ghazalKuch Alfaaz

फ़सील-ए-जिस्म गिरा दे मकान-ए-जाँ से निकल ये इंतिशार-ज़दा शहर है यहाँ से निकल तिरी तलाश में फिरते हैं आफ़्ताब कई सो अब ये फ़र्ज़ है तुझ पर कि साएबाँ से निकल तमाम शहर पे इक ख़ामुशी मुसल्लत है अब ऐसा कर कि किसी दिन मिरी ज़बाँ से निकल मक़ाम-ए-वस्ल तो अर्ज़-ओ-समा के बीच में है मैं इस ज़मीन से निकलूँ तू आसमाँ से निकल मैं अपनी ज़ात में तारीकियाँ समेटे हूँ तू इक चराग़ जला और अब यहाँ से निकल कहा था मुझ से भी इक दिन हवा-ए-सहरा ने मिरी पनाह में आ जा ग़ुबार-ए-जाँ से निकल

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मैं ने जो कुछ भी सोचा हुआ है, मैं वो वक़्त आने पे कर जाऊँगा तुम मुझे ज़हर लगते हो और मैं किसी दिन तुम्हें पी के मर जाऊँगा तू तो बीनाई है मेरी तेरे अलावा मुझे कुछ भी दिखता नहीं मैं ने तुझ को अगर तेरे घर पे उतारा तो मैं कैसे घर जाऊँगा चाहता हूँ तुम्हें और बहुत चाहता हूँ, तुम्हें ख़ुद भी मालूम है हाँ अगर मुझ सेे पूछा किसी ने तो मैं सीधा मुँह पर मुकर जाऊँगा तेरे दिल से तेरे शहर से तेरे घर से तेरी आँख से तेरे दर से तेरी गलियों से तेरे वतन से निकाला हुआ हूँ किधर जाऊँगा

Tehzeeb Hafi

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सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं सुना है रब्त है उस को ख़राब-हालों से सो अपने आप को बर्बाद कर के देखते हैं सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उस की सो हम भी उस की गली से गुज़र के देखते हैं सुना है उस को भी है शे'र ओ शा'इरी से शग़फ़ सो हम भी मो'जिज़े अपने हुनर के देखते हैं सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं सुना है हश्र हैं उस की ग़ज़ाल सी आँखें सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उस की सुना है शाम को साए गुज़र के देखते हैं सुना है उस की सियह-चश्मगी क़यामत है सो उस को सुरमा-फ़रोश आह भर के देखते हैं सुना है उस के लबों से गुलाब जलते हैं सो हम बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं सुना है आइना तिमसाल है जबीं उस की जो सादा दिल हैं उसे बन-सँवर के देखते हैं सुना है जब से हमाइल हैं उस की गर्दन में मिज़ाज और ही लाल ओ गुहर के देखते हैं सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में पलंग ज़ाविए उस की कमर के देखते हैं सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं वो सर्व-क़द है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं कि उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं बस इक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का सो रह-रवान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं सुना है उस के शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त मकीं उधर के भी जल्वे इधर के देखते हैं रुके तो गर्दिशें उस का तवाफ़ करती हैं चले तो उस को ज़माने ठहर के देखते हैं किसे नसीब कि बे-पैरहन उसे देखे कभी कभी दर ओ दीवार घर के देखते हैं कहानियाँ ही सही सब मुबालग़े ही सही अगर वो ख़्वाब है ता'बीर कर के देखते हैं अब उस के शहर में ठहरें कि कूच कर जाएँ 'फ़राज़' आओ सितारे सफ़र के देखते हैं

Ahmad Faraz

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सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो कहीं नहीं कोई सूरज धुआँ धुआँ है फ़ज़ा ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो

Nida Fazli

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ये किस तरह का तअ'ल्लुक़ है आप का मेरे साथ मुझे ही छोड़ के जाने का मशवरा मेरे साथ यही कहीं हमें रस्तों ने बद-दुआ दी थी मगर मैं भूल गया और कौन था मेरे साथ वो झाँकता नहीं खिड़की से दिन निकलता है तुझे यक़ीन नहीं आ रहा तो आ मेरे साथ

