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इक परिंदा अभी उड़ान में है तीर हर शख़्स की कमान में है जिस को देखो वही है चुप चुप सा जैसे हर शख़्स इम्तिहान में है खो चुके हम यक़ीन जैसी शय तू अभी तक किसी गुमान में है ज़िंदगी संग-दिल सही लेकिन आईना भी इसी चटान में है सर-बुलंदी नसीब हो कैसे सर-निगूँ है कि साएबान में है ख़ौफ़ ही ख़ौफ़ जागते सोते कोई आसेब इस मकान में है आसरा दिल को इक उमीद का है ये हवा कब से बादबान में है ख़ुद को पाया न उम्र भर हम ने कौन है जो हमारे ध्यान में है

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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन

Varun Anand

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए

Khumar Barabankvi

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फ़िक्र-ए-ग़ुर्बत है न अंदेशा-ए-तन्हाई है ज़िंदगी कितने हवादिस से गुज़र आई है लोग जिस हाल में मरने की दुआ करते हैं मैं ने उस हाल में जीने की क़सम खाई है हम न सुक़रात न मंसूर न ईसा लेकिन जो भी क़ातिल है हमारा ही तमन्नाई है ज़िंदगी और हैं कितने तिरे चेहरे ये बता तुझ से इक उम्र की हालाँकि शनासाई है कौन ना-वाक़िफ़-ए-अंजाम-ए-तबस्सुम है 'अमीर' मेरे हालात पे ये किस को हँसी आई है

Ameer Qazalbash

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हर गाम हादसा है ठहर जाइए जनाब रस्ता अगर हो याद तो घर जाइए जनाब ज़िंदा हक़ीक़तों के तलातुम हैं सामने ख़्वाबों की कश्तियों से उतर जाइए जनाब इंसाफ़ की सलीब हूँ सच्चाइयों का ज़हर मुझ से मिले बग़ैर गुज़र जाइए जनाब दिन का सफ़र तो कट गया सूरज के साथ साथ अब शब की अंजुमन में बिखर जाइए जनाब कोई चुरा के ले गया सदियों का ए'तिक़ाद मिम्बर की सीढ़ियों से उतर जाइए जनाब

Ameer Qazalbash

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दामन पे लहू हाथ में ख़ंजर न मिलेगा मिल जाएगा फिर भी वो सितमगर न मिलेगा पत्थर लिए हाथों में जिसे ढूँड रहा है वो तुझ को तिरी ज़ात से बाहर न मिलेगा आँखों में बसा लो ये उभरता हुआ सूरज दिन ढलने लगेगा तो ये मंज़र न मिलेगा मैं अपने ही घर में हूँ मगर सोच रहा हूँ क्या मुझ को मिरे घर में मिरा घर न मिलेगा गुज़रो किसी बस्ती से ज़रा भेस बदल कर नक़्शे में तुम्हें शहर-ए-सितमगर न मिलेगा

Ameer Qazalbash

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मेरी पहचान है क्या मेरा पता दे मुझ को कोई आईना अगर है तो दिखा दे मुझ को तुझ से मिलता हूँ तो अक्सर ये ख़याल आता है इस बुलंदी से अगर कोई गिरा दे मुझ को कब से पत्थर की चट्टानों में हूँ गुमनाम ओ असीर देवताओं की तरह कोई जगा दे मुझ को एक आईना सर-ए-राह लिए बैठा हूँ जुर्म ऐसा है कि हर शख़्स सज़ा दे मुझ को इन अँधेरों में अकेला ही जलूँगा कब तक कोई शय तू भी तो ख़ुर्शीद-नुमा दे मुझ को

Ameer Qazalbash

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पाईं हर एक राह-गुज़र पर उदासियाँ निकली हुई हैं कब से सफ़र पर उदासियाँ ख़्वाबीदा शहर जागने वाला है लौट आओ बैठी हुई हैं शाम से घर पर उदासियाँ मैं ख़ौफ़ से लरज़ता रहा पढ़ नहीं सका फैली हुई थीं एक ख़बर पर उदासियाँ सूरज के हाथ सब्ज़ क़बाओं तक आ गए अब हैं यहाँ हर एक शजर पर उदासियाँ अपने भी ख़त्त-ओ-ख़ाल निगाहों में अब नहीं इस तरह छा गई हैं नज़र पर उदासियाँ फैला रहा है कौन कभी सोचता हूँ मैं ख़्वाबों के एक एक नगर पर उदासियाँ सब लोग बन गए हैं अगर अजनबी तो क्या छोड़ आएँगी मुझे मिरे दर पर उदासियाँ

Ameer Qazalbash

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