ghazalKuch Alfaaz

दोस्ती में न दुश्मनी में हम क्या नज़र आएँगे किसी में हम क्यूँँ सजाते हैं ख़्वाब सदियों के चंद लम्हों की ज़िंदगी में हम सैर करते हैं दोनों आलम की अपने ख़्वाबों की पालकी में हम जब तुम्हारा ख़याल आता है डूब जाते हैं रौशनी में हम कोई आवाज़ क्यूँँ नहीं देता डगमगाते हैं तीरगी में हम प्यास हम को कहीं सताती है तैरते हैं कहीं नदी में हम रात होती तो कोई बात न थी लुट गए दिन की रौशनी में हम अपने माज़ी से बात करते हैं तेरी यादों की चाँदनी में हम

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं तुझे हर बहाने से हम देखते हैं हमारी तरफ़ अब वो कम देखते हैं वो नज़रें नहीं जिन को हम देखते हैं ज़माने के क्या क्या सितम देखते हैं हमीं जानते हैं जो हम देखते हैं

Dagh Dehlvi

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क्या कोई तस्वीर बन सकती है सूरत के बग़ैर फिर किसी से क्यूँँ मिले कोई ज़रूरत के बग़ैर दुश्मनी तो चाहने की इंतिहा का नाम है ये कहानी भी अधूरी है मोहब्बत के बग़ैर तेरी यादें हो गईं जैसे मुक़द्दस आयतें चैन आता ही नहीं दिल को तिलावत के बग़ैर धूप की हर साँस गिनते शाम तक जो आ गए छाँव में वो क्या जिएँ जीने की आदत के बग़ैर बच गया दामन अगर मेरे लहू के दाग़ से वो मिरा क़ातिल तो मर जाएगा शोहरत के बग़ैर उस की सरदारी से अब इनकार करना चाहिए रौशनी देता नहीं सूरज सियासत के बग़ैर हुस्न की दूकान हो कि इश्क़ का बाज़ार हो याँ कोई सौदा नहीं है दिल की दौलत के बग़ैर शबनमी चेहरा छुपाऊँ कैसे बच्चों से 'फहीम' शाम आती ही नहीं घर में तहारत के बग़ैर

Faheem Jogapuri

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अपने क़दम की चाप से यूँँ डर रहे हैं हम मक़्तल की सम्त जैसे सफ़र कर रहे हैं हम क्या चाँद और तारों को हम जानते नहीं ऐ आसमान वालो ज़मीं पर रहे हैं हम मुश्किल था सत्ह-ए-आब से हम को खंगालना बाहर नहीं थे जितना कि अंदर रहे हैं हम कल और कोई वक़्त की आँखों में हो तो क्या अब तक तो हर निगाह का मेहवर रहे हैं हम दैर-ओ-हरम से और भी आगे निकल गए हाँ अक़्ल की हुदूद से बाहर रहे हैं हम ऐ हम-सफ़र न पूछ मसाफ़त नसीब से तू जानता है कितने दिनों घर रहे हैं हम बाहर न आए हम भी अना के हिसार से इस जंग में तुम्हारे बराबर रहे हैं हम झरनों की क्या बिसात करें गुफ़्तुगू 'फहीम' दरिया गिरे जहाँ वो समुंदर रहे हैं हम

Faheem Jogapuri

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आना था जिसे आज वो आया तो नहीं है ये वक़्त बदलने का इशारा तो नहीं है दावत दे कभी क्यूँँ वो मोहब्बत से बुलाए दरिया से मिरी प्यास का रिश्ता तो नहीं है ये कौन गया है कि झपकती नहीं आँखें रस्ते में वो ठहरा हुआ लम्हा तो नहीं है हँसता हुआ चेहरा है दमकता हुआ पैकर गुज़रा हुआ ये मेरा ज़माना तो नहीं है आँखों ने अभी नींद का दामन नहीं छोड़ा ख़्वाबों से भरोसा अभी टूटा तो नहीं है दरिया में सर-ए-शाम है डूबा हुआ सूरज दिन-भर का मुसाफ़िर कोई प्यासा तो नहीं है छोड़ आए हो जिस के लिए आँचल की घनी छाँव इस शहर में वो धूप का टुकड़ा तो नहीं है रस्ते में 'फहीम' उस की तबीअ'त का बिगड़ना घर जाने का इक और बहाना तो नहीं है

Faheem Jogapuri

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शाम ख़ामोश है पेड़ों पे उजाला कम है लौट आए हैं सभी एक परिंदा कम है देख कर सूख गया कैसे बदन का पानी मैं न कहता था मिरी प्यास से दरिया कम है ख़ुद से मिलने की कभी गाँव में फ़ुर्सत न मिली शहर आए हैं यहाँ मिलना-मिलाना कम है आज क्यूँँ आँखों में पहले से नहीं हैं आँसू आज क्या बात है क्यूँँ मौज में दरिया कम है अपने मेहमान को पलकों पे बिठा लेती है मुफ़्लिसी जानती है घर मैं बिछौना कम है बस यही सोच के करने लगे हिजरत आँसू अपनी लाशों के मुक़ाबिल यहाँ कांधा कम है दिल की हर बात ज़बाँ पर नहीं आती है 'फहीम' मैं ने सोचा है ज़ियादा उसे लिक्खा कम है

Faheem Jogapuri

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