ghazalKuch Alfaaz

दो-जहाँ से मावरा हो जाएगा जो तिरे ग़म में फ़ना हो जाएगा दर्द जब दिल से जुदा हो जाएगा साज़-ए-हस्ती बे-सदा हो जाएगा देखिए अहद-ए-वफ़ा अच्छा नहीं मरना जीना साथ का हो जाएगा बे-नतीजा है ख़याल-ए-तर्क-ए-राह फिर किसी दिन सामना हो जाएगा अब ठहर जा याद-ए-जानाँ रो तो लूँ फ़र्ज़-ए-तन्हाई अदा हो जाएगा लहजा लहजा रख ख़याल-ए-हुस्न-ए-दोस्त लम्हा लम्हा काम का हो जाएगा ज़ौक़-ए-अज़्म-ए-बा-अमल दरकार है आग में भी रास्ता हो जाएगा अपनी जानिब जब नज़र उठ जाएगी ज़र्रा ज़र्रा आईना हो जाएगा

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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कुछ भी हो वो अब दिल से जुदा हो नहीं सकते हम मुजरिम-ए-तौहीन-ए-वफ़ा हो नहीं सकते ऐ मौज-ए-हवादिस तुझे मालूम नहीं क्या हम अहल-ए-मोहब्बत हैं फ़ना हो नहीं सकते इतना तो बता जाओ ख़फ़ा होने से पहले वो क्या करें जो तुम से ख़फ़ा हो नहीं सकते इक आप का दर है मिरी दुनिया-ए-अक़ीदत ये सज्दे कहीं और अदा हो नहीं सकते अहबाब पे दीवाने 'असद' कैसा भरोसा ये ज़हर भरे घूँट रवा हो नहीं सकते

Asad Bhopali

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तुम दूर हो तो प्यार का मौसम न आएगा अब के बरस बहार का मौसम न आएगा चूमूँगा किस की ज़ुल्फ़ घटाओं को देख कर इक जुर्म-ए-ख़ुश-गवार का मौसम न आएगा छलके शराब बर्क़ गिरे या जलें चराग़ ज़िक्र-ए-निगाह-ए-यार का मौसम न आएगा वादा-ख़िलाफ़ियों को तरस जाएगा यक़ीं रातों को इंतिज़ार का मौसम न आएगा तुझ से बिछड़ के ज़िंदगी हो जाएगी तवील एहसास के निखार का मौसम न आएगा

Asad Bhopali

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जब ज़रा रात हुई और मह ओ अंजुम आए बार-हा दिल ने ये महसूस किया तुम आए ऐसे इक़रार में इनकार के सौ पहलू हैं वो तो कहिए कि लबों पे न तबस्सुम आए न वो आवाज़ में रस है न वो लहजे में खनक कैसे कलियों को तिरा तर्ज़-ए-तकल्लुम आए बार-हा ये भी हुआ अंजुमन-ए-नाज़ से हम सूरत-ए-मौज उठे मिस्ल-ए-तलातुम आए ऐ मिरे वादा-शिकन एक न आने से तिरे दिल को बहकाने कई तल्ख़ तवहहुम आए

Asad Bhopali

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इश्क़ को जब हुस्न से नज़रें मिलाना आ गया ख़ुद-ब-ख़ुद घबरा के क़दमों में ज़माना आ गया जब ख़याल-ए-यार दिल में वालेहाना आ गया लौट कर गुज़रा हुआ काफ़िर ज़माना आ गया ख़ुश्क आँखें फीकी फीकी सी हँसी नज़रों में यास कोई देखे अब मुझे आँसू बहाना आ गया ग़ुंचा ओ गुल माह ओ अंजुम सब के सब बेकार थे आप क्या आए कि फिर मौसम सुहाना आ गया मैं भी देखूँ अब तिरा ज़ौक़-ए-जुनून-ए-बंदगी ले जबीन-ए-शौक़ उन का आस्ताना आ गया हुस्न-ए-काफ़िर हो गया आमादा-ए-तर्क-ए-जफ़ा फिर 'असद' मेरी तबाही का ज़माना आ गया

Asad Bhopali

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जब ज़िंदगी सुकून से महरूम हो गई उन की निगाह और भी मासूम हो गई हालात ने किसी से जुदा कर दिया मुझे अब ज़िंदगी से ज़िंदगी महरूम हो गई क़ल्ब ओ ज़मीर बे-हिस ओ बे-जान हो गए दुनिया ख़ुलूस ओ दर्द से महरूम हो गई उन की नज़र के कोई इशारे न पा सका मेरे जुनूँ की चारों तरफ़ धूम हो गई कुछ इस तरह से वक़्त ने लीं करवटें 'असद' हँसती हुई निगाह भी मग़्मूम हो गई

Asad Bhopali

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