मासूम नज़र का भोला-पन ललचा के लुभाना क्या जाने दिल आप निशाना बनता है वो तीर चलाना क्या जाने कह जाती है क्या वो चीन-ए-जबीं ये आज समझ सकते हैं कहीं कुछ सीखा हुआ तो काम नहीं दिल नाज़ उठाना क्या जाने चटकी जो कली कोयल कूकी उल्फ़त की कहानी ख़त्म हुई क्या किस ने कही क्या किस ने सुनी ये बता ज़माना क्या जाने था दैर-ओ-हरम में क्या रखा जिस सम्त गया टकरा के फिरा किस पर्दे के पीछे है शोअ'ला अंधा परवाना क्या जाने ये ज़ोरा-ज़ोरी इश्क़ की थी फ़ितरत ही जिस ने बदल डाली जलता हुआ दिल हो कर पानी आँसू बन जाना क्या जाने सज्दों से पड़ा पत्थर में गढ़ा लेकिन न मिटा माथे का लिखा करने को ग़रीब ने क्या न किया तक़दीर बनाना क्या जाने आँखों की अंधी ख़ुद-ग़र्ज़ी काहे को समझने देगी कभी जो नींद उड़ा दे रातों की वो ख़्वाब में आना क्या जाने पत्थर की लकीर है नक़्श-ए-वफ़ा आईना न जानो तलवों का लहराया करे रंगीं-शोला दिल पलटे खाना क्या जाने जिस नाले से दुनिया बेकल है वो जलते दिल की मशअल है जो पहला लूका ख़ुद न सहे वो आग लगाना क्या जाने हम 'आरज़ू' आए बैठे हैं और वो शरमाए बैठे हैं मुश्ताक़-नज़र गुस्ताख़ नहीं पर्दा सरकाना क्या जाने
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं तुझे हर बहाने से हम देखते हैं हमारी तरफ़ अब वो कम देखते हैं वो नज़रें नहीं जिन को हम देखते हैं ज़माने के क्या क्या सितम देखते हैं हमीं जानते हैं जो हम देखते हैं
Dagh Dehlvi
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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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थोड़ा लिक्खा और ज़ियादा छोड़ दिया आने वालों के लिए रस्ता छोड़ दिया तुम क्या जानो उस दरिया पर क्या गुज़री तुम ने तो बस पानी भरना छोड़ दिया लड़कियाँ इश्क़ में कितनी पागल होती हैं फ़ोन बजा और चूल्हा जलता छोड़ दिया रोज़ इक पत्ता मुझ में आ गिरता है जब से मैं ने जंगल जाना छोड़ दिया बस कानों पर हाथ रखे थे थोड़ी देर और फिर उस आवाज़ ने पीछा छोड़ दिए
Tehzeeb Hafi
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भोले बन कर हाल न पूछो बहते हैं अश्क तो बहने दो जिस से बढ़े बेचैनी दिल की ऐसी तसल्ली रहने दो रस्में इस अंधेर-नगर की नई नहीं ये पुरानी हैं मेहर पे डालो रात का पर्दा माह को रौशन रहने दो रूह निकल कर बाग़-ए-जहाँ से बाग़-ए-जिनाँ में जा पहुँचे चेहरे पे अपने मेरी निगाहें इतनी देर तो रहने दो ख़ंदा-ए-गुल बुलबुल में होगा गुल में नग़्मा बुलबुल का क़िस्सा एक ज़बानें दो हैं आप कहो या कहने दो इतना जुनून-ए-शौक़ दिया क्यूँँ ख़ौफ़ जो था रुस्वाई का बात करो ख़ुद क़ाबिल-ए-शिकवा उल्टे मुझ को रहने दो
Arzoo Lakhnavi
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दिल दे रहा था जो उसे बे-दिल बना दिया आसान काम आप ने मुश्किल बना दिया हर साँस एक शो'ला है हर शो'ला एक बर्क़ क्या तू ने मुझ को ऐ तपिश-ए-दिल बना दिया इस हुस्न-ए-ज़न पे हम-सफ़रों के हूँ पा-ब-गिल मुझ बे-ख़बर को रहबर-ए-मंज़िल बना दिया अंधा है शौक़ फिर नज़र इम्कान पर हो क्यूँँ काम अपना दिल ने आप ही मुश्किल बना दिया दौड़ा लहू रगों में बंधी ज़िंदगी की आस ये भी बुरा नहीं है जो बिस्मिल बना दिया ग़र्क़ ओ उबूर दोनों का हासिल है ख़त्म-ए-कार मजबूरियों ने मौज को साहिल बना दिया उस शान-ए-आजिज़ी के फ़िदा जिस ने 'आरज़ू' हर नाज़ हर ग़ुरूर के क़ाबिल बना दिया
