दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ बाज़ार से गुज़रा हूँ ख़रीदार नहीं हूँ ज़िंदा हूँ मगर ज़ीस्त की लज़्ज़त नहीं बाक़ी हर-चंद कि हूँ होश में हुश्यार नहीं हूँ इस ख़ाना-ए-हस्ती से गुज़र जाऊँगा बे-लौस साया हूँ फ़क़त नक़्श-ब-दीवार नहीं हूँ अफ़्सुर्दा हूँ इबरत से दवा की नहीं हाजत ग़म का मुझे ये ज़ोफ़ है बीमार नहीं हूँ वो गुल हूँ ख़िज़ाँ ने जिसे बर्बाद किया है उलझूँ किसी दामन से मैं वो ख़ार नहीं हूँ या रब मुझे महफ़ूज़ रख उस बुत के सितम से मैं उस की इनायत का तलबगार नहीं हूँ गो दावा-ए-तक़्वा नहीं दरगाह-ए-ख़ुदा में बुत जिस से हों ख़ुश ऐसा गुनहगार नहीं हूँ अफ़्सुर्दगी ओ ज़ोफ़ की कुछ हद नहीं 'अकबर' काफ़िर के मुक़ाबिल में भी दीं-दार नहीं हूँ
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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तिरी ज़ुल्फ़ों में दिल उलझा हुआ है बला के पेच में आया हुआ है न क्यूँँकर बू-ए-ख़ूँ ना में से आए उसी जल्लाद का लिक्खा हुआ है चले दुनिया से जिस की याद में हम ग़ज़ब है वो हमें भूला हुआ है कहूँ क्या हाल अगली इशरतों का वो था इक ख़्वाब जो भूला हुआ है जफ़ा हो या वफ़ा हम सब में ख़ुश हैं करें क्या अब तो दिल अटका हुआ है हुई है इश्क़ ही से हुस्न की क़द्र हमीं से आप का शोहरा हुआ है बुतों पर रहती है माइल हमेशा तबीअत को ख़ुदाया क्या हुआ है परेशाँ रहते हो दिन रात 'अकबर' ये किस की ज़ुल्फ़ का सौदा हुआ है
Akbar Allahabadi
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हंगामा है क्यूँँ बरपा थोड़ी सी जो पी ली है डाका तो नहीं मारा चोरी तो नहीं की है ना-तजरबा-कारी से वाइ'ज़ की ये हैं बातें इस रंग को क्या जाने पूछो तो कभी पी है उस मय से नहीं मतलब दिल जिस से है बेगाना मक़्सूद है उस मय से दिल ही में जो खिंचती है ऐ शौक़ वही मय पी ऐ होश ज़रा सो जा मेहमान-ए-नज़र इस दम एक बर्क़-ए-तजल्ली है वाँ दिल में कि सद में दो याँ जी में कि सब सह लो उन का भी अजब दिल है मेरा भी अजब जी है हर ज़र्रा चमकता है अनवार-ए-इलाही से हर साँस ये कहती है हम हैं तो ख़ुदा भी है सूरज में लगे धब्बा फ़ितरत के करिश्में हैं बुत हम को कहें काफ़िर अल्लाह की मर्ज़ी है ता'लीम का शोर ऐसा तहज़ीब का ग़ुल इतना बरकत जो नहीं होती निय्यत की ख़राबी है सच कहते हैं शैख़ 'अकबर' है ताअत-ए-हक़ लाज़िम हाँ तर्क-ए-मय-ओ-शाहिद ये उन की बुज़ुर्गी है
Akbar Allahabadi
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फ़लसफ़ी को बहस के अंदर ख़ुदा मिलता नहीं डोर को सुलझा रहा है और सिरा मिलता नहीं मा'रिफ़त ख़ालिक़ की आलम में बहुत दुश्वार है शहर-ए-तन में जब कि ख़ुद अपना पता मिलता नहीं ग़ाफ़िलों के लुत्फ़ को काफ़ी है दुनियावी ख़ुशी आक़िलों को बे-ग़म-ए-उक़्बा मज़ा मिलता नहीं कश्ती-ए-दिल की इलाही बहर-ए-हस्ती में हो ख़ैर नाख़ुदा मिलते हैं