दिल दे रहा था जो उसे बे-दिल बना दिया आसान काम आप ने मुश्किल बना दिया हर साँस एक शो'ला है हर शो'ला एक बर्क़ क्या तू ने मुझ को ऐ तपिश-ए-दिल बना दिया इस हुस्न-ए-ज़न पे हम-सफ़रों के हूँ पा-ब-गिल मुझ बे-ख़बर को रहबर-ए-मंज़िल बना दिया अंधा है शौक़ फिर नज़र इम्कान पर हो क्यूँँ काम अपना दिल ने आप ही मुश्किल बना दिया दौड़ा लहू रगों में बंधी ज़िंदगी की आस ये भी बुरा नहीं है जो बिस्मिल बना दिया ग़र्क़ ओ उबूर दोनों का हासिल है ख़त्म-ए-कार मजबूरियों ने मौज को साहिल बना दिया उस शान-ए-आजिज़ी के फ़िदा जिस ने 'आरज़ू' हर नाज़ हर ग़ुरूर के क़ाबिल बना दिया
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सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं सुना है रब्त है उस को ख़राब-हालों से सो अपने आप को बर्बाद कर के देखते हैं सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उस की सो हम भी उस की गली से गुज़र के देखते हैं सुना है उस को भी है शे'र ओ शा'इरी से शग़फ़ सो हम भी मो'जिज़े अपने हुनर के देखते हैं सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं सुना है हश्र हैं उस की ग़ज़ाल सी आँखें सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उस की सुना है शाम को साए गुज़र के देखते हैं सुना है उस की सियह-चश्मगी क़यामत है सो उस को सुरमा-फ़रोश आह भर के देखते हैं सुना है उस के लबों से गुलाब जलते हैं सो हम बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं सुना है आइना तिमसाल है जबीं उस की जो सादा दिल हैं उसे बन-सँवर के देखते हैं सुना है जब से हमाइल हैं उस की गर्दन में मिज़ाज और ही लाल ओ गुहर के देखते हैं सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में पलंग ज़ाविए उस की कमर के देखते हैं सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं वो सर्व-क़द है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं कि उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं बस इक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का सो रह-रवान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं सुना है उस के शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त मकीं उधर के भी जल्वे इधर के देखते हैं रुके तो गर्दिशें उस का तवाफ़ करती हैं चले तो उस को ज़माने ठहर के देखते हैं किसे नसीब कि बे-पैरहन उसे देखे कभी कभी दर ओ दीवार घर के देखते हैं कहानियाँ ही सही सब मुबालग़े ही सही अगर वो ख़्वाब है ता'बीर कर के देखते हैं अब उस के शहर में ठहरें कि कूच कर जाएँ 'फ़राज़' आओ सितारे सफ़र के देखते हैं
Ahmad Faraz
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मेरे लिए तो इश्क़ का वा'दा है शा'इरी आधा सुरूर तुम हो तो आधा है शा'इरी रुद्राक्ष हाथ में है तो सीने में ओम है कृष्णा है मेरा दिल मेरी राधा है शा'इरी अपना तो मेल जोल ही बस आशिकों से है दरवेश का बस एक लबादा है शा'इरी हो आश्ना कोई तो दिखाती है अपना रंग बे रम्ज़ियों के वास्ते सादा है शा'इरी तुम सामने हो और मेरी दस्तरस में हो इस वक़्त मेरे दिल का इरादा है शा'इरी भगवान हो ख़ुदा हो मुहब्बत हो या बदन जिस सम्त भी चलो यही जादा है शा'इरी इस लिए भी इश्क़ ही लिखता हूँ मैं अली मेरा किसी से आख़री वा'दा है शा'इरी
Ali Zaryoun
