इस नए माहौल में जो भी जिया बीमार है जिस किसी से भी नया परिचय किया बीमार है हंस रही है कांच के कपडे पहनकर बिजलियाँ उस को क्या मालूम मिट्टी का दिया बीमार है आज शब्दों की सभा में एक ये ही शोर था सुर्ख़ है क्यूँ सुर्खियाँ जब हाशियाँ बीमार है काम में आए नहीं धागे, सुई, मरहम, दवा आज भी जिस ज़ख़्म को हम ने सिया बीमार है रोग कुछ ऐसे मिले है शहर की झीलों को अब इनका पानी जिस किसी ने भी पिया बीमार है एक भी उम्मीद की चिट्ठी इधर आती नहीं हो न हो अपने समय का डाकिया बीमार है कल ग़ज़ल में प्यार के ही काफ़िये का ज़ोर था आज लेकिन प्यार का ही काफ़िया बीमार है
Related Ghazal
यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
526 likes
चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
406 likes
उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
465 likes
ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
355 likes
क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
371 likes
More from Kunwar Bechain
साँचे में हम ने और के ढलने नहीं दिया दिल मोम का था फिर भी पिघलने नहीं दिया हाथों की ओट दे के जला लीं हथेलियाँ ऐ शम्अ'' तुझ को हम ने मचलने नहीं दिया दुनिया ने बहुत चाहा कि दिल जानवर बने मैं ने ही उस को जिस्म बदलने नहीं दिया ज़िद ये थी वो जलेगा तुम्हारे ही हाथ से उस ज़िद ने एक चराग़ को जलने नहीं दिया चेहरे को आज तक भी तेरा इंतिज़ार है हम ने गुलाल और को मलने नहीं दिया बाहर की ठोकरों से तो बच कर निकल गए पाँव को अपनी मोच ने चलने नहीं दिया
Kunwar Bechain
5 likes
दिल पे मुश्किल है बहुत दिल की कहानी लिखना जैसे बहते हुए पानी पे हो पानी लिखना कोई उलझन ही रही होगी जो वो भूल गया मेरे हिस्से में कोई शाम सुहानी लिखना आते जाते हुए मौसम से अलग रह के ज़रा अब के ख़त में तो कोई बात पुरानी लिखना कुछ भी लिखने का हुनर तुझ को अगर मिल जाए इश्क़ को अश्कों के दरिया की रवानी लिखना इस इशारे को वो समझा तो मगर मुद्दत बा'द अपने हर ख़त में उसे रात-की-रानी लिखना
Kunwar Bechain
4 likes
कोई नहीं है देखने वाला तो क्या हुआ तेरी तरफ़ नहीं है उजाला तो क्या हुआ चारों तरफ़ हवाओं में उस की महक तो है मुरझा रही है साँस की माला तो क्या हुआ बदले में तुझ को दे तो गए भूक और प्यास मुँह से जो तेरे छीना निवाला तो क्या हुआ आँखों से पी रहा हूँ तिरे प्यार की शराब गर छुट गया है हाथ से प्याला तो क्या हुआ धरती को मेरी ज़ात से कुछ तो नमी मिली फूटा है मेरे पाँव का छाला तो क्या हुआ सारे जहाँ ने मुझ पे लगाई हैं तोहमतें तुम ने भी मेरा नाम उछाला तो क्या हुआ सर पर है माँ के प्यार का आँचल पड़ा हुआ मुझ पर नहीं है कोई दुशाला तो क्या हुआ मंचों पे चुटकुले हैं लतीफ़े हैं आज-कल मंचों पे ने हैं पंत निराला तो क्या हुआ ऐ ज़िंदगी तू पास में बैठी हुई तो है शीशे में तुझ को गर नहीं ढाला तो क्या हुआ आँखों के घर में आई नहीं रौशनी 'कुँवर' टूटा है फिर से नींद का ताला तो क्या हुआ
Kunwar Bechain
5 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Kunwar Bechain.
Similar Moods
More moods that pair well with Kunwar Bechain's ghazal.







