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घर की बुनियादें दीवारें बाम-ओ-दर थे बाबू जी सब को बाँध के रखने वाला ख़ास हुनर थे बाबू जी तीन मोहल्लों में उन जैसी क़द काठी का कोई न था अच्छे-ख़ासे ऊँचे पूरे क़द-आवर थे बाबू जी अब तो उस सूने माथे पर कोरे-पन की चादर है अम्मा जी की सारी सज-धज सब ज़ेवर थे बाबू जी भीतर से ख़ालिस जज़्बाती और ऊपर से ठेठ पिता अलग अनूठा अनबूझा सा इक तेवर थे बाबू जी कभी बड़ा सा हाथ-ख़र्च थे कभी हथेली की सूजन मेरे मन का आधा साहस आधा डर थे बाबू जी

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परखना मत परखने में कोई अपना नहीं रहता किसी भी आइने में देर तक चेहरा नहीं रहता बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना जहाँ दरिया समुंदर से मिला दरिया नहीं रहता हज़ारों शे'र मेरे सो गए काग़ज़ की क़ब्रों में अजब माँ हूँ कोई बच्चा मिरा ज़िंदा नहीं रहता मोहब्बत एक ख़ुशबू है हमेशा साथ चलती है कोई इंसान तन्हाई में भी तन्हा नहीं रहता

Bashir Badr

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तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है तेरे आगे चाँद पुराना लगता है तिरछे तिरछे तीर नज़र के लगते हैं सीधा सीधा दिल पे निशाना लगता है आग का क्या है पल दो पल में लगती है बुझते बुझते एक ज़माना लगता है पाँव ना बाँधा पंछी का पर बाँधा आज का बच्चा कितना सियाना लगता है सच तो ये है फूल का दिल भी छलनी है हँसता चेहरा एक बहाना लगता है सुनने वाले घंटों सुनते रहते हैं मेरा फ़साना सब का फ़साना लगता है 'कैफ़' बता क्या तेरी ग़ज़ल में जादू है बच्चा बच्चा तेरा दिवाना लगता है

Kaif Bhopali

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सहराओं ने माँगा पानी दरियाओं पर बरसा पानी बुनियादें कमज़ोर नहीं थीं दीवारों से आया पानी आख़िर किस किस नीम की जड़ में कब तक डालें मीठा पानी छत का हाल बता देता है परनाले से गिरता पानी फ़िक्र-ओ-मसाइल याद-ए-जानाँ गर्म हवाएँ ठंडा पानी प्यासे बच्चे खेल रहे हैं मछली मछली कितना पानी

Fahmi Badayuni

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उस के नज़दीक ग़म-ए-तर्क-ए-वफ़ा कुछ भी नहीं मुतमइन ऐसा है वो जैसे हुआ कुछ भी नहीं अब तो हाथों से लकीरें भी मिटी जाती हैं उस को खो कर तो मिरे पास रहा कुछ भी नहीं चार दिन रह गए मेले में मगर अब के भी उस ने आने के लिए ख़त में लिखा कुछ भी नहीं कल बिछड़ना है तो फिर अहद-ए-वफ़ा सोच के बाँध अभी आग़ाज़-ए-मोहब्बत है गया कुछ भी नहीं मैं तो इस वास्ते चुप हूँ कि तमाशा न बने तू समझता है मुझे तुझ से गिला कुछ भी नहीं ऐ 'शुमार' आँखें इसी तरह बिछाए रखना जाने किस वक़्त वो आ जाए पता कुछ भी नहीं

Akhtar Shumar

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जला कर दिल उजाला हो गया क्या मेरा ज़र्रा सितारा हो गया क्या नई चीज़ों को घर में रखने वाले मैं कुछ ज़्यादा पुराना हो गया क्या घरों से भागने वाले बताएँ मोहब्बत से गुज़ारा हो गया क्या

