dil ko darun-e-khana hi bahlao ghar raho tum ko qasam hai bhiid men mat jaao ghar raho zinda rahe to yaar bahut mahfilen bahut filhal mere anjuman-arao! ghar raho maana ki iid milna bhi dastur hai magar sinon se lag ke maut na phailao ghar raho chaukhat na paar karna ki bahar hai qatl-e-am galiyon men chal rahi hai ajal daav ghar raho mahbub ko bhi le ke maroge tum apne saath gar ishq hai to ishq na jatlao ghar raho dariya-e-khun hai qariya-o-bazar men ravan tah kar ke rakh do yaaro abhi naav ghar raho ik mufti-e-sakhi ka hai fatva ki thiik hai ghar rah ke chahe mai hi piye jaao ghar raho faris! hamen bhi shauq-e-mulaqat hai magar puure karenge baad men sab chaav ghar raho dil ko darun-e-khana hi bahlao ghar raho tum ko qasam hai bhid mein mat jao ghar raho zinda rahe to yar bahut mahfilen bahut filhaal mere anjuman-arao! ghar raho mana ki id milna bhi dastur hai magar sinon se lag ke maut na phailao ghar raho chaukhat na par karna ki bahar hai qatl-e-am galiyon mein chal rahi hai ajal daw ghar raho mahbub ko bhi le ke maroge tum apne sath gar ishq hai to ishq na jatlao ghar raho dariya-e-khun hai qariya-o-bazar mein rawan tah kar ke rakh do yaro abhi naw ghar raho ek mufti-e-sakhi ka hai fatwa ki thik hai ghar rah ke chahe mai hi piye jao ghar raho faris! hamein bhi shauq-e-mulaqat hai magar pure karenge baad mein sab chaw ghar raho
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
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यही दुआ है यही है सलाम इश्क़ ब-ख़ैर मिरे सभी रुफ़क़ा-ए-किराम इश्क़ ब-ख़ैर दयार-ए-हिज्र की सूनी उदास गलियों में पुकारता है कोई सुब्ह-ओ-शाम इश्क़ ब-ख़ैर मैं कर रहा था दुआ की गुज़ारिशें उस से सो कह गई है उदासी की शाम इश्क़ ब-ख़ैर बड़े अजीब हैं शहर-ए-जुनूँ के बाशिंदे हमेशा कहते हैं बा'द-अज़-सलाम इश्क़ ब-ख़ैर ये रह ज़रूर तुम्हारे ही घर को जाती है लिखा हुआ है यहाँ गाम गाम इश्क़ ब-ख़ैर बयान की है ग़ज़ल-वार दास्तान-ए-इश्क़ सो इस किताब का रक्खा है नाम इश्क़ ब-ख़ैर उफ़ुक़ के पार मुझे याद कर रहा है कोई अभी मिला है उधर से पयाम-ए-इश्क़ ब-ख़ैर
Rehman Faris
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मुझे ग़रज़ है सितारे न माहताब के साथ चमक रहा है ये दिल पूरी आब-ओ-ताब के साथ नपी-तुली सी मोहब्बत लगा बँधा सा करम निभा रहे हो तअ'ल्लुक़ बड़े हिसाब के साथ मैं इस लिए नहीं थकता तिरे तआक़ुब से मुझे यक़ीं है कि पानी भी है सराब के साथ सवाल-ए-वस्ल पे इनकार करने वाले सुन सवाल ख़त्म नहीं होगा इस जवाब के साथ ख़मोश झील के पानी में वो उदासी थी कि दिल भी डूब गया रात माहताब के साथ जता दिया कि मोहब्बत में ग़म भी होते हैं दिया गुलाब तो काँटे भी थे गुलाब के साथ मैं ले उड़ूँगा तिरे ख़द्द-ओ-ख़ाल से ता'बीर न देख