ghazalKuch Alfaaz

देख कर जोबन तिरा किस किस को हैरानी हुई इस जवानी पर जवानी आप दीवानी हुई पर्दे पर्दे में मोहब्बत दुश्मन-ए-जानी हुई ये ख़ुदा की मार क्या ऐ शौक़-ए-पिन्हानी हुई दिल का सौदा कर के उन से क्या पशेमानी हुई क़द्र उस की फिर कहाँ जिस शय की अर्ज़ानी हुई मेरे घर उस शोख़ की दो दिन से मेहमानी हुई बेकसी की आज कल क्या ख़ाना-वीरानी हुई तर्क-ए-रस्म-ओ-राह पर अफ़्सोस है दोनों तरफ़ हम से नादानी हुई या तुम से नादानी हुई इब्तिदास इंतिहा तक हाल उन से कह तो दूँ फ़िक्र ये है और जो कह कर पशेमानी हुई ग़म क़यामत का नहीं वाइ'ज़ मुझे ये फ़िक्र है दीन कब बाक़ी रहा दुनिया अगर फ़ानी हुई तुम न शब को आओगे ये है यक़ीं आया हुआ तुम न मानोगे मिरी ये बात है मानी हुई मुझ में दम जब तक रहा मुश्किल में थे तीमारदार मेरी आसानी से सब यारों की आसानी हुई इस को क्या कहते हैं उतना ही बढ़ा शौक़-ए-विसाल जिस क़दर मशहूर उन की पाक-दामानी हुई बज़्म से उठने की ग़ैरत बैठने से दिल को रश्क देख कर ग़ैरों का मजमा क्या परेशानी हुई दावा-ए-तस्ख़ीर पर ये उस परी-वश ने कहा आप का दिल क्या हुआ मोहर-ए-सुलेमानी हुई खुल गईं ज़ुल्फ़ें मगर उस शोख़ मस्त-ए-नाज़ की झूमती बाद-ए-सबा फिरती है मस्तानी हुई मैं सरापा सज्दे करता उस के दर पर शौक़ से सर से पा तक क्यूँँ न पेशानी ही पेशानी हुई दिल की क़ल्ब-ए-माहियत का हो उसे क्यूँँकर यक़ीं कब हवा मिट्टी हुई है आग कब पानी हुई आते ही कहते हो अब घर जाएँगे अच्छी कही ये मसल पूरी यहाँ मन-मानी घर जानी हुई अरसा-ए-महशर में तुझ को ढूँड लाऊँ तो सही कोई छुप सकती है जो सूरत हो पहचानी हुई देख कर क़ातिल का ख़ाली हाथ भी जी डर गया उस की चीन-ए-आस्तीं भी चीन-ए-पेशानी हुई खा के धोका उस बुत-ए-कमसिन ने दामन में लिए अश्क-अफ़्शानी भी मेरी गौहर-अफ़्शानी हुई बेकसी पर मेरी अपनी तेग़ की हसरत तो देख चश्म-ए-जौहर भी ब-शक्ल-ए-चश्म-ए-हैरानी हुई बेकसी पर 'दाग़' की अफ़्सोस आता है हमें किस जगह किस वक़्त उस की ख़ाना-वीरानी हुई