Kushal Dauneria

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ठीक हुआ जो बिक गए सैनिक मुट्ठी भर दीनारों में वैसे भी तो ज़ंग लगा था पुश्तैनी हथियारों में सर्द नसों में चलते चलते गर्म लहू जब बर्फ़ हुआ चार पड़ोसी जिस्म उठा कर झोंक आए अंगारों में खेतों को मुट्ठी में भरना अब तक सीख नहीं पाया यूँँ तो मेरा जीवन बीता सामंती अय्यारों में कैसे उस के चाल-चलन में अंग्रेज़ी अंदाज़ न हो आख़िर उस ने साँसें लीं हैं पच्छिम के दरबारों में नज़दीकी अक्सर दूरी का कारन भी बन जाती है सोच-समझ कर घुलना-मिलना अपने रिश्ते-दारों में चाँद अगर पूरा चमके तो उस के दाग़ खटकते हैं एक न एक बुराई तय है सारे इज़्ज़त-दारों में

Aalok Shrivastav

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ये और बात दूर रहे मंज़िलों से हम बच कर चले हमेशा मगर क़ाफ़िलों से हम होने को फिर शिकार नई उलझनों से हम मिलते हैं रोज़ अपने कई दोस्तों से हम बरसों फ़रेब खाते रहे दूसरों से हम अपनी समझ में आए बड़ी मुश्किलों से हम मंज़िल की है तलब तो हमें साथ ले चलो वाक़िफ़ हैं ख़ूब राह की बारीकियों से हम जिन के परों पे सुब्ह की ख़ुशबू के रंग हैं बचपन उधार लाए हैं उन तितलियों से हम कुछ तो हमारे बीच कभी दूरियाँ भी हों तंग आ गए हैं रोज़ की नज़दीकियों से हम गुज़रें हमारे घर की किसी रहगुज़र से वो पर्दे हटाएँ देखें उन्हें खिड़कियों से हम जब भी कहा कि याद हमारी कहाँ उन्हें पकड़े गए हैं ठीक तभी हिचकियों से हम

Aalok Shrivastav

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हमेशा ज़िंदगी की हर कमी को जीते रहते हैं जिसे हम जी नहीं पाए उसी को जीते रहते हैं हमारे दुख की बारिश को कोई दामन नहीं मिलता हमारी आँख के बादल नमी को जीते रहते हैं किसी के साथ हैं रस्में किसी के साथ हैं क़स में किसी के साथ जीना है किसी को जीते रहते हैं हमें मालूम है इक दिन भरोसा टूट जाएगा मगर फिर भी सराबों में नदी को जीते रहते हैं हमारे साथ चलती है तुम्हारे प्यार की ख़ुशबू लगाई थी जो तुम ने उस लगी को जीते रहते हैं चहकते घर महकते खेत और वो गाँव की गलियाँ जिन्हें हम छोड़ आए उन सभी को जीते रहते है ख़ुदा के नाम-लेवा हम भी हैं तुम भी हो और वो भी मगर अफ़सोस सब अपनी ख़ुदी को जीते रहते हैं

Aalok Shrivastav

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अगर सफ़र में मिरे साथ मेरा यार चले तवाफ़ करता हुआ मौसम-ए-बहार चले लगा के वक़्त को ठोकर जो ख़ाकसार चले यक़ीं के क़ाफ़िले हमराह बे-शुमार चले नवाज़ना है तो फिर इस तरह नवाज़ मुझे कि मेरे बअ'द मिरा ज़िक्र बार बार चले ये जिस्म क्या है कोई पैरहन उधार का है यहीं सँभाल के पहना यहीं उतार चले ये जुगनुओं से भरा आसमाँ जहाँ तक है वहाँ तलक तिरी नज़रों का इक़्तिदार चले यही तो एक तमन्ना है इस मुसाफ़िर की जो तुम नहीं तो सफ़र में तुम्हारा प्यार चले

Aalok Shrivastav

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घर की बुनियादें दीवारें बाम-ओ-दर थे बाबू जी सब को बाँध के रखने वाला ख़ास हुनर थे बाबू जी तीन मोहल्लों में उन जैसी क़द काठी का कोई न था अच्छे-ख़ासे ऊँचे पूरे क़द-आवर थे बाबू जी अब तो उस सूने माथे पर कोरे-पन की चादर है अम्मा जी की सारी सज-धज सब ज़ेवर थे बाबू जी भीतर से ख़ालिस जज़्बाती और ऊपर से ठेठ पिता अलग अनूठा अनबूझा सा इक तेवर थे बाबू जी कभी बड़ा सा हाथ-ख़र्च थे कभी हथेली की सूजन मेरे मन का आधा साहस आधा डर थे बाबू जी

Aalok Shrivastav

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