ghazalKuch Alfaaz

लम्स को छोड़ के ख़ुशबू पे क़नाअ'त नहीं करने वाला ऐसी-वैसी तो मैं अब तुम से मोहब्बत नहीं करने वाला मुझ से बेहतर कोई दुनिया में किताबत नहीं करने वाला पर तिरे हिज्र की मैं जल्द इशाअत नहीं करने वाला अपने ही जिस्म को कल उस ने मिरी आँखों से पूरा देखा इस से बढ़ कर कोई मंज़र कभी हैरत नहीं करने वाला मज़हब-ए-इश्क़ से मंसूब ये बातें तो ख़ारिज की हैं शाम-ए-हिज्राँ मैं किसी तौर मैं शिरकत नहीं करने वाला ऐसी भगदड़ में कोई पावँ तले आए तो शिकवा न करे गिर गया मैं तो कोई मुझ से रिआ'यत नहीं करने वाला लौ लरज़ने का कोई और ही मतलब न निकल आए कहीं पूछने पर भी चराग़ और वज़ाहत नहीं करने वाला मुझे चलते हुए रस्ते के शजर देखते जाते हैं 'रज़ा' पर मिरे साथ उखड़ कर कोई हिजरत नहीं करने वाला

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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

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तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं तुझे हर बहाने से हम देखते हैं हमारी तरफ़ अब वो कम देखते हैं वो नज़रें नहीं जिन को हम देखते हैं ज़माने के क्या क्या सितम देखते हैं हमीं जानते हैं जो हम देखते हैं

Dagh Dehlvi

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आँख को आइना समझते हो तुम भी सबकी तरह समझते हो दोस्त अब क्यूँ नहीं समझते तुम तुम तो कहते थे ना समझते हो अपना ग़म तुम को कैसे समझाऊँ सब सेे हारा हुआ समझते हो मेरी दुनिया उजड़ गई इस में तुम इसे हादसा समझते हो आख़िरी रास्ता तो बाक़ी है आख़िरी रास्ता समझते हो

Himanshi babra KATIB

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अब मेरे साथ नहीं है समझे ना समझाने की बात नहीं है समझे ना तुम माँगोगे और तुम्हें मिल जाएगा प्यार है ये ख़ैरात नहीं है समझे ना मैं बादल हूँ जिस पर चाहूँ बरसूँगा मेरी कोई ज़ात नहीं है समझे ना अपना ख़ाली हाथ मुझे मत दिखलाओ इस में मेरा हाथ नहीं है समझे ना

Zubair Ali Tabish

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सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई क्यूँँ चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई साबित हुआ सुकून-ए-दिल-ओ-जाँ कहीं नहीं रिश्तों में ढूँढ़ता है तो ढूँडा करे कोई तर्क-ए-तअल्लुक़ात कोई मसअला नहीं ये तो वो रास्ता है कि बस चल पड़े कोई दीवार जानता था जिसे मैं वो धूल थी अब मुझ को ए'तिमाद की दावत न दे कोई मैं ख़ुद ये चाहता हूँ कि हालात हों ख़राब मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलता फिरे कोई ऐ शख़्स अब तो मुझ को सभी कुछ क़ुबूल है ये भी क़ुबूल है कि तुझे छीन ले कोई हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ आख़िर मेरे मिज़ाज में क्यूँँ दख़्ल दे कोई इक शख़्स कर रहा है अभी तक वफ़ा का ज़िक्र काश उस ज़बाँ-दराज़ का मुँह नोच ले कोई

Jaun Elia

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कभी जो ख़ाक की तक़रीब-ए-रू-नुमाई हुई बहुत उड़ेगी वहाँ भी मिरी उड़ाई हुई ख़ुदा का शुक्र-ए-सुख़न मुझ पे मेहरबान हुआ बहुत दिनों से थी लुक्नत ज़बाँ में आई हुई यही है ग़ज़्ज़-ए-बसर ये है देखना मेरा रहेगी आँख तहय्युर में डबडबाई हुई तुम्हारा मेरा तअल्लुक़ है जो रहे सो रहे तुम्हारे हिज्र ने क्यूँँ टाँग है अड़ाई हुई पकड़ लिया गया जैसे कि मैं लगाता हूँ बुझा रहा था किसी और की लगाई हुई लहू लहू हुआ सज्दे में दिल अगरचे 'रज़ा' शब-ए-शिकस्त बड़े ज़ोर की लड़ाई हुई

