ghazalKuch Alfaaz

इस नए माहौल में जो भी जिया बीमार है जिस किसी से भी नया परिचय किया बीमार है हंस रही है कांच के कपडे पहनकर बिजलियाँ उस को क्या मालूम मिट्टी का दिया बीमार है आज शब्दों की सभा में एक ये ही शोर था सुर्ख़ है क्यूँ सुर्खियाँ जब हाशियाँ बीमार है काम में आए नहीं धागे, सुई, मरहम, दवा आज भी जिस ज़ख़्म को हम ने सिया बीमार है रोग कुछ ऐसे मिले है शहर की झीलों को अब इनका पानी जिस किसी ने भी पिया बीमार है एक भी उम्मीद की चिट्ठी इधर आती नहीं हो न हो अपने समय का डाकिया बीमार है कल ग़ज़ल में प्यार के ही काफ़िये का ज़ोर था आज लेकिन प्यार का ही काफ़िया बीमार है

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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साँचे में हम ने और के ढलने नहीं दिया दिल मोम का था फिर भी पिघलने नहीं दिया हाथों की ओट दे के जला लीं हथेलियाँ ऐ शम्अ'' तुझ को हम ने मचलने नहीं दिया दुनिया ने बहुत चाहा कि दिल जानवर बने मैं ने ही उस को जिस्म बदलने नहीं दिया ज़िद ये थी वो जलेगा तुम्हारे ही हाथ से उस ज़िद ने एक चराग़ को जलने नहीं दिया चेहरे को आज तक भी तेरा इंतिज़ार है हम ने गुलाल और को मलने नहीं दिया बाहर की ठोकरों से तो बच कर निकल गए पाँव को अपनी मोच ने चलने नहीं दिया

Kunwar Bechain

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दिल पे मुश्किल है बहुत दिल की कहानी लिखना जैसे बहते हुए पानी पे हो पानी लिखना कोई उलझन ही रही होगी जो वो भूल गया मेरे हिस्से में कोई शाम सुहानी लिखना आते जाते हुए मौसम से अलग रह के ज़रा अब के ख़त में तो कोई बात पुरानी लिखना कुछ भी लिखने का हुनर तुझ को अगर मिल जाए इश्क़ को अश्कों के दरिया की रवानी लिखना इस इशारे को वो समझा तो मगर मुद्दत बा'द अपने हर ख़त में उसे रात-की-रानी लिखना

Kunwar Bechain

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कोई नहीं है देखने वाला तो क्या हुआ तेरी तरफ़ नहीं है उजाला तो क्या हुआ चारों तरफ़ हवाओं में उस की महक तो है मुरझा रही है साँस की माला तो क्या हुआ बदले में तुझ को दे तो गए भूक और प्यास मुँह से जो तेरे छीना निवाला तो क्या हुआ आँखों से पी रहा हूँ तिरे प्यार की शराब गर छुट गया है हाथ से प्याला तो क्या हुआ धरती को मेरी ज़ात से कुछ तो नमी मिली फूटा है मेरे पाँव का छाला तो क्या हुआ सारे जहाँ ने मुझ पे लगाई हैं तोहमतें तुम ने भी मेरा नाम उछाला तो क्या हुआ सर पर है माँ के प्यार का आँचल पड़ा हुआ मुझ पर नहीं है कोई दुशाला तो क्या हुआ मंचों पे चुटकुले हैं लतीफ़े हैं आज-कल मंचों पे ने हैं पंत निराला तो क्या हुआ ऐ ज़िंदगी तू पास में बैठी हुई तो है शीशे में तुझ को गर नहीं ढाला तो क्या हुआ आँखों के घर में आई नहीं रौशनी 'कुँवर' टूटा है फिर से नींद का ताला तो क्या हुआ

Kunwar Bechain

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