सुकूत-ए-शाम में गूँजी सदा उदासी की कि है मज़ीद उदासी दवा उदासी की बहुत शरीर था मैं और हँसता फिरता था फिर इक फ़क़ीर ने दे दी दुआ उदासी की उमूर-ए-दिल में किसी तीसरे का दख़्ल नहीं यहाँ फ़क़त तिरी चलती है या उदासी की चराग़-ए-दिल को ज़रा एहतियात से रखना कि आज रात चलेगी हवा उदासी की वो इम्तिज़ाज था ऐसा कि दंग थी हर आँख जमाल-ए-यार ने पहनी क़बा उदासी की इसी उमीद पे आँखें बरसती रहती हैं कि एक दिन तो सुनेगा ख़ुदा उदासी की शजर ने पूछा कि तुझ में ये किस की ख़ुशबू है हवा-ए-शाम-ए-अलम ने कहा उदासी की दिल-ए-फ़सुर्दा को मैं ने तो मार ही डाला सो मैं तो ठीक हूँ अब तू सुना उदासी की ज़रा सा छू लें तो घंटों दहकती रहती है हमें तो मार गई ये अदा उदासी की बहुत दिनों से मैं उस से नहीं मिला 'फ़ारिस' कहीं से ख़ैर-ख़बर ले के आ उदासी की
Related Ghazal
तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
249 likes
बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
196 likes
ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
190 likes
सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
140 likes
ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी
Ali Zaryoun
102 likes
More from Rehman Faris
मुझे ग़रज़ है सितारे न माहताब के साथ चमक रहा है ये दिल पूरी आब-ओ-ताब के साथ नपी-तुली सी मोहब्बत लगा बँधा सा करम निभा रहे हो तअ'ल्लुक़ बड़े हिसाब के साथ मैं इस लिए नहीं थकता तिरे तआक़ुब से मुझे यक़ीं है कि पानी भी है सराब के साथ सवाल-ए-वस्ल पे इनकार करने वाले सुन सवाल ख़त्म नहीं होगा इस जवाब के साथ ख़मोश झील के पानी में वो उदासी थी कि दिल भी डूब गया रात माहताब के साथ जता दिया कि मोहब्बत में ग़म भी होते हैं दिया गुलाब तो काँटे भी थे गुलाब के साथ मैं ले उड़ूँगा तिरे ख़द्द-ओ-ख़ाल से ता'बीर न देख मेरी तरफ़ चश्म-ए-नीम-ख़्वाब के साथ अरे ये सिर्फ़ बहाना है बात करने का मिरी मजाल कि झगड़ा करूँँ जनाब के साथ विसाल-ओ-हिज्र की सरहद पे झुट-पुटे में कहीं वो बे-हिजाब हुआ था मगर हिजाब के साथ शिकस्ता आइना देखा फिर अपना दिल देखा दिखाई दी मुझे ता'बीर-ए-ख़्वाब ख़्वाब के साथ वहाँ मिलूँगा जहाँ दोनों वक़्त मिलते हैं मैं कम-नसीब तिरे जैसे कामयाब के साथ दयार-ए-हिज्र के रोज़ा-गुज़ार चाहते हैं कि रोज़ा खोलें तिरे और शराब-ए-नाब के साथ तुम अच्छी दोस्त हो सो मेरा मशवरा ये है मिला-जुला न करो 'फ़ारिस'-ए-ख़राब के साथ
Rehman Faris
4 likes