Rafi Raza

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ख़्वाब में या ख़याल में मुझे मिल तू कभी ख़द्द-ओ-ख़ाल में मुझे मिल मेरे दिल की धमाल में मुझे देख मेरे सुर मेरी ताल में मुझे मिल मेरी मिट्टी को आँख दी है तो फिर किसी मौज-ए-विसाल में मुझे मिल मुझे क्यूँँ अरसा-ए-हयात दिया अब इन्हें माह-ओ-साल में मुझे मिल किसी सुब्ह-ए-फ़िराक़ में मुझे छोड़ किसी शाम मलाल में मुझे मिल तू ख़ुद अपनी मिसाल है वो तो है इसी अपनी मिसाल में मुझे मिल तेरे शायान-ए-शाँ है वस्फ़ यही किसी वक़्त-ए-मुहाल में मुझे मिल मेरे कल का पता नहीं मेरी जाँ तू अभी मेरे हाल में मुझे मिल मुझे मिल कर उरूज दे या न दे मेरे वक़्त-ए-ज़वाल में मुझे मिल

Rafi Raza

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अगरचे वक़्त मुनाजात करने वाला था मिरा मिज़ाज सवालात करने वाला था मुझे सलीक़ा न था रौशनी से मिलने का मैं हिज्र में गुज़र-औक़ात करने वाला था मैं सामने से उठा और लौ लरज़ने लगी चराग़ जैसे कोई बात करने वाला था खुली हुई थीं बदन पर रवाँ रवाँ आँखें न जाने कौन मुलाक़ात करने वाला था वो मेरे काबा-ए-दिल में ज़रा सी देर रुका ये हज अदा वो मिरे साथ करने वाला था कहाँ ये ख़ाक के तोदे तले दबा हुआ जिस्म कहाँ मैं सैर-ए-समावात करने वाला था

Rafi Raza

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मैं अपनी आँख को उस का जहान दे दूँ क्या ज़मीन खींच लूँ और आसमान दे दूँ क्या मैं दुनिया ज़ाद नहीं हूँ मुझे नहीं मंज़ूर मकान ले के तुम्हें ला-मकान दे दूँ क्या कि एक रोज़ खुला रह गया था आईना अगर गवाह बनूँ तो बयान दे दूँ क्या उड़े कुछ ऐसे कि मेरा निशान तक न रहे मैं अपनी ख़ाक को इतनी उड़ान दे दूँ क्या ये लग रहा है कि ना-ख़ुश हो दोस्ती में तुम तुम्हारे हाथ में तीर ओ कमान दे दूँ क्या समझ नहीं रहे बे-रंग आँसुओं का कहा उन्हें मैं सुर्ख़-लहू की ज़बान दे दूँ क्या सुना है ज़िंदगी कोई तह-ए-समुंदर है भँवर के हाथ में ये बादबान दे दूँ क्या ये फ़ैसला मुझे करना है ठंडे दिल से 'रज़ा' नहीं बदलता ज़माना तो जान दे दूँ क्या

Rafi Raza

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एक मज्ज़ूब उदासी मेरे अंदर गुम है इस समुंदर में कोई और समुंदर गुम है बेबसी कैसा परिंदा है तुम्हें क्या मालूम उसे मालूम है जो मेरे बराबर गुम है चर्ख़-ए-सौ रंग को फ़ुर्सत हो तो ढूँडे उस को नील-गूँ सोच में जो मस्त क़लंदर गुम है धूप छाँव का कोई खेल है बीनाई भी आँख को ढूँड के लाया हूँ तो मंज़र गुम है संग-रेज़ों में महकता है कोई सुर्ख़ गुलाब वो जो माथे पे लगा था वही पत्थर गुम है एक मदफ़ून दफ़ीना इन्हीं अतराफ़ में था ख़ाक उड़ती है यहाँ और वो गौहर गुम है

Rafi Raza

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