Arzoo Lakhnavi
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आराम के थे साथी क्या क्या जब वक़्त पड़ा तो कोई नहीं सब दोस्त हैं अपने मतलब के दुनिया में किसी का कोई नहीं गुल-गश्त में दामन मुँह पे न लो नर्गिस से हया क्या है तुम को उस आँख से पर्दा करते हो जिस आँख में पर्दा कोई नहीं जो बाग़ था कल फूलों से भरा अटखेलियों से चलती थी सबा अब सुम्बुल ओ गुल का ज़िक्र तो क्या ख़ाक उड़ती है उस जा कोई नहीं कल जिन को अंधेरे से था हज़र रहता था चराग़ाँ पेश-ए-नज़र इक शम्अ' जला दे तुर्बत पर जुज़ दाग़ अब इतना कोई नहीं जब बंद हुईं आँखें तो खुला दो रोज़ का था सारा झगड़ा तख़्त उस का न अब है ताज उस का अस्कंदर ओ दारा कोई नहीं क़त्ताल-ए-जहाँ माशूक़ जो थे सूने पड़े हैं मरक़द उन के या मरने वाले लाखों थे या रोने वाला कोई नहीं ऐ 'आरज़ू' अब तक इतना पता चलता है तिरी बर्बादी का जिस से न बगूले हों पैदा इस तरह का सहरा कोई नहीं
Arzoo Lakhnavi
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आज बे-आप हो गए हम भी आप को पा के खो गए हम भी दाने कम थे दुखों की सिमरन में थोड़े मोती पिरो गए हम भी देर से थे वो जिस के घेरे में उसी झुरमुट में खो गए हम भी जा कै ढूँडा कहाँ कहाँ न तुम्हें जब न पाया तो खो गए हम भी नाम जीने का जागना रख कर आज बे नींद सो गए हम भी रोएँगे गर तो जग-हँसाई हो करते क्या चुप से हो गए हम भी हाए रे 'आरज़ू' की बे-आसी आप बे-बस थे रो गए हम भी
Arzoo Lakhnavi
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जिन रातों में नींद उड़ जाती है क्या क़हर की रातें होती हैं दरवाज़ों से टकरा जाते हैं दीवारों से बातें होती हैं आशोब-ए-जुदाई क्या कहिए अन-होनी बातें होती हैं आँखों में अँधेरा छाता है जब उजाली रातें होती हैं जब वो नहीं होते पहलू में और लंबी रातें होती हैं याद आ के सताती रहती है और दिल से बातें होती हैं घिर घिर के बादल आते हैं और बे-बरसे खुल जाते हैं उम्मीदों की झूटी दुनिया में सूखी बरसातें होती हैं उम्मीद का सूरज डूबा है आँखों में अँधेरा छाया है दुनिया-ए-फ़िराक़ में दिन कैसा रातें ही रातें होती हैं तय करना हैं झगड़े जीने के जिस तरह बने कहते सुनते बहरों से भी पाला पड़ता है गूँगों से भी बातें होती हैं आँखों में कहाँ रस की बूँदें कुछ है तो लहू की लाली है इस बदली हुई रुत में अब तो ख़ूनीं बरसातें होती हैं क़िस्मत जागे तो हम सोएँ क़िस्मत सोए तो हम जागें दोनों ही को नींद आए जिस में कब ऐसी रातें होती हैं जो कान लगा कर सुनते हैं क्या जानें रुमूज़ मोहब्बत के अब होंट नहीं हिलने पाते और पहरों बातें होती हैं जो नाज़ है वो अपनाता है जो ग़म्ज़ा है वो लुभाता है इन रंग-बिरंगी पर्दों में घातों पर घातें होती हैं हँसने में जो आँसू आते हैं नैरंग-ए-जहाँ बतलाते हैं हर रोज़ जनाज़े जाते हैं हर रोज़ बरातें होती हैं जो कुछ भी ख़ुशी से होता है ये दिल का बोझ न बन जाए पैमान-ए-वफ़ा भी रहने दो सब झूटी बातें होती हैं जब तक है दिलों में सच्चाई सब नाज़-ओ-नियाज़ वहीं तक हैं जब ख़ुद-ग़र्ज़ी आ जाती है जुल होते हैं घातें होती हैं हिम्मत किस की है जो पूछे ये 'आरज़ू'-ए-सौदाई से क्यूँँ साहब आख़िर अकेले में ये किस से बातें होती हैं
Arzoo Lakhnavi
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