ghazalKuch Alfaaz

मुझे ग़रज़ है सितारे न माहताब के साथ चमक रहा है ये दिल पूरी आब-ओ-ताब के साथ नपी-तुली सी मोहब्बत लगा बँधा सा करम निभा रहे हो तअ'ल्लुक़ बड़े हिसाब के साथ मैं इस लिए नहीं थकता तिरे तआक़ुब से मुझे यक़ीं है कि पानी भी है सराब के साथ सवाल-ए-वस्ल पे इनकार करने वाले सुन सवाल ख़त्म नहीं होगा इस जवाब के साथ ख़मोश झील के पानी में वो उदासी थी कि दिल भी डूब गया रात माहताब के साथ जता दिया कि मोहब्बत में ग़म भी होते हैं दिया गुलाब तो काँटे भी थे गुलाब के साथ मैं ले उड़ूँगा तिरे ख़द्द-ओ-ख़ाल से ता'बीर न देख मेरी तरफ़ चश्म-ए-नीम-ख़्वाब के साथ अरे ये सिर्फ़ बहाना है बात करने का मिरी मजाल कि झगड़ा करूँँ जनाब के साथ विसाल-ओ-हिज्र की सरहद पे झुट-पुटे में कहीं वो बे-हिजाब हुआ था मगर हिजाब के साथ शिकस्ता आइना देखा फिर अपना दिल देखा दिखाई दी मुझे ता'बीर-ए-ख़्वाब ख़्वाब के साथ वहाँ मिलूँगा जहाँ दोनों वक़्त मिलते हैं मैं कम-नसीब तिरे जैसे कामयाब के साथ दयार-ए-हिज्र के रोज़ा-गुज़ार चाहते हैं कि रोज़ा खोलें तिरे और शराब-ए-नाब के साथ तुम अच्छी दोस्त हो सो मेरा मशवरा ये है मिला-जुला न करो 'फ़ारिस'-ए-ख़राब के साथ

Related Ghazal

चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

406 likes

ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

292 likes

तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा

Hasan Abbasi

235 likes

वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

244 likes

इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ

Mehshar Afridi

173 likes

More from Rehman Faris

यही दुआ है यही है सलाम इश्क़ ब-ख़ैर मिरे सभी रुफ़क़ा-ए-किराम इश्क़ ब-ख़ैर दयार-ए-हिज्र की सूनी उदास गलियों में पुकारता है कोई सुब्ह-ओ-शाम इश्क़ ब-ख़ैर मैं कर रहा था दुआ की गुज़ारिशें उस से सो कह गई है उदासी की शाम इश्क़ ब-ख़ैर बड़े अजीब हैं शहर-ए-जुनूँ के बाशिंदे हमेशा कहते हैं बा'द-अज़-सलाम इश्क़ ब-ख़ैर ये रह ज़रूर तुम्हारे ही घर को जाती है लिखा हुआ है यहाँ गाम गाम इश्क़ ब-ख़ैर बयान की है ग़ज़ल-वार दास्तान-ए-इश्क़ सो इस किताब का रक्खा है नाम इश्क़ ब-ख़ैर उफ़ुक़ के पार मुझे याद कर रहा है कोई अभी मिला है उधर से पयाम-ए-इश्क़ ब-ख़ैर

Rehman Faris

2 likes

विदा-ए-यार का लम्हा ठहर गया मुझ में मैं ख़ुद तो ज़िंदा रहा वक़्त मर गया मुझ में सुकूत-ए-शाम में चीख़ें सुनाई देती हैं तू जाते जाते अजब शोर भर गया मुझ में वो पहले सिर्फ़ मिरी आँख में समाया था फिर एक रोज़ रगों तक उतर गया मुझ में कुछ ऐसे ध्यान में चेहरा तिरा तुलूअ'' हुआ ग़ुरूब-ए-शाम का मंज़र निखर गया मुझ में मैं उस की ज़ात से मुंकिर था और फिर इक दिन वो अपने होने का एलान कर गया मुझ में खंडर समझ के मिरी सैर करने आया था गया तो मौसम-ए-ग़म फूल धर गया मुझ में गली में गूँजी ख़मोशी की चीख़ रात के वक़्त तुम्हारी याद का बच्चा सा डर गया मुझ में बता मैं क्या करूँँ दिल नाम के इस आँगन का तिरी उमीद पे जो सज-सँवर गया मुझ में ये अपने अपने मुक़द्दर की बात है 'फ़ारिस' मैं इस में सिमटा रहा वो बिखर गया मुझ में