यही दुआ है यही है सलाम इश्क़ ब-ख़ैर मिरे सभी रुफ़क़ा-ए-किराम इश्क़ ब-ख़ैर दयार-ए-हिज्र की सूनी उदास गलियों में पुकारता है कोई सुब्ह-ओ-शाम इश्क़ ब-ख़ैर मैं कर रहा था दुआ की गुज़ारिशें उस से सो कह गई है उदासी की शाम इश्क़ ब-ख़ैर बड़े अजीब हैं शहर-ए-जुनूँ के बाशिंदे हमेशा कहते हैं बा'द-अज़-सलाम इश्क़ ब-ख़ैर ये रह ज़रूर तुम्हारे ही घर को जाती है लिखा हुआ है यहाँ गाम गाम इश्क़ ब-ख़ैर बयान की है ग़ज़ल-वार दास्तान-ए-इश्क़ सो इस किताब का रक्खा है नाम इश्क़ ब-ख़ैर उफ़ुक़ के पार मुझे याद कर रहा है कोई अभी मिला है उधर से पयाम-ए-इश्क़ ब-ख़ैर
Rehman Faris
2 likes
नज़र उठाएँ तो क्या क्या फ़साना बनता है सौ पेश-ए-यार निगाहें झुकाना बनता है वो लाख बे-ख़बर-ओ-बे-वफ़ा सही लेकिन तलब किया है गर उस ने तो जाना बनता है रगों तलक उतर आई है ज़ुल्मत-ए-शब-ए-ग़म सो अब चराग़ नहीं दिल जलाना बनता है पराई आग मिरा घर जला रही है सो अब ख़मोश रहना नहीं ग़ुल मचाना बनता है क़दम क़दम पे तवाज़ुन की बात मत कीजे ये मय-कदा है यहाँ लड़खड़ाना बनता है बिछड़ने वाले तुझे किस तरह बताऊँ मैं कि याद आना नहीं तेरा आना बनता है ये देख कर कि तिरे आशिक़ों में मैं भी हूँ जमाल-ए-यार तिरा मुस्कुराना बनता है जुनूँ भी सिर्फ़ दिखावा है वहशतें भी ग़लत दिवाना है नहीं 'फ़ारिस' दिवाना बनता है
Rehman Faris
1 likes
रात आ बैठी है पहलू में सितारो तख़लिया अब हमें दरकार है ख़ल्वत सो यारो तख़लिया आँख वा है और हुस्न-ए-यार है पेश-ए-नज़र शश-जिहत के बाक़ी-माँदा सब नज़ारो तख़लिया देखने वाला था मंज़र जब कहा दरवेश ने कज-कुलाहो बादशाहो ताज-दारो तख़लिया ग़म से अब होगी बराह-ए-रास्त मेरी गुफ़्तुगू दोस्तो तीमार-दारो ग़म-गुसारो तख़लिया चार जानिब है हुजूम-ए-ना-शनायान-ए-सुख़न आज पूरे ज़ोर से 'फ़ारिस' पुकारो तख़लिया
Rehman Faris
2 likes
विदा-ए-यार का लम्हा ठहर गया मुझ में मैं ख़ुद तो ज़िंदा रहा वक़्त मर गया मुझ में सुकूत-ए-शाम में चीख़ें सुनाई देती हैं तू जाते जाते अजब शोर भर गया मुझ में वो पहले सिर्फ़ मिरी आँख में समाया था फिर एक रोज़ रगों तक उतर गया मुझ में कुछ ऐसे ध्यान में चेहरा तिरा तुलूअ'' हुआ ग़ुरूब-ए-शाम का मंज़र निखर गया मुझ में मैं उस की ज़ात से मुंकिर था और फिर इक दिन वो अपने होने का एलान कर गया मुझ में खंडर समझ के मिरी सैर करने आया था गया तो मौसम-ए-ग़म फूल धर गया मुझ में गली में गूँजी ख़मोशी की चीख़ रात के वक़्त तुम्हारी याद का बच्चा सा डर गया मुझ में बता मैं क्या करूँँ दिल नाम के इस आँगन का तिरी उमीद पे जो सज-सँवर गया मुझ में ये अपने अपने मुक़द्दर की बात है 'फ़ारिस' मैं इस में सिमटा रहा वो बिखर गया मुझ में
Rehman Faris
3 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Rehman Faris.
Similar Moods
More moods that pair well with Rehman Faris's ghazal.







