawwad Sheikh

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तुम अगर सीखना चाहो मुझे बतला देना आम सा फ़न तो कोई है नहीं तोहफ़ा देना एक ही शख़्स है जिस को ये हुनर आता है रूठ जाने पे फ़ज़ा और भी महका देना हुस्न दुनिया में इसी काम को भेजा गया है के जहाँ आग लगी हो उसे भड़का देना उन बुजुर्गो का यही काम हुआ करता था जहाँ ख़ूबी नज़र आई उसे चमका देना दिल बताता है मुझे अक्ल की बातें क्या क्या बंदा पूछे के तेरा है कोई लेना देना और कुछ याद न रहता था लड़ाई में उसे हाँ मगर मेरे गुजिश्ता का हवाला देना उस की फ़ितरत में न था तर्क-ए-त'अल्लुक़ लेकिन दूसरे शख़्स को इस नहद पे पहुँचा देना जानता था कि बहुत ख़ाक उड़ाएगा मेरी कोई आसान नहीं था उसे रस्ता देना क्या पता ख़ुद से छिड़ी जंग कहाँ ले जाए जब भी याद आऊँ मेरी जान का सदका देना

Jawwad Sheikh

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