घर की बुनियादें दीवारें बाम-ओ-दर थे बाबू जी सब को बाँध के रखने वाला ख़ास हुनर थे बाबू जी तीन मोहल्लों में उन जैसी क़द काठी का कोई न था अच्छे-ख़ासे ऊँचे पूरे क़द-आवर थे बाबू जी अब तो उस सूने माथे पर कोरे-पन की चादर है अम्मा जी की सारी सज-धज सब ज़ेवर थे बाबू जी भीतर से ख़ालिस जज़्बाती और ऊपर से ठेठ पिता अलग अनूठा अनबूझा सा इक तेवर थे बाबू जी कभी बड़ा सा हाथ-ख़र्च थे कभी हथेली की सूजन मेरे मन का आधा साहस आधा डर थे बाबू जी
Related Ghazal
परखना मत परखने में कोई अपना नहीं रहता किसी भी आइने में देर तक चेहरा नहीं रहता बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना जहाँ दरिया समुंदर से मिला दरिया नहीं रहता हज़ारों शे'र मेरे सो गए काग़ज़ की क़ब्रों में अजब माँ हूँ कोई बच्चा मिरा ज़िंदा नहीं रहता मोहब्बत एक ख़ुशबू है हमेशा साथ चलती है कोई इंसान तन्हाई में भी तन्हा नहीं रहता
Bashir Badr
13 likes
तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है तेरे आगे चाँद पुराना लगता है तिरछे तिरछे तीर नज़र के लगते हैं सीधा सीधा दिल पे निशाना लगता है आग का क्या है पल दो पल में लगती है बुझते बुझते एक ज़माना लगता है पाँव ना बाँधा पंछी का पर बाँधा आज का बच्चा कितना सियाना लगता है सच तो ये है फूल का दिल भी छलनी है हँसता चेहरा एक बहाना लगता है सुनने वाले घंटों सुनते रहते हैं मेरा फ़साना सब का फ़साना लगता है 'कैफ़' बता क्या तेरी ग़ज़ल में जादू है बच्चा बच्चा तेरा दिवाना लगता है
Kaif Bhopali
2 likes
सहराओं ने माँगा पानी दरियाओं पर बरसा पानी बुनियादें कमज़ोर नहीं थीं दीवारों से आया पानी आख़िर किस किस नीम की जड़ में कब तक डालें मीठा पानी छत का हाल बता देता है परनाले से गिरता पानी फ़िक्र-ओ-मसाइल याद-ए-जानाँ गर्म हवाएँ ठंडा पानी प्यासे बच्चे खेल रहे हैं मछली मछली कितना पानी
Fahmi Badayuni
11 likes
उस के नज़दीक ग़म-ए-तर्क-ए-वफ़ा कुछ भी नहीं मुतमइन ऐसा है वो जैसे हुआ कुछ भी नहीं अब तो हाथों से लकीरें भी मिटी जाती हैं उस को खो कर तो मिरे पास रहा कुछ भी नहीं चार दिन रह गए मेले में मगर अब के भी उस ने आने के लिए ख़त में लिखा कुछ भी नहीं कल बिछड़ना है तो फिर अहद-ए-वफ़ा सोच के बाँध अभी आग़ाज़-ए-मोहब्बत है गया कुछ भी नहीं मैं तो इस वास्ते चुप हूँ कि तमाशा न बने तू समझता है मुझे तुझ से गिला कुछ भी नहीं ऐ 'शुमार' आँखें इसी तरह बिछाए रखना जाने किस वक़्त वो आ जाए पता कुछ भी नहीं
Akhtar Shumar
5 likes
जला कर दिल उजाला हो गया क्या मेरा ज़र्रा सितारा हो गया क्या नई चीज़ों को घर में रखने वाले मैं कुछ ज़्यादा पुराना हो गया क्या घरों से भागने वाले बताएँ मोहब्बत से गुज़ारा हो गया क्या
Kushal Dauneria
26 likes
More from Aalok Shrivastav
