ghazalKuch Alfaaz

यही दुआ है यही है सलाम इश्क़ ब-ख़ैर मिरे सभी रुफ़क़ा-ए-किराम इश्क़ ब-ख़ैर दयार-ए-हिज्र की सूनी उदास गलियों में पुकारता है कोई सुब्ह-ओ-शाम इश्क़ ब-ख़ैर मैं कर रहा था दुआ की गुज़ारिशें उस से सो कह गई है उदासी की शाम इश्क़ ब-ख़ैर बड़े अजीब हैं शहर-ए-जुनूँ के बाशिंदे हमेशा कहते हैं बा'द-अज़-सलाम इश्क़ ब-ख़ैर ये रह ज़रूर तुम्हारे ही घर को जाती है लिखा हुआ है यहाँ गाम गाम इश्क़ ब-ख़ैर बयान की है ग़ज़ल-वार दास्तान-ए-इश्क़ सो इस किताब का रक्खा है नाम इश्क़ ब-ख़ैर उफ़ुक़ के पार मुझे याद कर रहा है कोई अभी मिला है उधर से पयाम-ए-इश्क़ ब-ख़ैर

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कभी मिलेंगे तो ये कर्ज़ भी उतारेंगे तुम्हारे चेहरे को पहरों तलक निहारेंगे ये क्या सितम कि खिलाड़ी बदल दिया उस ने हम इस उमीद पे बैठे थे हम ही हारेंगे हमारे बा'द तेरे इश्क़ में नए लड़के बदन तो चू मेंगे ज़ुल्फ़ें नहीं सँवारेंगे

Vikram Gaur Vairagi

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छोड़ कर जाने का दस्तूर नहीं होता था कोई भी ज़ख़्म हो नासूर नहीं होता था मेरे भी होंठ पे सिगरेट नहीं होती थी उस की भी माँग में सिंदूर नहीं होता था औरतें प्यार में तब शौक़ नहीं रखती थी आदमी इश्क़ में मज़दूर नहीं होता था

Kushal Dauneria

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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थोड़ा लिक्खा और ज़ियादा छोड़ दिया आने वालों के लिए रस्ता छोड़ दिया तुम क्या जानो उस दरिया पर क्या गुज़री तुम ने तो बस पानी भरना छोड़ दिया लड़कियाँ इश्क़ में कितनी पागल होती हैं फ़ोन बजा और चूल्हा जलता छोड़ दिया रोज़ इक पत्ता मुझ में आ गिरता है जब से मैं ने जंगल जाना छोड़ दिया बस कानों पर हाथ रखे थे थोड़ी देर और फिर उस आवाज़ ने पीछा छोड़ दिए

Tehzeeb Hafi

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नज़र उठाएँ तो क्या क्या फ़साना बनता है सौ पेश-ए-यार निगाहें झुकाना बनता है वो लाख बे-ख़बर-ओ-बे-वफ़ा सही लेकिन तलब किया है गर उस ने तो जाना बनता है रगों तलक उतर आई है ज़ुल्मत-ए-शब-ए-ग़म सो अब चराग़ नहीं दिल जलाना बनता है पराई आग मिरा घर जला रही है सो अब ख़मोश रहना नहीं ग़ुल मचाना बनता है क़दम क़दम पे तवाज़ुन की बात मत कीजे ये मय-कदा है यहाँ लड़खड़ाना बनता है बिछड़ने वाले तुझे किस तरह बताऊँ मैं कि याद आना नहीं तेरा आना बनता है ये देख कर कि तिरे आशिक़ों में मैं भी हूँ जमाल-ए-यार तिरा मुस्कुराना बनता है जुनूँ भी सिर्फ़ दिखावा है वहशतें भी ग़लत दिवाना है नहीं 'फ़ारिस' दिवाना बनता है

