ghazalKuch Alfaaz

हर गाम हादसा है ठहर जाइए जनाब रस्ता अगर हो याद तो घर जाइए जनाब ज़िंदा हक़ीक़तों के तलातुम हैं सामने ख़्वाबों की कश्तियों से उतर जाइए जनाब इंसाफ़ की सलीब हूँ सच्चाइयों का ज़हर मुझ से मिले बग़ैर गुज़र जाइए जनाब दिन का सफ़र तो कट गया सूरज के साथ साथ अब शब की अंजुमन में बिखर जाइए जनाब कोई चुरा के ले गया सदियों का ए'तिक़ाद मिम्बर की सीढ़ियों से उतर जाइए जनाब

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बस इक उसी पे तो पूरी तरह अयाॅं हूँ मैं वो कह रहा है मुझे रायगाॅं तो हाँ हूँ मैं जिसे दिखाई दूँ मेरी तरफ़ इशारा करे मुझे दिखाई नहीं दे रहा कहाॅं हूँ मैं इधर-उधर से नमी का रिसाव रहता है सड़क से नीचे बनाया गया मकाॅं हूँ मैं किसी ने पूछा कि तुम कौन हो तो भूल गया अभी किसी ने बताया तो था फ़लाॅं हूँ मैं मैं ख़ुद को तुझ से मिटाऊॅंगा एहतियात के साथ तू बस निशान लगा दे जहाॅं जहाॅं हूँ मैं मैं किस से पूछूॅं ये रस्ता दुरुस्त है कि ग़लत जहाॅं से कोई गुज़रता नहीं वहाॅं हूँ मैं

Umair Najmi

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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बची है रौशनी जो भी चराग़ों से निकल जाए जो मेरे दिल से निकला है दु'आओं से निकल जाए हम ऐसे लोग जो दुश्मन के रोने पर ठहर जाएँ वो ऐसा शख़्स जो अपनों की लाशों से निकल जाए पढ़ाने का अगर मतलब है हाथों से निकल जाना ख़ुदाया फिर मिरी बेटी भी हाथों से निकल जाए वही इक शख़्स था मेरा यहाँ पर जी लगाने को उसी को चाहते थे सब कि गाँव से निकल जाए इधर तो छू रही है जिस्म मेरा ठंडे हाथों से उधर वो चाहती है रात बातों से निकल जाए नुमाइश बाप की दौलत की कर के सोचता था मैं कि शायद इम्तिहान-ए-इश्क़ पैसों से निकल जाए

Kushal Dauneria

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मंज़िल पे न पहुँचे उसे रस्ता नहीं कहते दो चार क़दम चलने को चलना नहीं कहते इक हम हैं कि ग़ैरों को भी कह देते हैं अपना इक तुम हो कि अपनों को भी अपना नहीं कहते कम-हिम्मती ख़तरा है समुंदर के सफ़र में तूफ़ान को हम दोस्तो ख़तरा नहीं कहते बन जाए अगर बात तो सब कहते हैं क्या क्या और बात बिगड़ जाए तो क्या क्या नहीं कहते

Nawaz Deobandi

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सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं सुना है रब्त है उस को ख़राब-हालों से सो अपने आप को बर्बाद कर के देखते हैं सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उस की सो हम भी उस की गली से गुज़र के देखते हैं सुना है उस को भी है शे'र ओ शा'इरी से शग़फ़ सो हम भी मो'जिज़े अपने हुनर के देखते हैं सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं सुना है हश्र हैं उस की ग़ज़ाल सी आँखें सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उस की सुना है शाम को साए गुज़र के देखते हैं सुना है उस की सियह-चश्मगी क़यामत है सो उस को सुरमा-फ़रोश आह भर के देखते हैं सुना है उस के लबों से गुलाब जलते हैं सो हम बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं सुना है आइना तिमसाल है जबीं उस की जो सादा दिल हैं उसे बन-सँवर के देखते हैं सुना है जब से हमाइल हैं उस की गर्दन में मिज़ाज और ही लाल ओ गुहर के देखते हैं सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में पलंग ज़ाविए उस की कमर के देखते हैं सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं वो सर्व-क़द है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं कि उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं बस इक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का सो रह-रवान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं सुना है उस के शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त मकीं उधर के भी जल्वे इधर के देखते हैं रुके तो गर्दिशें उस का तवाफ़ करती हैं चले तो उस को ज़माने ठहर के देखते हैं किसे नसीब कि बे-पैरहन उसे देखे कभी कभी दर ओ दीवार घर के देखते हैं कहानियाँ ही सही सब मुबालग़े ही सही अगर वो ख़्वाब है ता'बीर कर के देखते हैं अब उस के शहर में ठहरें कि कूच कर जाएँ 'फ़राज़' आओ सितारे सफ़र के देखते हैं

