ghazalKuch Alfaaz

तुम दूर हो तो प्यार का मौसम न आएगा अब के बरस बहार का मौसम न आएगा चूमूँगा किस की ज़ुल्फ़ घटाओं को देख कर इक जुर्म-ए-ख़ुश-गवार का मौसम न आएगा छलके शराब बर्क़ गिरे या जलें चराग़ ज़िक्र-ए-निगाह-ए-यार का मौसम न आएगा वादा-ख़िलाफ़ियों को तरस जाएगा यक़ीं रातों को इंतिज़ार का मौसम न आएगा तुझ से बिछड़ के ज़िंदगी हो जाएगी तवील एहसास के निखार का मौसम न आएगा

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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मेरे लिए तो इश्क़ का वा'दा है शा'इरी आधा सुरूर तुम हो तो आधा है शा'इरी रुद्राक्ष हाथ में है तो सीने में ओम है कृष्णा है मेरा दिल मेरी राधा है शा'इरी अपना तो मेल जोल ही बस आशिकों से है दरवेश का बस एक लबादा है शा'इरी हो आश्ना कोई तो दिखाती है अपना रंग बे रम्ज़ियों के वास्ते सादा है शा'इरी तुम सामने हो और मेरी दस्तरस में हो इस वक़्त मेरे दिल का इरादा है शा'इरी भगवान हो ख़ुदा हो मुहब्बत हो या बदन जिस सम्त भी चलो यही जादा है शा'इरी इस लिए भी इश्क़ ही लिखता हूँ मैं अली मेरा किसी से आख़री वा'दा है शा'इरी

Ali Zaryoun

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मुझे उदास कर गए हो ख़ुश रहो मिरे मिज़ाज पर गए हो ख़ुश रहो मिरे लिए न रुक सके तो क्या हुआ जहाँ कहीं ठहर गए हो ख़ुश रहो ख़ुशी हुई है आज तुम को देख कर बहुत निखर सँवर गए हो ख़ुश रहो उदास हो किसी की बे-वफ़ाई पर वफ़ा कहीं तो कर गए हो ख़ुश रहो गली में और लोग भी थे आश्ना हमें सलाम कर गए हो ख़ुश रहो तुम्हें तो मेरी दोस्ती पे नाज़ था इसी से अब मुकर गए हो ख़ुश रहो किसी की ज़िन्दगी बनो कि बंदगी मिरे लिए तो मर गए हो ख़ुश रहो

Fazil Jamili

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मैं ने जो कुछ भी सोचा हुआ है, मैं वो वक़्त आने पे कर जाऊँगा तुम मुझे ज़हर लगते हो और मैं किसी दिन तुम्हें पी के मर जाऊँगा तू तो बीनाई है मेरी तेरे अलावा मुझे कुछ भी दिखता नहीं मैं ने तुझ को अगर तेरे घर पे उतारा तो मैं कैसे घर जाऊँगा चाहता हूँ तुम्हें और बहुत चाहता हूँ, तुम्हें ख़ुद भी मालूम है हाँ अगर मुझ सेे पूछा किसी ने तो मैं सीधा मुँह पर मुकर जाऊँगा तेरे दिल से तेरे शहर से तेरे घर से तेरी आँख से तेरे दर से तेरी गलियों से तेरे वतन से निकाला हुआ हूँ किधर जाऊँगा

Tehzeeb Hafi

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दो-जहाँ से मावरा हो जाएगा जो तिरे ग़म में फ़ना हो जाएगा दर्द जब दिल से जुदा हो जाएगा साज़-ए-हस्ती बे-सदा हो जाएगा देखिए अहद-ए-वफ़ा अच्छा नहीं मरना जीना साथ का हो जाएगा बे-नतीजा है ख़याल-ए-तर्क-ए-राह फिर किसी दिन सामना हो जाएगा अब ठहर जा याद-ए-जानाँ रो तो लूँ फ़र्ज़-ए-तन्हाई अदा हो जाएगा लहजा लहजा रख ख़याल-ए-हुस्न-ए-दोस्त लम्हा लम्हा काम का हो जाएगा ज़ौक़-ए-अज़्म-ए-बा-अमल दरकार है आग में भी रास्ता हो जाएगा अपनी जानिब जब नज़र उठ जाएगी ज़र्रा ज़र्रा आईना हो जाएगा

Asad Bhopali

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कुछ भी हो वो अब दिल से जुदा हो नहीं सकते हम मुजरिम-ए-तौहीन-ए-वफ़ा हो नहीं सकते ऐ मौज-ए-हवादिस तुझे मालूम नहीं क्या हम अहल-ए-मोहब्बत हैं फ़ना हो नहीं सकते इतना तो बता जाओ ख़फ़ा होने से पहले वो क्या करें जो तुम से ख़फ़ा हो नहीं सकते इक आप का दर है मिरी दुनिया-ए-अक़ीदत ये सज्दे कहीं और अदा हो नहीं सकते अहबाब पे दीवाने 'असद' कैसा भरोसा ये ज़हर भरे घूँट रवा हो नहीं सकते

Asad Bhopali

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इश्क़ को जब हुस्न से नज़रें मिलाना आ गया ख़ुद-ब-ख़ुद घबरा के क़दमों में ज़माना आ गया जब ख़याल-ए-यार दिल में वालेहाना आ गया लौट कर गुज़रा हुआ काफ़िर ज़माना आ गया ख़ुश्क आँखें फीकी फीकी सी हँसी नज़रों में यास कोई देखे अब मुझे आँसू बहाना आ गया ग़ुंचा ओ गुल माह ओ अंजुम सब के सब बेकार थे आप क्या आए कि फिर मौसम सुहाना आ गया मैं भी देखूँ अब तिरा ज़ौक़-ए-जुनून-ए-बंदगी ले जबीन-ए-शौक़ उन का आस्ताना आ गया हुस्न-ए-काफ़िर हो गया आमादा-ए-तर्क-ए-जफ़ा फिर 'असद' मेरी तबाही का ज़माना आ गया

Asad Bhopali

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जब ज़िंदगी सुकून से महरूम हो गई उन की निगाह और भी मासूम हो गई हालात ने किसी से जुदा कर दिया मुझे अब ज़िंदगी से ज़िंदगी महरूम हो गई क़ल्ब ओ ज़मीर बे-हिस ओ बे-जान हो गए दुनिया ख़ुलूस ओ दर्द से महरूम हो गई उन की नज़र के कोई इशारे न पा सका मेरे जुनूँ की चारों तरफ़ धूम हो गई कुछ इस तरह से वक़्त ने लीं करवटें 'असद' हँसती हुई निगाह भी मग़्मूम हो गई

Asad Bhopali

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जब ज़रा रात हुई और मह ओ अंजुम आए बार-हा दिल ने ये महसूस किया तुम आए ऐसे इक़रार में इनकार के सौ पहलू हैं वो तो कहिए कि लबों पे न तबस्सुम आए न वो आवाज़ में रस है न वो लहजे में खनक कैसे कलियों को तिरा तर्ज़-ए-तकल्लुम आए बार-हा ये भी हुआ अंजुमन-ए-नाज़ से हम सूरत-ए-मौज उठे मिस्ल-ए-तलातुम आए ऐ मिरे वादा-शिकन एक न आने से तिरे दिल को बहकाने कई तल्ख़ तवहहुम आए

Asad Bhopali

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