Rehman Faris

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मैं कार-आमद हूँ या बे-कार हूँ मैं मगर ऐ यार तेरा यार हूँ मैं जो देखा है किसी को मत बताना इलाक़े भर में इज़्ज़त-दार हूँ मैं ख़ुद अपनी ज़ात के सरमाए में भी सिफ़र फ़ीसद का हिस्से-दार हूँ मैं और अब क्यूँँ बैन करते आ गए हों कहा था ना बहुत बीमार हूँ मैं मिरी तो सारी दुनिया बस तुम्हीं हो ग़लत क्या है जो दुनिया-दार हूँ मैं कहानी में जो होता ही नहीं है कहानी का वही किरदार हूँ मैं ये तय करता है दस्तक देने वाला कहाँ दर हूँ कहाँ दीवार हूँ मैं कोई समझाए मेरे दुश्मनों को ज़रा सी दोस्ती की मार हूँ मैं मुझे पत्थर समझ कर पेश मत आ ज़रा सा रहम कर जाँ-दार हूँ मैं बस इतना सोच कर कीजे कोई हुक्म बड़ा मुँह-ज़ोर ख़िदमत-गार हूँ मैं कोई शक है तो बे-शक आज़मा ले तिरा होने का दा'वे-दार हूँ मैं अगर हर हाल में ख़ुश रहना फ़न है तो फिर सब से बड़ा फ़नकार हूँ मैं ज़माना तो मुझे कहता है 'फ़ारिस' मगर 'फ़ारिस' का पर्दा-दार हूँ मैं उन्हें खिलना सिखाता हूँ मैं 'फ़ारिस' गुलाबों का सुहूलत-कार हूँ मैं

Rehman Faris

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मुझे ग़रज़ है सितारे न माहताब के साथ चमक रहा है ये दिल पूरी आब-ओ-ताब के साथ नपी-तुली सी मोहब्बत लगा बँधा सा करम निभा रहे हो तअ'ल्लुक़ बड़े हिसाब के साथ मैं इस लिए नहीं थकता तिरे तआक़ुब से मुझे यक़ीं है कि पानी भी है सराब के साथ सवाल-ए-वस्ल पे इनकार करने वाले सुन सवाल ख़त्म नहीं होगा इस जवाब के साथ ख़मोश झील के पानी में वो उदासी थी कि दिल भी डूब गया रात माहताब के साथ जता दिया कि मोहब्बत में ग़म भी होते हैं दिया गुलाब तो काँटे भी थे गुलाब के साथ मैं ले उड़ूँगा तिरे ख़द्द-ओ-ख़ाल से ता'बीर न देख मेरी तरफ़ चश्म-ए-नीम-ख़्वाब के साथ अरे ये सिर्फ़ बहाना है बात करने का मिरी मजाल कि झगड़ा करूँँ जनाब के साथ विसाल-ओ-हिज्र की सरहद पे झुट-पुटे में कहीं वो बे-हिजाब हुआ था मगर हिजाब के साथ शिकस्ता आइना देखा फिर अपना दिल देखा दिखाई दी मुझे ता'बीर-ए-ख़्वाब ख़्वाब के साथ वहाँ मिलूँगा जहाँ दोनों वक़्त मिलते हैं मैं कम-नसीब तिरे जैसे कामयाब के साथ दयार-ए-हिज्र के रोज़ा-गुज़ार चाहते हैं कि रोज़ा खोलें तिरे और शराब-ए-नाब के साथ तुम अच्छी दोस्त हो सो मेरा मशवरा ये है मिला-जुला न करो 'फ़ारिस'-ए-ख़राब के साथ

Rehman Faris

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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सर-ब-सर यार की मर्ज़ी पे फ़िदा हो जाना क्या ग़ज़ब काम है राज़ी-ब-रज़ा हो जाना बंद आँखों वो चले आएँ तो वा हो जाना और यूँँ फूट के रोना कि फ़ना हो जाना इश्क़ में काम नहीं ज़ोर-ज़बरदस्ती का जब भी तुम चाहो जुदा होना जुदा हो जाना तेरी जानिब है ब-तदरीज तरक़्क़ी मेरी मेरे होने की है मे'राज तिरा हो जाना तेरे आने की बशारत के सिवा कुछ भी नहीं बाग़ में सूखे दरख़्तों का हरा हो जाना इक निशानी है किसी शहर की बर्बादी की नारवा बात का यक-लख़्त रवा हो जाना तंग आ जाऊँ मोहब्बत से तो गाहे गाहे अच्छा लगता है मुझे तेरा ख़फ़ा हो जाना सी दिए जाएँ मिरे होंट तो ऐ जान-ए-ग़ज़ल ऐसा करना मिरी आँखों से अदा हो जाना बे-नियाज़ी भी वही और तअ'ल्लुक़ भी वही तुम्हें आता है मोहब्बत में ख़ुदा हो जाना अज़दहा बन के रग-ओ-पै को जकड़ लेता है इतना आसान नहीं ग़म से रिहा हो जाना अच्छे अच्छों पे बुरे दिन हैं लिहाज़ा 'फ़ारिस' अच्छे होने से तो अच्छा है बुरा हो जाना

Rehman Faris

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