एक मुद्दत हुई घर से निकले हुए अपने माहौल में ख़ुद को देखे हुए एक दिन हम अचानक बड़े हो गए खेल में दौड़ कर उस को छूते हुए सब गुज़रते रहे सफ़-ब-सफ़ पास से मेरे सीने पे इक फूल रखते हुए जैसे ये मेज़ मिट्टी का हाथी ये फूल एक कोने में हम भी हैं रक्खे हुए शर्म तो आई लेकिन ख़ुशी भी हुई अपना दुख उस के चेहरे पे पढ़ते हुए बस बहुत हो चुका आइने से गिला देख लेगा कोई ख़ुद से मिलते हुए ज़िंदगी भर रहे हैं अँधेरे में हम रौशनी से परेशान होते हुए
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जिस तरह वक़्त गुज़रने के लिए होता है आदमी शक्ल पे मरने के लिए होता है तेरी आँखों से मुलाक़ात हुई तब ये खुला डूबने वाला उभरने के लिए होता है इश्क़ क्यूँँ पीछे हटा बात निभाने से मियाँ हुस्न तो ख़ैर मुकरने के लिए होता है आँख होती है किसी राह को तकने के लिए दिल किसी पाँव पे धरने के लिए होता है दिल की दिल्ली का चुनाव ही अलग है साहब जब भी होता है ये हरने के लिए होता है कोई बस्ती हो उजड़ने के लिए बसती है कोई मज़मा हो बिखरने के लिए होता है
Ali Zaryoun
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ये सात आठ पड़ोसी कहाँ से आए मेरे तुम्हारे दिल में तो कोई न था सिवाए मेरे किसी ने पास बिठाया बस आगे याद नहीं मुझे तो दोस्त वहाँ से उठा के लाए मेरे ये सोच कर न किए अपने दर्द उस के सुपुर्द वो लालची है असासे न बेच खाए मेरे इधर किधर तू नया है यहाँ कि पागल है किसी ने क्या तुझे क़िस्से नहीं सुनाए मेरे वो आज़माए मेरे दोस्त को ज़रूर मगर उसे कहो कि तरीके न आज़माए मेरे
Umair Najmi
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
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लोग सह लेते थे हँस कर कभी बे-ज़ारी भी अब तो मश्कूक हुई अपनी मिलन-सारी भी वार कुछ ख़ाली गए मेरे तो फिर आ ही गई अपने दुश्मन को दुआ देने की हुश्यारी भी उम्र भर किस ने भला ग़ौर से देखा था मुझे वक़्त कम हो तो सजा देती है बीमारी भी किस तरह आए हैं इस पहली मुलाक़ात तलक और मुकम्मल है जुदा होने की तय्यारी भी ऊब जाता हूँ ज़ेहानत की नुमाइश से तो फिर लुत्फ़ देता है ये लहजा मुझे बाज़ारी भी उम्र बढ़ती है मगर हम वहीं ठहरे हुए हैं ठोकरें खाईं तो कुछ आए समझदारी भी अब जो किरदार मुझे करना है मुश्किल है बहुत मस्त होने का दिखावा भी है सर भारी भी
Shariq Kaifi
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कम से कम दुनिया से इतना मिरा रिश्ता हो जाए कोई मेरा भी बुरा चाहने वाला हो जाए इसी मजबूरी में ये भीड़ इकट्ठा है यहाँ जो तिरे साथ नहीं आए वो तन्हा हो जाए शुक्र उस का अदा करने का ख़याल आए किसे अब्र जब इतना घना हो कि अँधेरा हो जाए हाँ नहीं चाहिए उस दर्जा मोहब्बत तेरी कि मिरा सच भी तिरे झूट का हिस्सा हो जाए बंद आँखों ने सराबों से बचाया है मुझे आँख वाला हो तो इस खेल में अंधा हो जाए मैं भी क़तरा हूँ तिरी बात समझ सकता हूँ ये कि मिट जाने के डर से कोई दरिया हो जाए बस इसी बात पे आईनों से बिगड़ी मेरी चाहता था मिरा अपना कोई चेहरा हो जाए बज़्म-ए-याराँ में यही रंग तो देते हैं मज़ा कोई रोए तो हँसी से कोई दोहरा हो जाए
Shariq Kaifi
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ख़्वाब वैसे तो इक इनायत है आँख खुल जाए तो मुसीबत है जिस्म आया किसी के हिस्से में दिल किसी और की अमानत है जान देने का वक़्त आ ही गया इस तमाशे के बा'द फ़ुर्सत है उम्र भर जिस के मश्वरों पे चले वो परेशान है तो हैरत है अब सँवरने का वक़्त उस को नहीं जब हमें देखने की फ़ुर्सत है उस पे उतने ही रंग खुलते हैं जिस की आँखों में जितनी हैरत है
Shariq Kaifi
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इंतिहा तक बात ले जाता हूँ मैं अब उसे ऐसे ही समझाता हूँ मैं कुछ हवा कुछ दिल धड़कने की सदा शोर में कुछ सुन नहीं पाता हूँ मैं बिन कहे आऊँगा जब भी आऊँगा मुंतज़िर आँखों से घबराता हूँ मैं याद आती है तिरी संजीदगी और फिर हँसता चला जाता हूँ मैं फ़ासला रख के भी क्या हासिल हुआ आज भी उस का ही कहलाता हूँ मैं छुप रहा हूँ आइने की आँख से थोड़ा थोड़ा रोज़ धुँदलाता हूँ मैं अपनी सारी शान खो देता है ज़ख़्म जब दवा करता नज़र आता हूँ मैं सच तो ये है मुस्तरद कर के उसे इक तरह से ख़ुद को झुटलाता हूँ मैं आज उस पर भी भटकना पड़ गया रोज़ जिस रस्ते से घर आता हूँ मैं
Shariq Kaifi
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गुज़र रहा है वो लम्हा तो याद आया है उस एक पल से कभी कितना ख़ौफ़ खाया है उसी निगाह ने आँखों को कर दिया पत्थर उसी निगाह में सब कुछ नज़र भी आया है ये तंज़ यूँँ भी है इक इम्तिहान मेरे लिए तिरे लबों से कोई और मुस्कुराया है बहे रक़ीब के आँसू भी मेरे गालों पर ये सानेहा भी मोहब्बत में पेश आया है ये कोई और है तेरी तरफ़ सरकता हुआ अँधेरा होते ही जो मुझ में आ समाया है हमारे इश्क़ से मरऊब इस क़दर भी न हो ये ख़ूँ तो एक अदाकार ने बहाएा है यहाँ तो रेत है पत्थर हैं और कुछ भी नहीं वो क्या दिखाने मुझे इतनी दूर लाया है बहुत से बोझ हैं दिल पर ये कोई ऐसा नहीं ये दुख किसी ने हमारे लिए उठाया है
Shariq Kaifi
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