दिल पे मुश्किल है बहुत दिल की कहानी लिखना जैसे बहते हुए पानी पे हो पानी लिखना कोई उलझन ही रही होगी जो वो भूल गया मेरे हिस्से में कोई शाम सुहानी लिखना आते जाते हुए मौसम से अलग रह के ज़रा अब के ख़त में तो कोई बात पुरानी लिखना कुछ भी लिखने का हुनर तुझ को अगर मिल जाए इश्क़ को अश्कों के दरिया की रवानी लिखना इस इशारे को वो समझा तो मगर मुद्दत बा'द अपने हर ख़त में उसे रात-की-रानी लिखना
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
Tehzeeb Hafi
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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है
Shabeena Adeeb
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
Ahmad Faraz
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साँचे में हम ने और के ढलने नहीं दिया दिल मोम का था फिर भी पिघलने नहीं दिया हाथों की ओट दे के जला लीं हथेलियाँ ऐ शम्अ'' तुझ को हम ने मचलने नहीं दिया दुनिया ने बहुत चाहा कि दिल जानवर बने मैं ने ही उस को जिस्म बदलने नहीं दिया ज़िद ये थी वो जलेगा तुम्हारे ही हाथ से उस ज़िद ने एक चराग़ को जलने नहीं दिया चेहरे को आज तक भी तेरा इंतिज़ार है हम ने गुलाल और को मलने नहीं दिया बाहर की ठोकरों से तो बच कर निकल गए पाँव को अपनी मोच ने चलने नहीं दिया
Kunwar Bechain
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इस नए माहौल में जो भी जिया बीमार है जिस किसी से भी नया परिचय किया बीमार है हंस रही है कांच के कपडे पहनकर बिजलियाँ उस को क्या मालूम मिट्टी का दिया बीमार है आज शब्दों की सभा में एक ये ही शोर था सुर्ख़ है क्यूँ सुर्खियाँ जब हाशियाँ बीमार है काम में आए नहीं धागे, सुई, मरहम, दवा आज भी जिस ज़ख़्म को हम ने सिया बीमार है रोग कुछ ऐसे मिले है शहर की झीलों को अब इनका पानी जिस किसी ने भी पिया बीमार है एक भी उम्मीद की चिट्ठी इधर आती नहीं हो न हो अपने समय का डाकिया बीमार है कल ग़ज़ल में प्यार के ही काफ़िये का ज़ोर था आज लेकिन प्यार का ही काफ़िया बीमार है
Kunwar Bechain
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कोई नहीं है देखने वाला तो क्या हुआ तेरी तरफ़ नहीं है उजाला तो क्या हुआ चारों तरफ़ हवाओं में उस की महक तो है मुरझा रही है साँस की माला तो क्या हुआ बदले में तुझ को दे तो गए भूक और प्यास मुँह से जो तेरे छीना निवाला तो क्या हुआ आँखों से पी रहा हूँ तिरे प्यार की शराब गर छुट गया है हाथ से प्याला तो क्या हुआ धरती को मेरी ज़ात से कुछ तो नमी मिली फूटा है मेरे पाँव का छाला तो क्या हुआ सारे जहाँ ने मुझ पे लगाई हैं तोहमतें तुम ने भी मेरा नाम उछाला तो क्या हुआ सर पर है माँ के प्यार का आँचल पड़ा हुआ मुझ पर नहीं है कोई दुशाला तो क्या हुआ मंचों पे चुटकुले हैं लतीफ़े हैं आज-कल मंचों पे ने हैं पंत निराला तो क्या हुआ ऐ ज़िंदगी तू पास में बैठी हुई तो है शीशे में तुझ को गर नहीं ढाला तो क्या हुआ आँखों के घर में आई नहीं रौशनी 'कुँवर' टूटा है फिर से नींद का ताला तो क्या हुआ
Kunwar Bechain
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