Ahmad Faraz

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फ़िक्र-ए-ग़ुर्बत है न अंदेशा-ए-तन्हाई है ज़िंदगी कितने हवादिस से गुज़र आई है लोग जिस हाल में मरने की दुआ करते हैं मैं ने उस हाल में जीने की क़सम खाई है हम न सुक़रात न मंसूर न ईसा लेकिन जो भी क़ातिल है हमारा ही तमन्नाई है ज़िंदगी और हैं कितने तिरे चेहरे ये बता तुझ से इक उम्र की हालाँकि शनासाई है कौन ना-वाक़िफ़-ए-अंजाम-ए-तबस्सुम है 'अमीर' मेरे हालात पे ये किस को हँसी आई है

Ameer Qazalbash

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पाईं हर एक राह-गुज़र पर उदासियाँ निकली हुई हैं कब से सफ़र पर उदासियाँ ख़्वाबीदा शहर जागने वाला है लौट आओ बैठी हुई हैं शाम से घर पर उदासियाँ मैं ख़ौफ़ से लरज़ता रहा पढ़ नहीं सका फैली हुई थीं एक ख़बर पर उदासियाँ सूरज के हाथ सब्ज़ क़बाओं तक आ गए अब हैं यहाँ हर एक शजर पर उदासियाँ अपने भी ख़त्त-ओ-ख़ाल निगाहों में अब नहीं इस तरह छा गई हैं नज़र पर उदासियाँ फैला रहा है कौन कभी सोचता हूँ मैं ख़्वाबों के एक एक नगर पर उदासियाँ सब लोग बन गए हैं अगर अजनबी तो क्या छोड़ आएँगी मुझे मिरे दर पर उदासियाँ

Ameer Qazalbash

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मेरी पहचान है क्या मेरा पता दे मुझ को कोई आईना अगर है तो दिखा दे मुझ को तुझ से मिलता हूँ तो अक्सर ये ख़याल आता है इस बुलंदी से अगर कोई गिरा दे मुझ को कब से पत्थर की चट्टानों में हूँ गुमनाम ओ असीर देवताओं की तरह कोई जगा दे मुझ को एक आईना सर-ए-राह लिए बैठा हूँ जुर्म ऐसा है कि हर शख़्स सज़ा दे मुझ को इन अँधेरों में अकेला ही जलूँगा कब तक कोई शय तू भी तो ख़ुर्शीद-नुमा दे मुझ को

Ameer Qazalbash

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दिल में बे-नाम सी ख़ुशी है अभी ज़िंदगी मेरे काम की है अभी मैं भी तुझ से बिछड़ के सरगर्दां तेरी आँखों में भी नमी है अभी दिल की सुनसान रहगुज़ारों पर मैं ने इक चीख़ सी सुनी है अभी मैं ने माना बहुत अँधेरा है फिर भी थोड़ी सी रौशनी है अभी अपने आँसू 'अमीर' क्यूँँ पोंछूँ इन चराग़ों में रौशनी है अभी

Ameer Qazalbash

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ख़ौफ़ बन कर ये ख़याल आता है अक्सर मुझ को दश्त कर जाएगा इक रोज़ समुंदर मुझ को मैं सरापा हूँ ख़बर-नामा-ए-इमरोज़-ए-जहाँ कल भुला दे न ये दुनिया कहीं पढ़ कर मुझ को हर नफ़स मुझ में तग़य्युर की हवाए लर्ज़ां मुर्तसिम कर न सका कोई भी मंज़र मुझ को अपने साहिल पे मैं ख़ुद तिश्ना-दहन बैठा हूँ देख दरिया की तराई से निकल कर मुझ को मिरे साए में भी मुझ को नहीं रहने देगा मेरे ही घर में रखेगा कोई बे-घर मुझ को कार-गर कोई भी तदबीर न होने देगा क्या मुक़द्दर है कि ले जाएगा दर-दर मुझ को काम आएगी न बेदार-निगाही भी 'अमीर' ख़्वाब कह जाएगा इक दिन मिरा पैकर मुझ को

Ameer Qazalbash

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