Rehman Faris

3 likes

मैं कार-आमद हूँ या बे-कार हूँ मैं मगर ऐ यार तेरा यार हूँ मैं जो देखा है किसी को मत बताना इलाक़े भर में इज़्ज़त-दार हूँ मैं ख़ुद अपनी ज़ात के सरमाए में भी सिफ़र फ़ीसद का हिस्से-दार हूँ मैं और अब क्यूँँ बैन करते आ गए हों कहा था ना बहुत बीमार हूँ मैं मिरी तो सारी दुनिया बस तुम्हीं हो ग़लत क्या है जो दुनिया-दार हूँ मैं कहानी में जो होता ही नहीं है कहानी का वही किरदार हूँ मैं ये तय करता है दस्तक देने वाला कहाँ दर हूँ कहाँ दीवार हूँ मैं कोई समझाए मेरे दुश्मनों को ज़रा सी दोस्ती की मार हूँ मैं मुझे पत्थर समझ कर पेश मत आ ज़रा सा रहम कर जाँ-दार हूँ मैं बस इतना सोच कर कीजे कोई हुक्म बड़ा मुँह-ज़ोर ख़िदमत-गार हूँ मैं कोई शक है तो बे-शक आज़मा ले तिरा होने का दा'वे-दार हूँ मैं अगर हर हाल में ख़ुश रहना फ़न है तो फिर सब से बड़ा फ़नकार हूँ मैं ज़माना तो मुझे कहता है 'फ़ारिस' मगर 'फ़ारिस' का पर्दा-दार हूँ मैं उन्हें खिलना सिखाता हूँ मैं 'फ़ारिस' गुलाबों का सुहूलत-कार हूँ मैं

Rehman Faris

5 likes

सर-ब-सर यार की मर्ज़ी पे फ़िदा हो जाना क्या ग़ज़ब काम है राज़ी-ब-रज़ा हो जाना बंद आँखों वो चले आएँ तो वा हो जाना और यूँँ फूट के रोना कि फ़ना हो जाना इश्क़ में काम नहीं ज़ोर-ज़बरदस्ती का जब भी तुम चाहो जुदा होना जुदा हो जाना तेरी जानिब है ब-तदरीज तरक़्क़ी मेरी मेरे होने की है मे'राज तिरा हो जाना तेरे आने की बशारत के सिवा कुछ भी नहीं बाग़ में सूखे दरख़्तों का हरा हो जाना इक निशानी है किसी शहर की बर्बादी की नारवा बात का यक-लख़्त रवा हो जाना तंग आ जाऊँ मोहब्बत से तो गाहे गाहे अच्छा लगता है मुझे तेरा ख़फ़ा हो जाना सी दिए जाएँ मिरे होंट तो ऐ जान-ए-ग़ज़ल ऐसा करना मिरी आँखों से अदा हो जाना बे-नियाज़ी भी वही और तअ'ल्लुक़ भी वही तुम्हें आता है मोहब्बत में ख़ुदा हो जाना अज़दहा बन के रग-ओ-पै को जकड़ लेता है इतना आसान नहीं ग़म से रिहा हो जाना अच्छे अच्छों पे बुरे दिन हैं लिहाज़ा 'फ़ारिस' अच्छे होने से तो अच्छा है बुरा हो जाना

Rehman Faris

2 likes

नज़र उठाएँ तो क्या क्या फ़साना बनता है सौ पेश-ए-यार निगाहें झुकाना बनता है वो लाख बे-ख़बर-ओ-बे-वफ़ा सही लेकिन तलब किया है गर उस ने तो जाना बनता है रगों तलक उतर आई है ज़ुल्मत-ए-शब-ए-ग़म सो अब चराग़ नहीं दिल जलाना बनता है पराई आग मिरा घर जला रही है सो अब ख़मोश रहना नहीं ग़ुल मचाना बनता है क़दम क़दम पे तवाज़ुन की बात मत कीजे ये मय-कदा है यहाँ लड़खड़ाना बनता है बिछड़ने वाले तुझे किस तरह बताऊँ मैं कि याद आना नहीं तेरा आना बनता है ये देख कर कि तिरे आशिक़ों में मैं भी हूँ जमाल-ए-यार तिरा मुस्कुराना बनता है जुनूँ भी सिर्फ़ दिखावा है वहशतें भी ग़लत दिवाना है नहीं 'फ़ारिस' दिवाना बनता है

Rehman Faris

1 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Rehman Faris.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Rehman Faris's ghazal.