मेरी तरफ़ चश्म-ए-नीम-ख़्वाब के साथ अरे ये सिर्फ़ बहाना है बात करने का मिरी मजाल कि झगड़ा करूँँ जनाब के साथ विसाल-ओ-हिज्र की सरहद पे झुट-पुटे में कहीं वो बे-हिजाब हुआ था मगर हिजाब के साथ शिकस्ता आइना देखा फिर अपना दिल देखा दिखाई दी मुझे ता'बीर-ए-ख़्वाब ख़्वाब के साथ वहाँ मिलूँगा जहाँ दोनों वक़्त मिलते हैं मैं कम-नसीब तिरे जैसे कामयाब के साथ दयार-ए-हिज्र के रोज़ा-गुज़ार चाहते हैं कि रोज़ा खोलें तिरे और शराब-ए-नाब के साथ तुम अच्छी दोस्त हो सो मेरा मशवरा ये है मिला-जुला न करो 'फ़ारिस'-ए-ख़राब के साथ
Rehman Faris
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नज़र उठाएँ तो क्या क्या फ़साना बनता है सौ पेश-ए-यार निगाहें झुकाना बनता है वो लाख बे-ख़बर-ओ-बे-वफ़ा सही लेकिन तलब किया है गर उस ने तो जाना बनता है रगों तलक उतर आई है ज़ुल्मत-ए-शब-ए-ग़म सो अब चराग़ नहीं दिल जलाना बनता है पराई आग मिरा घर जला रही है सो अब ख़मोश रहना नहीं ग़ुल मचाना बनता है क़दम क़दम पे तवाज़ुन की बात मत कीजे ये मय-कदा है यहाँ लड़खड़ाना बनता है बिछड़ने वाले तुझे किस तरह बताऊँ मैं कि याद आना नहीं तेरा आना बनता है ये देख कर कि तिरे आशिक़ों में मैं भी हूँ जमाल-ए-यार तिरा मुस्कुराना बनता है जुनूँ भी सिर्फ़ दिखावा है वहशतें भी ग़लत दिवाना है नहीं 'फ़ारिस' दिवाना बनता है
Rehman Faris
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सर-ब-सर यार की मर्ज़ी पे फ़िदा हो जाना क्या ग़ज़ब काम है राज़ी-ब-रज़ा हो जाना बंद आँखों वो चले आएँ तो वा हो जाना और यूँँ फूट के रोना कि फ़ना हो जाना इश्क़ में काम नहीं ज़ोर-ज़बरदस्ती का जब भी तुम चाहो जुदा होना जुदा हो जाना तेरी जानिब है ब-तदरीज तरक़्क़ी मेरी मेरे होने की है मे'राज तिरा हो जाना तेरे आने की बशारत के सिवा कुछ भी नहीं बाग़ में सूखे दरख़्तों का हरा हो जाना इक निशानी है किसी शहर की बर्बादी की नारवा बात का यक-लख़्त रवा हो जाना तंग आ जाऊँ मोहब्बत से तो गाहे गाहे अच्छा लगता है मुझे तेरा ख़फ़ा हो जाना सी दिए जाएँ मिरे होंट तो ऐ जान-ए-ग़ज़ल ऐसा करना मिरी आँखों से अदा हो जाना बे-नियाज़ी भी वही और तअ'ल्लुक़ भी वही तुम्हें आता है मोहब्बत में ख़ुदा हो जाना अज़दहा बन के रग-ओ-पै को जकड़ लेता है इतना आसान नहीं ग़म से रिहा हो जाना अच्छे अच्छों पे बुरे दिन हैं लिहाज़ा 'फ़ारिस' अच्छे होने से तो अच्छा है बुरा हो जाना
Rehman Faris
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रात आ बैठी है पहलू में सितारो तख़लिया अब हमें दरकार है ख़ल्वत सो यारो तख़लिया आँख वा है और हुस्न-ए-यार है पेश-ए-नज़र शश-जिहत के बाक़ी-माँदा सब नज़ारो तख़लिया देखने वाला था मंज़र जब कहा दरवेश ने कज-कुलाहो बादशाहो ताज-दारो तख़लिया ग़म से अब होगी बराह-ए-रास्त मेरी गुफ़्तुगू दोस्तो तीमार-दारो ग़म-गुसारो तख़लिया चार जानिब है हुजूम-ए-ना-शनायान-ए-सुख़न आज पूरे ज़ोर से 'फ़ारिस' पुकारो तख़लिया
Rehman Faris
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