ghazalKuch Alfaaz

आराम के थे साथी क्या क्या जब वक़्त पड़ा तो कोई नहीं सब दोस्त हैं अपने मतलब के दुनिया में किसी का कोई नहीं गुल-गश्त में दामन मुँह पे न लो नर्गिस से हया क्या है तुम को उस आँख से पर्दा करते हो जिस आँख में पर्दा कोई नहीं जो बाग़ था कल फूलों से भरा अटखेलियों से चलती थी सबा अब सुम्बुल ओ गुल का ज़िक्र तो क्या ख़ाक उड़ती है उस जा कोई नहीं कल जिन को अंधेरे से था हज़र रहता था चराग़ाँ पेश-ए-नज़र इक शम्अ' जला दे तुर्बत पर जुज़ दाग़ अब इतना कोई नहीं जब बंद हुईं आँखें तो खुला दो रोज़ का था सारा झगड़ा तख़्त उस का न अब है ताज उस का अस्कंदर ओ दारा कोई नहीं क़त्ताल-ए-जहाँ माशूक़ जो थे सूने पड़े हैं मरक़द उन के या मरने वाले लाखों थे या रोने वाला कोई नहीं ऐ 'आरज़ू' अब तक इतना पता चलता है तिरी बर्बादी का जिस से न बगूले हों पैदा इस तरह का सहरा कोई नहीं

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं तुझे हर बहाने से हम देखते हैं हमारी तरफ़ अब वो कम देखते हैं वो नज़रें नहीं जिन को हम देखते हैं ज़माने के क्या क्या सितम देखते हैं हमीं जानते हैं जो हम देखते हैं

Dagh Dehlvi

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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा

Hasan Abbasi

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भोले बन कर हाल न पूछो बहते हैं अश्क तो बहने दो जिस से बढ़े बेचैनी दिल की ऐसी तसल्ली रहने दो रस्में इस अंधेर-नगर की नई नहीं ये पुरानी हैं मेहर पे डालो रात का पर्दा माह को रौशन रहने दो रूह निकल कर बाग़-ए-जहाँ से बाग़-ए-जिनाँ में जा पहुँचे चेहरे पे अपने मेरी निगाहें इतनी देर तो रहने दो ख़ंदा-ए-गुल बुलबुल में होगा गुल में नग़्मा बुलबुल का क़िस्सा एक ज़बानें दो हैं आप कहो या कहने दो इतना जुनून-ए-शौक़ दिया क्यूँँ ख़ौफ़ जो था रुस्वाई का बात करो ख़ुद क़ाबिल-ए-शिकवा उल्टे मुझ को रहने दो

Arzoo Lakhnavi

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मासूम नज़र का भोला-पन ललचा के लुभाना क्या जाने दिल आप निशाना बनता है वो तीर चलाना क्या जाने कह जाती है क्या वो चीन-ए-जबीं ये आज समझ सकते हैं कहीं कुछ सीखा हुआ तो काम नहीं दिल नाज़ उठाना क्या जाने चटकी जो कली कोयल कूकी उल्फ़त की कहानी ख़त्म हुई क्या किस ने कही क्या किस ने सुनी ये बता ज़माना क्या जाने था दैर-ओ-हरम में क्या रखा जिस सम्त गया टकरा के फिरा किस पर्दे के पीछे है शोअ'ला अंधा परवाना क्या जाने ये ज़ोरा-ज़ोरी इश्क़ की थी फ़ितरत ही जिस ने बदल डाली जलता हुआ दिल हो कर पानी आँसू बन जाना क्या जाने सज्दों से पड़ा पत्थर में गढ़ा लेकिन न मिटा माथे का लिखा करने को ग़रीब ने क्या न किया तक़दीर बनाना क्या जाने आँखों की अंधी ख़ुद-ग़र्ज़ी काहे को समझने देगी कभी जो नींद उड़ा दे रातों की वो ख़्वाब में आना क्या जाने पत्थर की लकीर है नक़्श-ए-वफ़ा आईना न जानो तलवों का लहराया करे रंगीं-शोला दिल पलटे खाना क्या जाने जिस नाले से दुनिया बेकल है वो जलते दिल की मशअल है जो पहला लूका ख़ुद न सहे वो आग लगाना क्या जाने हम 'आरज़ू' आए बैठे हैं और वो शरमाए बैठे हैं मुश्ताक़-नज़र गुस्ताख़ नहीं पर्दा सरकाना क्या जाने