ठीक हुआ जो बिक गए सैनिक मुट्ठी भर दीनारों में वैसे भी तो ज़ंग लगा था पुश्तैनी हथियारों में सर्द नसों में चलते चलते गर्म लहू जब बर्फ़ हुआ चार पड़ोसी जिस्म उठा कर झोंक आए अंगारों में खेतों को मुट्ठी में भरना अब तक सीख नहीं पाया यूँँ तो मेरा जीवन बीता सामंती अय्यारों में कैसे उस के चाल-चलन में अंग्रेज़ी अंदाज़ न हो आख़िर उस ने साँसें लीं हैं पच्छिम के दरबारों में नज़दीकी अक्सर दूरी का कारन भी बन जाती है सोच-समझ कर घुलना-मिलना अपने रिश्ते-दारों में चाँद अगर पूरा चमके तो उस के दाग़ खटकते हैं एक न एक बुराई तय है सारे इज़्ज़त-दारों में
Aalok Shrivastav
1 likes
ये और बात दूर रहे मंज़िलों से हम बच कर चले हमेशा मगर क़ाफ़िलों से हम होने को फिर शिकार नई उलझनों से हम मिलते हैं रोज़ अपने कई दोस्तों से हम बरसों फ़रेब खाते रहे दूसरों से हम अपनी समझ में आए बड़ी मुश्किलों से हम मंज़िल की है तलब तो हमें साथ ले चलो वाक़िफ़ हैं ख़ूब राह की बारीकियों से हम जिन के परों पे सुब्ह की ख़ुशबू के रंग हैं बचपन उधार लाए हैं उन तितलियों से हम कुछ तो हमारे बीच कभी दूरियाँ भी हों तंग आ गए हैं रोज़ की नज़दीकियों से हम गुज़रें हमारे घर की किसी रहगुज़र से वो पर्दे हटाएँ देखें उन्हें खिड़कियों से हम जब भी कहा कि याद हमारी कहाँ उन्हें पकड़े गए हैं ठीक तभी हिचकियों से हम
Aalok Shrivastav
5 likes
हमेशा ज़िंदगी की हर कमी को जीते रहते हैं जिसे हम जी नहीं पाए उसी को जीते रहते हैं हमारे दुख की बारिश को कोई दामन नहीं मिलता हमारी आँख के बादल नमी को जीते रहते हैं किसी के साथ हैं रस्में किसी के साथ हैं क़स में किसी के साथ जीना है किसी को जीते रहते हैं हमें मालूम है इक दिन भरोसा टूट जाएगा मगर फिर भी सराबों में नदी को जीते रहते हैं हमारे साथ चलती है तुम्हारे प्यार की ख़ुशबू लगाई थी जो तुम ने उस लगी को जीते रहते हैं चहकते घर महकते खेत और वो गाँव की गलियाँ जिन्हें हम छोड़ आए उन सभी को जीते रहते है ख़ुदा के नाम-लेवा हम भी हैं तुम भी हो और वो भी मगर अफ़सोस सब अपनी ख़ुदी को जीते रहते हैं
Aalok Shrivastav
0 likes
अगर सफ़र में मिरे साथ मेरा यार चले तवाफ़ करता हुआ मौसम-ए-बहार चले लगा के वक़्त को ठोकर जो ख़ाकसार चले यक़ीं के क़ाफ़िले हमराह बे-शुमार चले नवाज़ना है तो फिर इस तरह नवाज़ मुझे कि मेरे बअ'द मिरा ज़िक्र बार बार चले ये जिस्म क्या है कोई पैरहन उधार का है यहीं सँभाल के पहना यहीं उतार चले ये जुगनुओं से भरा आसमाँ जहाँ तक है वहाँ तलक तिरी नज़रों का इक़्तिदार चले यही तो एक तमन्ना है इस मुसाफ़िर की जो तुम नहीं तो सफ़र में तुम्हारा प्यार चले
Aalok Shrivastav
8 likes
घर की बुनियादें दीवारें बाम-ओ-दर थे बाबू जी सब को बाँध के रखने वाला ख़ास हुनर थे बाबू जी तीन मोहल्लों में उन जैसी क़द काठी का कोई न था अच्छे-ख़ासे ऊँचे पूरे क़द-आवर थे बाबू जी अब तो उस सूने माथे पर कोरे-पन की चादर है अम्मा जी की सारी सज-धज सब ज़ेवर थे बाबू जी भीतर से ख़ालिस जज़्बाती और ऊपर से ठेठ पिता अलग अनूठा अनबूझा सा इक तेवर थे बाबू जी कभी बड़ा सा हाथ-ख़र्च थे कभी हथेली की सूजन मेरे मन का आधा साहस आधा डर थे बाबू जी
Aalok Shrivastav
2 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Aalok Shrivastav.
Similar Moods
More moods that pair well with Aalok Shrivastav's ghazal.







