एक मज्ज़ूब उदासी मेरे अंदर गुम है इस समुंदर में कोई और समुंदर गुम है बेबसी कैसा परिंदा है तुम्हें क्या मालूम उसे मालूम है जो मेरे बराबर गुम है चर्ख़-ए-सौ रंग को फ़ुर्सत हो तो ढूँडे उस को नील-गूँ सोच में जो मस्त क़लंदर गुम है धूप छाँव का कोई खेल है बीनाई भी आँख को ढूँड के लाया हूँ तो मंज़र गुम है संग-रेज़ों में महकता है कोई सुर्ख़ गुलाब वो जो माथे पे लगा था वही पत्थर गुम है एक मदफ़ून दफ़ीना इन्हीं अतराफ़ में था ख़ाक उड़ती है यहाँ और वो गौहर गुम है
Related Ghazal
उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
465 likes
ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
355 likes
मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
456 likes
इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ
Mehshar Afridi
173 likes
ये सात आठ पड़ोसी कहाँ से आए मेरे तुम्हारे दिल में तो कोई न था सिवाए मेरे किसी ने पास बिठाया बस आगे याद नहीं मुझे तो दोस्त वहाँ से उठा के लाए मेरे ये सोच कर न किए अपने दर्द उस के सुपुर्द वो लालची है असासे न बेच खाए मेरे इधर किधर तू नया है यहाँ कि पागल है किसी ने क्या तुझे क़िस्से नहीं सुनाए मेरे वो आज़माए मेरे दोस्त को ज़रूर मगर उसे कहो कि तरीके न आज़माए मेरे
Umair Najmi
59 likes
More from Rafi Raza
कभी जो ख़ाक की तक़रीब-ए-रू-नुमाई हुई बहुत उड़ेगी वहाँ भी मिरी उड़ाई हुई ख़ुदा का शुक्र-ए-सुख़न मुझ पे मेहरबान हुआ बहुत दिनों से थी लुक्नत ज़बाँ में आई हुई यही है ग़ज़्ज़-ए-बसर ये है देखना मेरा रहेगी आँख तहय्युर में डबडबाई हुई तुम्हारा मेरा तअल्लुक़ है जो रहे सो रहे तुम्हारे हिज्र ने क्यूँँ टाँग है अड़ाई हुई पकड़ लिया गया जैसे कि मैं लगाता हूँ बुझा रहा था किसी और की लगाई हुई लहू लहू हुआ सज्दे में दिल अगरचे 'रज़ा' शब-ए-शिकस्त बड़े ज़ोर की लड़ाई हुई
Rafi Raza
0 likes
ख़्वाब में या ख़याल में मुझे मिल तू कभी ख़द्द-ओ-ख़ाल में मुझे मिल मेरे दिल की धमाल में मुझे देख मेरे सुर मेरी ताल में मुझे मिल मेरी मिट्टी को आँख दी है तो फिर किसी मौज-ए-विसाल में मुझे मिल मुझे क्यूँँ अरसा-ए-हयात दिया अब इन्हें माह-ओ-साल में मुझे मिल किसी सुब्ह-ए-फ़िराक़ में मुझे छोड़ किसी शाम मलाल में मुझे मिल तू ख़ुद अपनी मिसाल है वो तो है इसी अपनी मिसाल में मुझे मिल तेरे शायान-ए-शाँ है वस्फ़ यही किसी वक़्त-ए-मुहाल में मुझे मिल मेरे कल का पता नहीं मेरी जाँ तू अभी मेरे हाल में मुझे मिल मुझे मिल कर उरूज दे या न दे मेरे वक़्त-ए-ज़वाल में मुझे मिल
Rafi Raza
0 likes
लम्स को छोड़ के ख़ुशबू पे क़नाअ'त नहीं करने वाला ऐसी-वैसी तो मैं अब तुम से मोहब्बत नहीं करने वाला मुझ से बेहतर कोई दुनिया में किताबत नहीं करने वाला पर तिरे हिज्र की मैं जल्द इशाअत नहीं करने वाला अपने ही जिस्म को कल उस ने मिरी आँखों से पूरा देखा इस से बढ़ कर कोई मंज़र कभी हैरत नहीं करने वाला मज़हब-ए-इश्क़ से मंसूब ये बातें तो ख़ारिज की हैं शाम-ए-हिज्राँ मैं किसी तौर मैं शिरकत नहीं करने वाला ऐसी भगदड़ में कोई पावँ तले आए तो शिकवा न करे गिर गया मैं तो कोई मुझ से रिआ'यत नहीं करने वाला लौ लरज़ने का कोई और ही मतलब न निकल आए कहीं पूछने पर भी चराग़ और वज़ाहत नहीं करने वाला मुझे चलते हुए रस्ते के शजर देखते जाते हैं 'रज़ा' पर मिरे साथ उखड़ कर कोई हिजरत नहीं करने वाला
Rafi Raza
0 likes
मैं अपनी आँख को उस का जहान दे दूँ क्या ज़मीन खींच लूँ और आसमान दे दूँ क्या मैं दुनिया ज़ाद नहीं हूँ मुझे नहीं मंज़ूर मकान ले के तुम्हें ला-मकान दे दूँ क्या कि एक रोज़ खुला रह गया था आईना अगर गवाह बनूँ तो बयान दे दूँ क्या उड़े कुछ ऐसे कि मेरा निशान तक न रहे मैं अपनी ख़ाक को इतनी उड़ान दे दूँ क्या ये लग रहा है कि ना-ख़ुश हो दोस्ती में तुम तुम्हारे हाथ में तीर ओ कमान दे दूँ क्या समझ नहीं रहे बे-रंग आँसुओं का कहा उन्हें मैं सुर्ख़-लहू की ज़बान दे दूँ क्या सुना है ज़िंदगी कोई तह-ए-समुंदर है भँवर के हाथ में ये बादबान दे दूँ क्या ये फ़ैसला मुझे करना है ठंडे दिल से 'रज़ा' नहीं बदलता ज़माना तो जान दे दूँ क्या
Rafi Raza
1 likes
अगरचे वक़्त मुनाजात करने वाला था मिरा मिज़ाज सवालात करने वाला था मुझे सलीक़ा न था रौशनी से मिलने का मैं हिज्र में गुज़र-औक़ात करने वाला था मैं सामने से उठा और लौ लरज़ने लगी चराग़ जैसे कोई बात करने वाला था खुली हुई थीं बदन पर रवाँ रवाँ आँखें न जाने कौन मुलाक़ात करने वाला था वो मेरे काबा-ए-दिल में ज़रा सी देर रुका ये हज अदा वो मिरे साथ करने वाला था कहाँ ये ख़ाक के तोदे तले दबा हुआ जिस्म कहाँ मैं सैर-ए-समावात करने वाला था
Rafi Raza
1 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Rafi Raza.
Similar Moods
More moods that pair well with Rafi Raza's ghazal.