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आईने आँख में चुभते थे बिस्तर से बदन कतराता था एक याद बसर करती थी मुझे मैं साँस नहीं ले पाता था एक शख़्स के हाथ में था सब कुछ मेरा खिलना भी मुरझाना भी रोता था तो रात उजड़ जाती हँसता था तो दिन बन जाता था मैं रब से राब्ते में रहता मुमकिन है की उस से राब्ता हो मुझे हाथ उठाना पड़ते थे तब जा कर वो फोन उठाता था मुझे आज भी याद है बचपन में कभी उस पर नजर अगर पड़ती मेरे बस्ते से फूल बरसते थे मेरी तख्ती पे दिल बन जाता था हम एक ज़िंदान में ज़िंदा थे हम एक जंजीर में बढ़े हुए एक दूसरे को देख कर हम कभी हंसते थे तो रोना आता था वो जिस्म नज़र-अंदाज़ नहीं हो पाता था इन आँखों से मुजरिम ठहराता था अपना कहने को तो घर ठहराता था
Tehzeeb Hafi
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मेरे दिल में ये तेरे सिवा कौन है? तू नहीं है तो तेरी जगह कौन है? हम मोहब्बत में हारे हुए लोग हैं और मोहब्बत में जीता हुआ कौन है? मेरे पहलू से उठ के गया कौन है? तू नहीं है तो तेरी जगह कौन है? तू ने जाते हुए ये बताया नहीं मैं तेरा कौन हूँ तू मेरा कौन है
Tehzeeb Hafi
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महीनों बा'द दफ्तर आ रहे हैं हम एक सद में से बाहर आ रहे हैं तेरी बाहों से दिल उकता गया हैं अब इस झूले में चक्कर आ रहे हैं कहाँ सोया है चौकीदार मेरा ये कैसे लोग अंदर आ रहे हैं समुंदर कर चुका तस्लीम हम को खजाने ख़ुद ही ऊपर आ रहे हैं यही एक दिन बचा था देखने को उसे बस में बिठा कर आ रहे हैं
Tehzeeb Hafi
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भोले बन कर हाल न पूछो बहते हैं अश्क तो बहने दो जिस से बढ़े बेचैनी दिल की ऐसी तसल्ली रहने दो रस्में इस अंधेर-नगर की नई नहीं ये पुरानी हैं मेहर पे डालो रात का पर्दा माह को रौशन रहने दो रूह निकल कर बाग़-ए-जहाँ से बाग़-ए-जिनाँ में जा पहुँचे चेहरे पे अपने मेरी निगाहें इतनी देर तो रहने दो ख़ंदा-ए-गुल बुलबुल में होगा गुल में नग़्मा बुलबुल का क़िस्सा एक ज़बानें दो हैं आप कहो या कहने दो इतना जुनून-ए-शौक़ दिया क्यूँँ ख़ौफ़ जो था रुस्वाई का बात करो ख़ुद क़ाबिल-ए-शिकवा उल्टे मुझ को रहने दो
Arzoo Lakhnavi
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मासूम नज़र का भोला-पन ललचा के लुभाना क्या जाने दिल आप निशाना बनता है वो तीर चलाना क्या जाने कह जाती है क्या वो चीन-ए-जबीं ये आज समझ सकते हैं कहीं कुछ सीखा हुआ तो काम नहीं दिल नाज़ उठाना क्या जाने चटकी जो कली कोयल कूकी उल्फ़त की कहानी ख़त्म हुई क्या किस ने कही क्या किस ने सुनी ये बता ज़माना क्या जाने था दैर-ओ-हरम में क्या रखा जिस सम्त गया टकरा के फिरा किस पर्दे के पीछे है शोअ'ला अंधा परवाना क्या जाने ये ज़ोरा-ज़ोरी इश्क़ की थी फ़ितरत ही जिस ने बदल डाली जलता हुआ दिल हो कर पानी आँसू बन जाना क्या जाने सज्दों से पड़ा पत्थर में गढ़ा लेकिन न मिटा माथे का लिखा करने को ग़रीब ने क्या न किया तक़दीर बनाना क्या जाने आँखों की अंधी ख़ुद-ग़र्ज़ी काहे को समझने देगी कभी जो नींद उड़ा दे रातों की वो ख़्वाब में आना क्या जाने पत्थर की लकीर है नक़्श-ए-वफ़ा आईना न जानो तलवों का लहराया करे रंगीं-शोला दिल पलटे खाना क्या जाने जिस नाले से दुनिया बेकल है वो जलते दिल की मशअल है जो पहला लूका ख़ुद न सहे वो आग लगाना क्या जाने हम 'आरज़ू' आए बैठे हैं और वो शरमाए बैठे हैं मुश्ताक़-नज़र गुस्ताख़ नहीं पर्दा सरकाना क्या जाने
