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अगरचे वक़्त मुनाजात करने वाला था मिरा मिज़ाज सवालात करने वाला था मुझे सलीक़ा न था रौशनी से मिलने का मैं हिज्र में गुज़र-औक़ात करने वाला था मैं सामने से उठा और लौ लरज़ने लगी चराग़ जैसे कोई बात करने वाला था खुली हुई थीं बदन पर रवाँ रवाँ आँखें न जाने कौन मुलाक़ात करने वाला था वो मेरे काबा-ए-दिल में ज़रा सी देर रुका ये हज अदा वो मिरे साथ करने वाला था कहाँ ये ख़ाक के तोदे तले दबा हुआ जिस्म कहाँ मैं सैर-ए-समावात करने वाला था

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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा

Fahmi Badayuni

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क्या ग़लतफ़हमी में रह जाने का सदमा कुछ नहीं वो मुझे समझा तो सकता था कि ऐसा कुछ नहीं इश्क़ से बच कर भी बंदा कुछ नहीं होता मगर ये भी सच है इश्क़ में बंदे का बचता कुछ नहीं जाने कैसे राज़ सीने में लिए बैठा है वो ज़ह्र खा लेता है पर मुँह से उगलता कुछ नहीं शुक्र है कि उस ने मुझ सेे कह दिया कि कुछ तो है मैं उस सेे कहने ही वाला था कि अच्छा कुछ नहीं

Tehzeeb Hafi

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किसे फ़ुर्सत-ए-मह-ओ-साल है ये सवाल है कोई वक़्त है भी कि जाल है ये सवाल है न है फ़िक्र-ए-गर्दिश-ए-आसमाँ न ख़याल-ए-जाँ मुझे फिर ये कैसा मलाल है ये सवाल है वो सवाल जिस का जवाब है मेरी ज़िन्दगी मेरी ज़िन्दगी का सवाल है ये सवाल है मैं बिछड़ के तुझ सेे बुलंदियों पे जो पस्त हूँ ये उरूज है कि ज़वाल है ये सवाल है

Abbas Qamar

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किस तरह होगा फ़कीरों का गुज़ारा सोचे उस सेे कहना कि वो इक बार दुबारा सोचे कैसे मुमकिन है उसे और कोई काम न हो कैसे मुमकिन है कि वो सिर्फ़ हमारा सोचे तेरे अफ़लाक पे जाए तो सितारा चमके मेरे अफ़लाक पे आए तो सितारा सोचे टूटे पतवार की कश्ती का मुक़द्दर क्या है ये तो दरिया ही बताए या किनारा सोचे ऐसा मौका हो कि बस एक ही बच सकता हो और उस वक़्त भी एक शख़्स तुम्हारा सोचे

Zahid Bashir

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कभी ख़ुद पे कभी हालात पे रोना आया बात निकली तो हर इक बात पे रोना आया हम तो समझे थे कि हम भूल गए हैं उन को क्या हुआ आज ये किस बात पे रोना आया किस लिए जीते हैं हम किस के लिए जीते हैं बारहा ऐसे सवालात पे रोना आया कौन रोता है किसी और की ख़ातिर ऐ दोस्त सब को अपनी ही किसी बात पे रोना आया

Sahir Ludhianvi

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कभी जो ख़ाक की तक़रीब-ए-रू-नुमाई हुई बहुत उड़ेगी वहाँ भी मिरी उड़ाई हुई ख़ुदा का शुक्र-ए-सुख़न मुझ पे मेहरबान हुआ बहुत दिनों से थी लुक्नत ज़बाँ में आई हुई यही है ग़ज़्ज़-ए-बसर ये है देखना मेरा रहेगी आँख तहय्युर में डबडबाई हुई तुम्हारा मेरा तअल्लुक़ है जो रहे सो रहे तुम्हारे हिज्र ने क्यूँँ टाँग है अड़ाई हुई पकड़ लिया गया जैसे कि मैं लगाता हूँ बुझा रहा था किसी और की लगाई हुई लहू लहू हुआ सज्दे में दिल अगरचे 'रज़ा' शब-ए-शिकस्त बड़े ज़ोर की लड़ाई हुई

