ghazalKuch Alfaaz

मैं कार-आमद हूँ या बे-कार हूँ मैं मगर ऐ यार तेरा यार हूँ मैं जो देखा है किसी को मत बताना इलाक़े भर में इज़्ज़त-दार हूँ मैं ख़ुद अपनी ज़ात के सरमाए में भी सिफ़र फ़ीसद का हिस्से-दार हूँ मैं और अब क्यूँँ बैन करते आ गए हों कहा था ना बहुत बीमार हूँ मैं मिरी तो सारी दुनिया बस तुम्हीं हो ग़लत क्या है जो दुनिया-दार हूँ मैं कहानी में जो होता ही नहीं है कहानी का वही किरदार हूँ मैं ये तय करता है दस्तक देने वाला कहाँ दर हूँ कहाँ दीवार हूँ मैं कोई समझाए मेरे दुश्मनों को ज़रा सी दोस्ती की मार हूँ मैं मुझे पत्थर समझ कर पेश मत आ ज़रा सा रहम कर जाँ-दार हूँ मैं बस इतना सोच कर कीजे कोई हुक्म बड़ा मुँह-ज़ोर ख़िदमत-गार हूँ मैं कोई शक है तो बे-शक आज़मा ले तिरा होने का दा'वे-दार हूँ मैं अगर हर हाल में ख़ुश रहना फ़न है तो फिर सब से बड़ा फ़नकार हूँ मैं ज़माना तो मुझे कहता है 'फ़ारिस' मगर 'फ़ारिस' का पर्दा-दार हूँ मैं उन्हें खिलना सिखाता हूँ मैं 'फ़ारिस' गुलाबों का सुहूलत-कार हूँ मैं

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए

Khumar Barabankvi

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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मुझे ग़रज़ है सितारे न माहताब के साथ चमक रहा है ये दिल पूरी आब-ओ-ताब के साथ नपी-तुली सी मोहब्बत लगा बँधा सा करम निभा रहे हो तअ'ल्लुक़ बड़े हिसाब के साथ मैं इस लिए नहीं थकता तिरे तआक़ुब से मुझे यक़ीं है कि पानी भी है सराब के साथ सवाल-ए-वस्ल पे इनकार करने वाले सुन सवाल ख़त्म नहीं होगा इस जवाब के साथ ख़मोश झील के पानी में वो उदासी थी कि दिल भी डूब गया रात माहताब के साथ जता दिया कि मोहब्बत में ग़म भी होते हैं दिया गुलाब तो काँटे भी थे गुलाब के साथ मैं ले उड़ूँगा तिरे ख़द्द-ओ-ख़ाल से ता'बीर न देख मेरी तरफ़ चश्म-ए-नीम-ख़्वाब के साथ अरे ये सिर्फ़ बहाना है बात करने का मिरी मजाल कि झगड़ा करूँँ जनाब के साथ विसाल-ओ-हिज्र की सरहद पे झुट-पुटे में कहीं वो बे-हिजाब हुआ था मगर हिजाब के साथ शिकस्ता आइना देखा फिर अपना दिल देखा दिखाई दी मुझे ता'बीर-ए-ख़्वाब ख़्वाब के साथ वहाँ मिलूँगा जहाँ दोनों वक़्त मिलते हैं मैं कम-नसीब तिरे जैसे कामयाब के साथ दयार-ए-हिज्र के रोज़ा-गुज़ार चाहते हैं कि रोज़ा खोलें तिरे और शराब-ए-नाब के साथ तुम अच्छी दोस्त हो सो मेरा मशवरा ये है मिला-जुला न करो 'फ़ारिस'-ए-ख़राब के साथ

Rehman Faris

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नज़र उठाएँ तो क्या क्या फ़साना बनता है सौ पेश-ए-यार निगाहें झुकाना बनता है वो लाख बे-ख़बर-ओ-बे-वफ़ा सही लेकिन तलब किया है गर उस ने तो जाना बनता है रगों तलक उतर आई है ज़ुल्मत-ए-शब-ए-ग़म सो अब चराग़ नहीं दिल जलाना बनता है पराई आग मिरा घर जला रही है सो अब ख़मोश रहना नहीं ग़ुल मचाना बनता है क़दम क़दम पे तवाज़ुन की बात मत कीजे ये मय-कदा है यहाँ लड़खड़ाना बनता है बिछड़ने वाले तुझे किस तरह बताऊँ मैं कि याद आना नहीं तेरा आना बनता है ये देख कर कि तिरे आशिक़ों में मैं भी हूँ जमाल-ए-यार तिरा मुस्कुराना बनता है जुनूँ भी सिर्फ़ दिखावा है वहशतें भी ग़लत दिवाना है नहीं 'फ़ारिस' दिवाना बनता है