Arzoo Lakhnavi
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आराम के थे साथी क्या क्या जब वक़्त पड़ा तो कोई नहीं सब दोस्त हैं अपने मतलब के दुनिया में किसी का कोई नहीं गुल-गश्त में दामन मुँह पे न लो नर्गिस से हया क्या है तुम को उस आँख से पर्दा करते हो जिस आँख में पर्दा कोई नहीं जो बाग़ था कल फूलों से भरा अटखेलियों से चलती थी सबा अब सुम्बुल ओ गुल का ज़िक्र तो क्या ख़ाक उड़ती है उस जा कोई नहीं कल जिन को अंधेरे से था हज़र रहता था चराग़ाँ पेश-ए-नज़र इक शम्अ' जला दे तुर्बत पर जुज़ दाग़ अब इतना कोई नहीं जब बंद हुईं आँखें तो खुला दो रोज़ का था सारा झगड़ा तख़्त उस का न अब है ताज उस का अस्कंदर ओ दारा कोई नहीं क़त्ताल-ए-जहाँ माशूक़ जो थे सूने पड़े हैं मरक़द उन के या मरने वाले लाखों थे या रोने वाला कोई नहीं ऐ 'आरज़ू' अब तक इतना पता चलता है तिरी बर्बादी का जिस से न बगूले हों पैदा इस तरह का सहरा कोई नहीं
Arzoo Lakhnavi
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जिन रातों में नींद उड़ जाती है क्या क़हर की रातें होती हैं दरवाज़ों से टकरा जाते हैं दीवारों से बातें होती हैं आशोब-ए-जुदाई क्या कहिए अन-होनी बातें होती हैं आँखों में अँधेरा छाता है जब उजाली रातें होती हैं जब वो नहीं होते पहलू में और लंबी रातें होती हैं याद आ के सताती रहती है और दिल से बातें होती हैं घिर घिर के बादल आते हैं और बे-बरसे खुल जाते हैं उम्मीदों की झूटी दुनिया में सूखी बरसातें होती हैं उम्मीद का सूरज डूबा है आँखों में अँधेरा छाया है दुनिया-ए-फ़िराक़ में दिन कैसा रातें ही रातें होती हैं तय करना हैं झगड़े जीने के जिस तरह बने कहते सुनते बहरों से भी पाला पड़ता है गूँगों से भी बातें होती हैं आँखों में कहाँ रस की बूँदें कुछ है तो लहू की लाली है इस बदली हुई रुत में अब तो ख़ूनीं बरसातें होती हैं क़िस्मत जागे तो हम सोएँ क़िस्मत सोए तो हम जागें दोनों ही को नींद आए जिस में कब ऐसी रातें होती हैं जो कान लगा कर सुनते हैं क्या जानें रुमूज़ मोहब्बत के अब होंट नहीं हिलने पाते और पहरों बातें होती हैं जो नाज़ है वो अपनाता है जो ग़म्ज़ा है वो लुभाता है इन रंग-बिरंगी पर्दों में घातों पर घातें होती हैं हँसने में जो आँसू आते हैं नैरंग-ए-जहाँ बतलाते हैं हर रोज़ जनाज़े जाते हैं हर रोज़ बरातें होती हैं जो कुछ भी ख़ुशी से होता है ये दिल का बोझ न बन जाए पैमान-ए-वफ़ा भी रहने दो सब झूटी बातें होती हैं जब तक है दिलों में सच्चाई सब नाज़-ओ-नियाज़ वहीं तक हैं जब ख़ुद-ग़र्ज़ी आ जाती है जुल होते हैं घातें होती हैं हिम्मत किस की है जो पूछे ये 'आरज़ू'-ए-सौदाई से क्यूँँ साहब आख़िर अकेले में ये किस से बातें होती हैं
Arzoo Lakhnavi
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आज बे-आप हो गए हम भी आप को पा के खो गए हम भी दाने कम थे दुखों की सिमरन में थोड़े मोती पिरो गए हम भी देर से थे वो जिस के घेरे में उसी झुरमुट में खो गए हम भी जा कै ढूँडा कहाँ कहाँ न तुम्हें जब न पाया तो खो गए हम भी नाम जीने का जागना रख कर आज बे नींद सो गए हम भी रोएँगे गर तो जग-हँसाई हो करते क्या चुप से हो गए हम भी हाए रे 'आरज़ू' की बे-आसी आप बे-बस थे रो गए हम भी
Arzoo Lakhnavi
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