लेकिन बा-ख़ुदा मिलता नहीं ग़ाफ़िलों को क्या सुनाऊँ दास्तान-ए-इश्क़-ए-यार सुनने वाले मिलते हैं दर्द-आश्ना मिलता नहीं ज़िंदगानी का मज़ा मिलता था जिन की बज़्म में उन की क़ब्रों का भी अब मुझ को पता मिलता नहीं सिर्फ़ ज़ाहिर हो गया सरमाया-ए-ज़ेब-ओ-सफ़ा क्या तअ'ज्जुब है जो बातिन बा-सफ़ा मिलता नहीं पुख़्ता तबओं पर हवादिस का नहीं होता असर कोहसारों में निशान-ए-नक़्श-ए-पा मिलता नहीं शैख़-साहिब बरहमन से लाख बरतें दोस्ती बे-भजन गाए तो मंदिर से टिका मिलता नहीं जिस पे दिल आया है वो शीरीं-अदा मिलता नहीं ज़िंदगी है तल्ख़ जीने का मज़ा मिलता नहीं लोग कहते हैं कि बद-नामी से बचना चाहिए कह दो बे उस के जवानी का मज़ा मिलता नहीं अहल-ए-ज़ाहिर जिस क़दर चाहें करें बहस-ओ-जिदाल मैं ये समझा हूँ ख़ुदी में तो ख़ुदा मिलता नहीं चल बसे वो दिन कि यारों से भरी थी अंजुमन हाए अफ़्सोस आज सूरत-आश्ना मिलता नहीं मंज़िल-ए-इश्क़-ओ-तवक्कुल मंज़िल-ए-एज़ाज़ है शाह सब बस्ते हैं याँ कोई गदा मिलता नहीं बार तकलीफ़ों का मुझ पर बार-ए-एहसाँ से है सहल शुक्र की जा है अगर हाजत-रवा मिलता नहीं चाँदनी रातें बहार अपनी दिखाती हैं तो क्या बे तिरे मुझ को तो लुत्फ़ ऐ मह-लक़ा मिलता नहीं मा'नी-ए-दिल का करे इज़हार 'अकबर' किस तरह लफ़्ज़ मौज़ूँ बहर-ए-कश्फ़-ए-मुद्दआ मिलता नहीं
Akbar Allahabadi
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फिर गई आप की दो दिन में तबीअ'त कैसी ये वफ़ा कैसी थी साहब ये मुरव्वत कैसी दोस्त अहबाब से हँस बोल के कट जाएगी रात रिंद-ए-आज़ाद हैं हम को शब-ए-फ़ुर्क़त कैसी जिस हसीं से हुई उल्फ़त वही माशूक़ अपना इश्क़ किस चीज़ को कहते हैं तबीअ'त कैसी है जो क़िस्मत में वही होगा न कुछ कम न सिवा आरज़ू कहते हैं किस चीज़ को हसरत कैसी हाल खुलता नहीं कुछ दिल के धड़कने का मुझे आज रह रह के भर आती है तबीअ'त कैसी कूचा-ए-यार में जाता तो नज़ारा करता क़ैस आवारा है जंगल में ये वहशत कैसी
Akbar Allahabadi
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दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ बाज़ार से गुज़रा हूँ ख़रीदार नहीं हूँ ज़िंदा हूँ मगर ज़ीस्त की लज़्ज़त नहीं बाक़ी हर-चंद कि हूँ होश में हुश्यार नहीं हूँ इस ख़ाना-ए-हस्ती से गुज़र जाऊँगा बे-लौस साया हूँ फ़क़त नक़्श-ब-दीवार नहीं हूँ अफ़्सुर्दा हूँ इबरत से दवा की नहीं हाजत ग़म का मुझे ये ज़ोफ़ है बीमार नहीं हूँ वो गुल हूँ ख़िज़ाँ ने जिसे बर्बाद किया है उलझूँ किसी दामन से मैं वो ख़ार नहीं हूँ या रब मुझे महफ़ूज़ रख उस बुत के सितम से मैं उस की इनायत का तलबगार नहीं हूँ गो दावा-ए-तक़्वा नहीं दरगाह-ए-ख़ुदा में बुत जिस से हों ख़ुश ऐसा गुनहगार नहीं हूँ अफ़्सुर्दगी ओ ज़ोफ़ की कुछ हद नहीं 'अकबर' काफ़िर के मुक़ाबिल में भी दीं-दार नहीं हूँ
Akbar Allahabadi
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