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ग़म उस को सारी रात सुनाया तो क्या हुआ या रोज़ उठ के सर को फिराया तो क्या हुआ उन ने तो मुझ को झूटे भी पूछा न एक बार मैं ने उसे हज़ार जताया तो क्या हुआ ख़्वाहाँ नहीं वो क्यूँँ ही मैं अपनी तरफ़ से यूँँ दिल दे के उस के हाथ बिकाया तो क्या हुआ अब स'ई कर सिपहर कि मेरे मूए गए उस का मिज़ाज मेहर पे आया तो क्या हुआ मत रंजा कर किसी को कि अपने तो ए'तिक़ाद दिल ढाए कर जो का'बा बनाया तो क्या हुआ मैं सैद-ए-नातवाँ भी तुझे क्या करूँँगा याद ज़ालिम इक और तीर लगाया तो क्या हुआ क्या क्या दुआएँ माँगी हैं ख़ल्वत में शैख़ यूँँ ज़ाहिर जहाँ से हाथ उठाया तो क्या हुआ वो फ़िक्र कर कि चाक-ए-जिगर पावे इल्तियाम नासेह जो तू ने जामा सुलाया तो क्या हुआ जीते तो 'मीर' उन ने मुझे दाग़ ही रक्खा फिर गोर पर चराग़ जलाया तो क्या हुआ

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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ख़राबी कुछ न पूछो मुलकत-ए-दिल की इमारत की ग़मों ने आज-कल सुनियो वो आबादी ही ग़ारत की निगाह-ए-मस्त से जब चश्म ने इस की इशारत की हलावत मय की और बुनियाद मयख़ाने की ग़ारत की सहर-गह मैं ने पूछा गुल से हाल-ए-ज़ार बुलबुल का पड़े थे बाग़ में यक-मुशत पर ऊधर इशारत की जलाया जिस तजल्ली-ए-जल्वा-गर ने तूर को हम-दम उसी आतिश के पर काले ने हम से भी शरारत की नज़ाकत क्या कहूँ ख़ुर्शीद-रू की कल शब-ए-मह में गया था साए साए बाग़ तक तिस पर हरारत की नज़र से जिस की यूसुफ़ सा गया फिर उस को क्या सूझे हक़ीक़त कुछ न पूछो पीर-ए-कनआँ' की बसारत की तिरे कूचे के शौक़-ए-तौफ़ में जैसे बगूला था बयाबाँ मैं ग़ुबार 'मीर' की हम ने ज़ियारत की

Meer Taqi Meer

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महर की तुझ से तवक़्क़ो' थी सितमगर निकला मोम समझे थे तिरे दिल को सो पत्थर निकला दाग़ हूँ रश्क-ए-मोहब्बत से कि इतना बेताब किस की तस्कीं के लिए घर से तू बाहर निकला जीते जी आह तिरे कूचे से कोई न फिरा जो सितम-दीदा रहा जा के सो मर कर निकला दिल की आबादी की इस हद है ख़राबी कि न पूछ जाना जाता है कि उस राह से लश्कर निकला अश्क-ए-तर क़तरा-ए-ख़ूँ लख़्त-ए-जिगर पारा-ए-दिल एक से एक अदद आँख से बह कर निकला कुंज-कावी जो की सीने की ग़म-ए-हिज्राँ ने इस दफ़ीने में से अक़साम-ए-जवाहर निकला हम ने जाना था लिखेगा तू कोई हर्फ़ ऐ 'मीर' पर तिरा नामा तो इक शौक़ का दफ़्तर निकला

Meer Taqi Meer

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शब था नालाँ अज़ीज़ कोई था मुर्ग़-ए-ख़ुश-ख़्वाँ अज़ीज़ कोई था थी तुम्हारे सितम की ताब उस तक सब्र जो याँ अज़ीज़ कोई था शब को उस का ख़याल था दिल में घर में मेहमाँ अज़ीज़ कोई था चाह बेजा न थी ज़ुलेख़ा की माह-ए-कनआँ अज़ीज़ कोई था अब तो उस की गली में ख़ार है लेक 'मीर' बे-जाँ अज़ीज़ कोई था

Meer Taqi Meer

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क्या कहें अपनी उस की शब की बात कहिए होवे जो कुछ भी ढब की बात अब तो चुप लग गई है हैरत से फिर खुलेगी ज़बान जब की बात नुक्ता-दानान-ए-रफ़्ता की न कहो बात वो है जो होवे अब की बात किस का रू-ए-सुख़न नहीं है उधर है नज़र में हमारी सब की बात ज़ुल्म है क़हर है क़यामत है ग़ुस्से में उस के ज़ेर-ए-लब की बात कहते हैं आगे था बुतों में रहम है ख़ुदा जानिए ये कब की बात गो कि आतिश-ज़बाँ थे आगे 'मीर' अब की कहिए गई वो तब की बात

Meer Taqi Meer

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बंद-ए-क़बा को ख़ूबाँ जिस वक़्त वा करेंगे ख़म्याज़ा-कश जो होंगे मिलने के क्या करेंगे रोना यही है मुझ को तेरी जफ़ा से हर-दम ये दिल-दिमाग़ दोनों कब तक वफ़ा करेंगे है दीन सर का देना गर्दन पे अपनी ख़ूबाँ जीते हैं तो तुम्हारा ये क़र्ज़ अदा करेंगे दरवेश हैं हम आख़िर दो-इक निगह की रुख़्सत गोशे में बैठे प्यारे तुम को दुआ करेंगे आख़िर तो रोज़े आए दो-चार रोज़ हम भी तरसा बचों में जा कर दारू पिया करेंगे कुछ तो कहेगा हम को ख़ामोश देख कर वो इस बात के लिए अब चुप ही रहा करेंगे आलम मिरे है तुझ पर आई अगर क़यामत तेरी गली के हर-सू महशर हुआ करेंगे दामान-ए-दश्त सूखा अब्रों की बे-तही से जंगल में रोने को अब हम भी चला करेंगे लाई तिरी गली तक आवारगी हमारी ज़िल्लत की अपनी अब हम इज़्ज़त किया करेंगे अहवाल-'मीर' क्यूँँकर आख़िर हो एक शब में इक उम्र हम ये क़िस्सा तुम से कहा करेंगे

Meer Taqi Meer

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