Rafi Raza

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लम्स को छोड़ के ख़ुशबू पे क़नाअ'त नहीं करने वाला ऐसी-वैसी तो मैं अब तुम से मोहब्बत नहीं करने वाला मुझ से बेहतर कोई दुनिया में किताबत नहीं करने वाला पर तिरे हिज्र की मैं जल्द इशाअत नहीं करने वाला अपने ही जिस्म को कल उस ने मिरी आँखों से पूरा देखा इस से बढ़ कर कोई मंज़र कभी हैरत नहीं करने वाला मज़हब-ए-इश्क़ से मंसूब ये बातें तो ख़ारिज की हैं शाम-ए-हिज्राँ मैं किसी तौर मैं शिरकत नहीं करने वाला ऐसी भगदड़ में कोई पावँ तले आए तो शिकवा न करे गिर गया मैं तो कोई मुझ से रिआ'यत नहीं करने वाला लौ लरज़ने का कोई और ही मतलब न निकल आए कहीं पूछने पर भी चराग़ और वज़ाहत नहीं करने वाला मुझे चलते हुए रस्ते के शजर देखते जाते हैं 'रज़ा' पर मिरे साथ उखड़ कर कोई हिजरत नहीं करने वाला

Rafi Raza

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ख़्वाब में या ख़याल में मुझे मिल तू कभी ख़द्द-ओ-ख़ाल में मुझे मिल मेरे दिल की धमाल में मुझे देख मेरे सुर मेरी ताल में मुझे मिल मेरी मिट्टी को आँख दी है तो फिर किसी मौज-ए-विसाल में मुझे मिल मुझे क्यूँँ अरसा-ए-हयात दिया अब इन्हें माह-ओ-साल में मुझे मिल किसी सुब्ह-ए-फ़िराक़ में मुझे छोड़ किसी शाम मलाल में मुझे मिल तू ख़ुद अपनी मिसाल है वो तो है इसी अपनी मिसाल में मुझे मिल तेरे शायान-ए-शाँ है वस्फ़ यही किसी वक़्त-ए-मुहाल में मुझे मिल मेरे कल का पता नहीं मेरी जाँ तू अभी मेरे हाल में मुझे मिल मुझे मिल कर उरूज दे या न दे मेरे वक़्त-ए-ज़वाल में मुझे मिल

Rafi Raza

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एक मज्ज़ूब उदासी मेरे अंदर गुम है इस समुंदर में कोई और समुंदर गुम है बेबसी कैसा परिंदा है तुम्हें क्या मालूम उसे मालूम है जो मेरे बराबर गुम है चर्ख़-ए-सौ रंग को फ़ुर्सत हो तो ढूँडे उस को नील-गूँ सोच में जो मस्त क़लंदर गुम है धूप छाँव का कोई खेल है बीनाई भी आँख को ढूँड के लाया हूँ तो मंज़र गुम है संग-रेज़ों में महकता है कोई सुर्ख़ गुलाब वो जो माथे पे लगा था वही पत्थर गुम है एक मदफ़ून दफ़ीना इन्हीं अतराफ़ में था ख़ाक उड़ती है यहाँ और वो गौहर गुम है

Rafi Raza

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मैं अपनी आँख को उस का जहान दे दूँ क्या ज़मीन खींच लूँ और आसमान दे दूँ क्या मैं दुनिया ज़ाद नहीं हूँ मुझे नहीं मंज़ूर मकान ले के तुम्हें ला-मकान दे दूँ क्या कि एक रोज़ खुला रह गया था आईना अगर गवाह बनूँ तो बयान दे दूँ क्या उड़े कुछ ऐसे कि मेरा निशान तक न रहे मैं अपनी ख़ाक को इतनी उड़ान दे दूँ क्या ये लग रहा है कि ना-ख़ुश हो दोस्ती में तुम तुम्हारे हाथ में तीर ओ कमान दे दूँ क्या समझ नहीं रहे बे-रंग आँसुओं का कहा उन्हें मैं सुर्ख़-लहू की ज़बान दे दूँ क्या सुना है ज़िंदगी कोई तह-ए-समुंदर है भँवर के हाथ में ये बादबान दे दूँ क्या ये फ़ैसला मुझे करना है ठंडे दिल से 'रज़ा' नहीं बदलता ज़माना तो जान दे दूँ क्या

Rafi Raza

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