Rehman Faris

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यही दुआ है यही है सलाम इश्क़ ब-ख़ैर मिरे सभी रुफ़क़ा-ए-किराम इश्क़ ब-ख़ैर दयार-ए-हिज्र की सूनी उदास गलियों में पुकारता है कोई सुब्ह-ओ-शाम इश्क़ ब-ख़ैर मैं कर रहा था दुआ की गुज़ारिशें उस से सो कह गई है उदासी की शाम इश्क़ ब-ख़ैर बड़े अजीब हैं शहर-ए-जुनूँ के बाशिंदे हमेशा कहते हैं बा'द-अज़-सलाम इश्क़ ब-ख़ैर ये रह ज़रूर तुम्हारे ही घर को जाती है लिखा हुआ है यहाँ गाम गाम इश्क़ ब-ख़ैर बयान की है ग़ज़ल-वार दास्तान-ए-इश्क़ सो इस किताब का रक्खा है नाम इश्क़ ब-ख़ैर उफ़ुक़ के पार मुझे याद कर रहा है कोई अभी मिला है उधर से पयाम-ए-इश्क़ ब-ख़ैर

Rehman Faris

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सर-ब-सर यार की मर्ज़ी पे फ़िदा हो जाना क्या ग़ज़ब काम है राज़ी-ब-रज़ा हो जाना बंद आँखों वो चले आएँ तो वा हो जाना और यूँँ फूट के रोना कि फ़ना हो जाना इश्क़ में काम नहीं ज़ोर-ज़बरदस्ती का जब भी तुम चाहो जुदा होना जुदा हो जाना तेरी जानिब है ब-तदरीज तरक़्क़ी मेरी मेरे होने की है मे'राज तिरा हो जाना तेरे आने की बशारत के सिवा कुछ भी नहीं बाग़ में सूखे दरख़्तों का हरा हो जाना इक निशानी है किसी शहर की बर्बादी की नारवा बात का यक-लख़्त रवा हो जाना तंग आ जाऊँ मोहब्बत से तो गाहे गाहे अच्छा लगता है मुझे तेरा ख़फ़ा हो जाना सी दिए जाएँ मिरे होंट तो ऐ जान-ए-ग़ज़ल ऐसा करना मिरी आँखों से अदा हो जाना बे-नियाज़ी भी वही और तअ'ल्लुक़ भी वही तुम्हें आता है मोहब्बत में ख़ुदा हो जाना अज़दहा बन के रग-ओ-पै को जकड़ लेता है इतना आसान नहीं ग़म से रिहा हो जाना अच्छे अच्छों पे बुरे दिन हैं लिहाज़ा 'फ़ारिस' अच्छे होने से तो अच्छा है बुरा हो जाना

Rehman Faris

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सुकूत-ए-शाम में गूँजी सदा उदासी की कि है मज़ीद उदासी दवा उदासी की बहुत शरीर था मैं और हँसता फिरता था फिर इक फ़क़ीर ने दे दी दुआ उदासी की उमूर-ए-दिल में किसी तीसरे का दख़्ल नहीं यहाँ फ़क़त तिरी चलती है या उदासी की चराग़-ए-दिल को ज़रा एहतियात से रखना कि आज रात चलेगी हवा उदासी की वो इम्तिज़ाज था ऐसा कि दंग थी हर आँख जमाल-ए-यार ने पहनी क़बा उदासी की इसी उमीद पे आँखें बरसती रहती हैं कि एक दिन तो सुनेगा ख़ुदा उदासी की शजर ने पूछा कि तुझ में ये किस की ख़ुशबू है हवा-ए-शाम-ए-अलम ने कहा उदासी की दिल-ए-फ़सुर्दा को मैं ने तो मार ही डाला सो मैं तो ठीक हूँ अब तू सुना उदासी की ज़रा सा छू लें तो घंटों दहकती रहती है हमें तो मार गई ये अदा उदासी की बहुत दिनों से मैं उस से नहीं मिला 'फ़ारिस' कहीं से ख़ैर-ख़बर ले के आ उदासी की

Rehman Faris

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