ghazalKuch Alfaaz

कोई नहीं है देखने वाला तो क्या हुआ तेरी तरफ़ नहीं है उजाला तो क्या हुआ चारों तरफ़ हवाओं में उस की महक तो है मुरझा रही है साँस की माला तो क्या हुआ बदले में तुझ को दे तो गए भूक और प्यास मुँह से जो तेरे छीना निवाला तो क्या हुआ आँखों से पी रहा हूँ तिरे प्यार की शराब गर छुट गया है हाथ से प्याला तो क्या हुआ धरती को मेरी ज़ात से कुछ तो नमी मिली फूटा है मेरे पाँव का छाला तो क्या हुआ सारे जहाँ ने मुझ पे लगाई हैं तोहमतें तुम ने भी मेरा नाम उछाला तो क्या हुआ सर पर है माँ के प्यार का आँचल पड़ा हुआ मुझ पर नहीं है कोई दुशाला तो क्या हुआ मंचों पे चुटकुले हैं लतीफ़े हैं आज-कल मंचों पे ने हैं पंत निराला तो क्या हुआ ऐ ज़िंदगी तू पास में बैठी हुई तो है शीशे में तुझ को गर नहीं ढाला तो क्या हुआ आँखों के घर में आई नहीं रौशनी 'कुँवर' टूटा है फिर से नींद का ताला तो क्या हुआ

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा

Hasan Abbasi

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इस नए माहौल में जो भी जिया बीमार है जिस किसी से भी नया परिचय किया बीमार है हंस रही है कांच के कपडे पहनकर बिजलियाँ उस को क्या मालूम मिट्टी का दिया बीमार है आज शब्दों की सभा में एक ये ही शोर था सुर्ख़ है क्यूँ सुर्खियाँ जब हाशियाँ बीमार है काम में आए नहीं धागे, सुई, मरहम, दवा आज भी जिस ज़ख़्म को हम ने सिया बीमार है रोग कुछ ऐसे मिले है शहर की झीलों को अब इनका पानी जिस किसी ने भी पिया बीमार है एक भी उम्मीद की चिट्ठी इधर आती नहीं हो न हो अपने समय का डाकिया बीमार है कल ग़ज़ल में प्यार के ही काफ़िये का ज़ोर था आज लेकिन प्यार का ही काफ़िया बीमार है

Kunwar Bechain

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साँचे में हम ने और के ढलने नहीं दिया दिल मोम का था फिर भी पिघलने नहीं दिया हाथों की ओट दे के जला लीं हथेलियाँ ऐ शम्अ'' तुझ को हम ने मचलने नहीं दिया दुनिया ने बहुत चाहा कि दिल जानवर बने मैं ने ही उस को जिस्म बदलने नहीं दिया ज़िद ये थी वो जलेगा तुम्हारे ही हाथ से उस ज़िद ने एक चराग़ को जलने नहीं दिया चेहरे को आज तक भी तेरा इंतिज़ार है हम ने गुलाल और को मलने नहीं दिया बाहर की ठोकरों से तो बच कर निकल गए पाँव को अपनी मोच ने चलने नहीं दिया

Kunwar Bechain

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दिल पे मुश्किल है बहुत दिल की कहानी लिखना जैसे बहते हुए पानी पे हो पानी लिखना कोई उलझन ही रही होगी जो वो भूल गया मेरे हिस्से में कोई शाम सुहानी लिखना आते जाते हुए मौसम से अलग रह के ज़रा अब के ख़त में तो कोई बात पुरानी लिखना कुछ भी लिखने का हुनर तुझ को अगर मिल जाए इश्क़ को अश्कों के दरिया की रवानी लिखना इस इशारे को वो समझा तो मगर मुद्दत बा'द अपने हर ख़त में उसे रात-की-रानी लिखना

Kunwar Bechain

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