Related Ghazal

चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

103 likes

तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

249 likes

बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

196 likes

हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

Rahat Indori

102 likes

ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

102 likes

More from Dagh Dehlvi

राह पर उन को लगा लाए तो हैं बातों में और खुल जाएँगे दो चार मुलाक़ातों में ये भी तुम जानते हो चंद मुलाक़ातों में आज़माया है तुम्हें हम ने कई बातों में ग़ैर के सर की बलाएँ जो नहीं लें ज़ालिम क्या मिरे क़त्ल को भी जान नहीं हाथों में अब्र-ए-रहमत ही बरसता नज़र आया ज़ाहिद ख़ाक उड़ती कभी देखी न ख़राबातों में यारब उस चाँद के टुकड़े को कहाँ से लाऊँ रौशनी जिस की हो इन तारों भरी रातों में तुम्हीं इंसाफ़ से ऐ हज़रत नासेह कह दो लुत्फ़ उन बातों में आता है कि इन बातों में दौड़ कर दस्त-ए-दुआ' साथ दुआ के जाते हाए पैदा न हुए पाँव मिरे हाथों में जल्वा-ए-यार से जब बज़्म में ग़श आया है तो रक़ीबों ने सँभाला है मुझे हाथों में ऐसी तक़रीर सुनी थी न कभी शोख़-ओ-शरीर तेरी आँखों के भी फ़ित्ने हैं तिरी बातों में हम से इनकार हुआ ग़ैर से इक़रार हुआ फ़ैसला ख़ूब किया आप ने दो बातों में हफ़्त अफ़्लाक हैं लेकिन नहीं खुलता ये हिजाब कौन सा दुश्मन-ए-उश्शाक़ हैं इन सातों में और सुनते अभी रिंदों से जनाब-ए-वाइज़ चल दिए आप तो दो-चार सलावातों में हम ने देखा उन्हीं लोगों को तिरा दम भरते जिन की शोहरत थी ये हरगिज़ नहीं इन बातों में भेजे देता है उन्हें इश्क़ मता-ए-दिल-ओ-जाँ एक सरकार लुटी जाती है सौग़ातों में दिल कुछ आगाह तो हो शेवा-ए-अय्यारी से इस लिए आप हम आते हैं तिरी घातों में वस्ल कैसा वो किसी तरह बहलते ही न थे शाम से सुब्ह हुई उन की मुदारातों में वो गए दिन जो रहे याद बुतों की ऐ 'दाग़' रात भर अब तो गुज़रती है मुनाजातों में

Dagh Dehlvi

1 likes

बाक़ी जहाँ में क़ैस न फ़रहाद रह गया अफ़्साना आशिक़ों का फ़क़त याद रह गया ये सख़्त-जाँ तो क़त्ल से नाशाद रह गया ख़ंजर चला तो बाज़ू-ए-जल्लाद रह गया पाबंदियों ने इश्क़ की बेकस रखा मुझे मैं सौ असीरियों में भी आज़ाद रह गया चश्म-ए-सनम ने यूँँ तो बिगाड़े हज़ार घर इक का'बा चंद रोज़ को आबाद रह गया महशर में जा-ए-शिकवा किया शुक्र यार का जो भूलना था मुझ को वही याद रह गया उन की तो बन पड़ी कि लगी जान मुफ़्त हाथ तेरी गिरह में क्या दिल-ए-नाशाद रह गया पुर-नूर हो रहेगा ये ज़ुल्मत-कदा अगर दिल में बुतों का शौक़-ए-ख़ुदा-दाद रह गया यूँँ आँख उन की कर के इशारा पलट गई गोया कि लब से हो के कुछ इरशाद रह गया नासेह का जी चला था हमारी तरह मगर उल्फ़त की देख देख के उफ़्ताद रह गया हैं तेरे दिल में सब के ठिकाने बुरे भले मैं ख़ानुमाँ-ख़राब ही बर्बाद रह गया वो दिन गए कि थी मिरे सीने में कुछ ख़राश अब दिल कहाँ है दिल का निशाँ याद रह गया सूरत को तेरी देख के खिंचती है जान-ए-ख़ल्क़ दिल अपना थाम थाम के बहज़ाद रह गया ऐ 'दाग़' दिल ही दिल में घुले ज़ब्त-ए-इश्क़ से अफ़्सोस शौक़-ए-नाला-ओ-फ़रियाद रह गया

Dagh Dehlvi

0 likes

रंज की जब गुफ़्तुगू होने लगी आप से तुम तुम से तू होने लगी चाहिए पैग़ाम-बर दोनों तरफ़ लुत्फ़ क्या जब दू-ब-दू होने लगी मेरी रुस्वाई की नौबत आ गई उन की शोहरत कू-ब-कू होने लगी है तिरी तस्वीर कितनी बे-हिजाब हर किसी के रू-ब-रू होने लगी ग़ैर के होते भला ऐ शाम-ए-वस्ल क्यूँँ हमारे रू-ब-रू होने लगी ना-उम्मीदी बढ़ गई है इस क़दर आरज़ू की आरज़ू होने लगी अब के मिल कर देखिए क्या रंग हो फिर हमारी जुस्तुजू होने लगी 'दाग़' इतराए हुए फिरते हैं आज शायद उन की आबरू होने लगी