Arzoo Lakhnavi

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दिल दे रहा था जो उसे बे-दिल बना दिया आसान काम आप ने मुश्किल बना दिया हर साँस एक शो'ला है हर शो'ला एक बर्क़ क्या तू ने मुझ को ऐ तपिश-ए-दिल बना दिया इस हुस्न-ए-ज़न पे हम-सफ़रों के हूँ पा-ब-गिल मुझ बे-ख़बर को रहबर-ए-मंज़िल बना दिया अंधा है शौक़ फिर नज़र इम्कान पर हो क्यूँँ काम अपना दिल ने आप ही मुश्किल बना दिया दौड़ा लहू रगों में बंधी ज़िंदगी की आस ये भी बुरा नहीं है जो बिस्मिल बना दिया ग़र्क़ ओ उबूर दोनों का हासिल है ख़त्म-ए-कार मजबूरियों ने मौज को साहिल बना दिया उस शान-ए-आजिज़ी के फ़िदा जिस ने 'आरज़ू' हर नाज़ हर ग़ुरूर के क़ाबिल बना दिया

Arzoo Lakhnavi

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आने में झिझक मिलने में हया तुम और कहीं हम और कहीं अब अहद-ए-वफ़ा टूटा कि रहा तुम और कहीं हम और कहीं बे-आप ख़ुशी से एक इधर कुछ खोया हुआ सा एक उधर ज़ाहिर में बहम बातिन में जुदा तुम और कहीं हम और कहीं आए तो ख़ुशामद से आए बैठे तो मुरव्वत से बैठे मिलना ही ये क्या जब दिल न मिला तुम और कहीं हम और कहीं वअदा भी किया तो की न वफ़ा आता है तुम्हें चर्कों में मज़ा छोड़ो भी ये ज़िद लुत्फ़ इस में है क्या तुम और कहीं हम और कहीं बरगश्ता-नसीब का यूँँ होना सोना भी तो इक करवट सोना कब तक ये जुदाई का रोना तुम और कहीं हम और कहीं दिल मिलने पे भी पहलू न मिला दुश्मन तो बग़ल ही में है छुपा क़ातिल है मोहब्बत की ये हया तुम और कहीं हम और कहीं यकसूई-ए-दिल मर्ग़ूब हमें बर्बादी-ए-दिल मतलूब तुम्हें इस ज़िद का है और अंजाम ही क्या तुम और कहीं हम और कहीं दिल से है अगर क़ाएम रिश्ता तो दूर-ओ-क़रीब की बहस ही क्या है ये भी निगाहों का धोका तुम और कहीं हम और कहीं सुन रक्खो क़ब्ल-ए-अहद-ए-वफ़ा क़ौल आरज़ू-ए-शैदाई का जन्नत भी है दोज़ख़ गर ये हुआ तुम और कहीं हम और कहीं

Arzoo Lakhnavi

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आज बे-आप हो गए हम भी आप को पा के खो गए हम भी दाने कम थे दुखों की सिमरन में थोड़े मोती पिरो गए हम भी देर से थे वो जिस के घेरे में उसी झुरमुट में खो गए हम भी जा कै ढूँडा कहाँ कहाँ न तुम्हें जब न पाया तो खो गए हम भी नाम जीने का जागना रख कर आज बे नींद सो गए हम भी रोएँगे गर तो जग-हँसाई हो करते क्या चुप से हो गए हम भी हाए रे 'आरज़ू' की बे-आसी आप बे-बस थे रो गए हम भी

Arzoo Lakhnavi

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