Tehzeeb Hafi

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यूँँ तो हर सम्त है इमदाद के बाज़ार खुले तेरे आगे ही मगर दस्त-ए-गुनहगार खुले आपने जुर्म किया आप का सर काटेंगे आपने इश्क़ किया आप की दस्तार खुले मेरे तोहफ़ों ने मोहब्बत का भरम तोड़ दिया चूड़ियाँ तंग निकल आई हैं और हार खुले

Ahmad Abdullah

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अभी तो आप ही हाइल है रास्ता शब का क़रीब आए तो देखेंगे हौसला शब का चली तो आई थी कुछ दूर साथ साथ मिरे फिर इस के बा'द ख़ुदा जाने क्या हुआ शब का मिरे ख़याल के वहशत-कदे में आते ही जुनूँ की नोक से फूटा है आबला शब का सहर की पहली किरन ने उसे बिखेर दिया मुझे समेटने आया था जब ख़ुदा शब का ज़मीं पे आ के सितारों ने ये कहा मुझ से तिरे क़रीब से गुज़रा है क़ाफ़िला शब का सहर का लम्स मिरी ज़िंदगी बढ़ा देता मगर गराँ था बहुत मुझ पे काटना शब का कभी कभी तो ये वहशत भी हम पे गुज़री है कि दिल के साथ ही देखा है डूबना शब का चटख़ उठी है रग-ए-जाँ तो ये ख़याल आया किसी की याद से जुड़ता है सिलसिला शब का

Abhishek shukla

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अब इख़्तियार में मौजें न ये रवानी है मैं बह रहा हूँ कि मेरा वजूद पानी है मैं और मेरी तरह तू भी एक हक़ीक़त है फिर इस के बा'द जो बचता है वो कहानी है तेरे वजूद में कुछ है जो इस ज़मीं का नहीं तेरे ख़याल की रंगत भी आसमानी है ज़रा भी दख़्ल नहीं इस में इन हवाओं का हमें तो मस्लहतन अपनी ख़ाक उड़ानी है ये ख़्वाब-गाह ये आँखें ये मेरा इश्क़-ए-क़दीम हर एक चीज़ मेरी ज़ात में पुरानी है वो एक दिन जो तुझे सोचने में गुज़रा था तमाम उम्र उसी दिन की तर्जुमानी है नवाह-ए-जाँ में भटकती हैं ख़ुशबुएँ जिस की वो एक फूल की लगता है रात-रानी है इरादतन तो कहीं कुछ नहीं हुआ लेकिन मैं जी रहा हूँ ये साँसों की ख़ुश-गुमानी है

Abhishek shukla

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तुझ सेे वाबस्ता कोई ग़म नहीं रखने वाले जिस को रखना हो रक्खे हम नहीं रखने वाले अपने उलझे हुए बालों की क़सम हम इस बार तेरी ज़ुल्फ़ों में कोई ख़म नहीं रखने वाले एक हव्वा की मुहब्बत के सिवा सीने में और कुछ हज़रत-ए-अदम नहीं रखने वाले

Abhishek shukla

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लहर का ख़्वाब हो के देखते हैं चल तह-ए-अब हो के देखते हैं उस पे इतना यक़ीन है हम को उस को बेताब हो के देखते हैं रात को रात हो के जाना था ख़्वाब को ख़्वाब हो के देखते हैं अपनी अरज़ानियों के सदक़े हम ख़ुद को नायाब हो के देखते हैं साहिलों की नज़र में आना है फिर तो ग़र्क़ाब हो के देखते हैं वो जो पायाब कह रहा था हमें उस को सैलाब हो के देखते हैं

Abhishek shukla

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चलते हुए मुझ में कहीं ठहरा हुआ तू है रस्ता नहीं मंज़िल नहीं अच्छा हुआ तू है ता'बीर तक आते ही तुझे छूना पड़ेगा लगता है कि हर ख़्वाब में देखा हुआ तू है मुझ जिस्म की मिट्टी पे तिरे नक़्श-ए-कफ़-ए-पा और मैं भी बड़ा ख़ुश कि अरे क्या हुआ तू है मैं यूँँ ही नहीं अपनी हिफ़ाज़त में लगा हूँ मुझ में कहीं लगता है कि रक्खा हुआ तू है वो नूर हो आँसू हो कि ख़्वाबों की धनक हो जो कुछ भी इन आँखों में इकट्ठा हुआ तू है इस घर में न हो कर भी फ़क़त तू ही रहेगा दीवार-ओ-दर-ए-जाँ में समाया हुआ तू है

Abhishek shukla

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