Dagh Dehlvi

1 likes

ये बात बात में क्या नाज़ुकी निकलती है दबी दबी तिरे लब से हँसी निकलती है ठहर ठहर के जला दिल को एक बार न फूँक कि इस में बू-ए-मोहब्बत अभी निकलती है बजाए शिकवा भी देता हूँ मैं दुआ उस को मिरी ज़बाँ से करूँँ क्या यही निकलती है ख़ुशी में हम ने ये शोख़ी कभी नहीं देखी दम-ए-इताब जो रंगत तिरी निकलती है हज़ार बार जो माँगा करो तो क्या हासिल दुआ वही है जो दिल से कभी निकलती है अदास तेरी मगर खिंच रहीं हैं तलवारें निगह निगह से छुरी पर छुरी निकलती है मुहीत-ए-इश्क़ में है क्या उमीद ओ बीम मुझे कि डूब डूब के कश्ती मिरी निकलती है झलक रही है सर-ए-शाख़-ए-मिज़ा ख़ून की बूँद शजर में पहले समर से कली निकलती है शब-ए-फ़िराक़ जो खोले हैं हम ने ज़ख़्म-ए-जिगर ये इंतिज़ार है कब चाँदनी निकलती है समझ तो लीजिए कहने तो दीजिए मतलब बयाँ से पहले ही मुझ पर छुरी निकलती है ये दिल की आग है या दिल के नूर का है ज़ुहूर नफ़स नफ़स में मिरे रौशनी निकलती है कहा जो मैं ने कि मर जाऊँगा तो कहते हैं हमारे ज़ाइचे में ज़िंदगी निकलती है समझने वाले समझते हैं पेच की तक़रीर कि कुछ न कुछ तिरी बातों में फ़ी निकलती है दम-ए-अख़ीर तसव्वुर है किस परी-वश का कि मेरी रूह भी बन कर परी निकलती है सनम-कदे में भी है हुस्न इक ख़ुदाई का कि जो निकलती है सूरत परी निकलती है मिरे निकाले न निकलेगी आरज़ू मेरी जो तुम निकालना चाहो अभी निकलती है ग़म-ए-फ़िराक़ में हो 'दाग़' इस क़दर बेताब ज़रा से रंज में जाँ आप की निकलती है

Dagh Dehlvi

0 likes

दिल को क्या हो गया ख़ुदा जाने क्यूँँ है ऐसा उदास क्या जाने अपने ग़म में भी उस को सरफ़ा है न खिला जाने वो न खा जाने इस तजाहुल का क्या ठिकाना है जान कर जो न मुद्दआ' जाने कह दिया मैं ने राज़-ए-दिल अपना उस को तुम जानो या ख़ुदा जाने क्या ग़रज़ क्यूँँ इधर तवज्जोह हो हाल-ए-दिल आप की बला जाने जानते जानते ही जानेगा मुझ में क्या है अभी वो क्या जाने क्या हम उस बद-गुमाँ से बात करें जो सताइश को भी गिला जाने तुम न पाओगे सादा-दिल मुझ सा जो तग़ाफ़ुल को भी हया जाने है अबस जुर्म-ए-इश्क़ पर इल्ज़ाम जब ख़ता-वार भी ख़ता जाने नहीं कोताह दामन-ए-उम्मीद आगे अब दस्त-ए-ना-रसा जाने जो हो अच्छा हज़ार अच्छों का वाइ'ज़ उस बुत को तू बुरा जाने की मिरी क़द्र मिस्ल-ए-शाह-ए-दकन किसी नव्वाब ने न राजा ने उस से उट्ठेगी क्या मुसीबत-ए-इश्क़ इब्तिदा को जो इंतिहा जाने 'दाग़' से कह दो अब न घबराओ काम अपना बता हुआ जाने

Dagh Dehlvi

2 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Dagh Dehlvi.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Dagh Dehlvi's ghazal.