ghazalKuch Alfaaz

हाँ वही सब कुछ पुराना चल रहा था बैठे थे सुनना सुनाना चल रहा था चल रही थी अपनी बज़्म-ए-शायरी भी साथ में सिगरट जलाना चल रहा था गर मैं साक़ी बहका हूँ, नाराज़ क्यूँ है अपना तो पीना पिलाना चल रहा था यार इतने तो दिवाने हम नहीं थे जो हमारा दिल दुखाना चल रहा था दर्द ले कर बैठे थे महफ़िल में हम सब और ग़म का कारख़ाना चल रहा था कुछ नहीं बदला था दुनिया में कभी बस आदमी का आना जाना चल रहा था कर रहा था मैं घड़ी तरतीब में तब वक़्त का भी अपना गाना चल रहा था जाम उस के तर्ज़ पर ही था बनाया देखो फिर भी उस का ना ना चल रहा था कोई मेरी आँख की पुतली से पूछे ख़्वाब में कैसा ज़माना चल रहा था लौट आए सब उसे बस देख कर के आग पर जो इक दिवाना चल रहा था लोग पानी जब बहाने में लगे थे मेरा साहिल को मिलाना चल रहा था मैं था तुम थे वक़्त रातें चाँदनी थी इश्क़ भी कितना सुहाना चल रहा था गुम थे अपने दर्दो-ग़म में इस लिए सब क्योंकि सय्यद का फ़साना चल रहा था

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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

Waseem Barelvi

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मुझे उदास कर गए हो ख़ुश रहो मिरे मिज़ाज पर गए हो ख़ुश रहो मिरे लिए न रुक सके तो क्या हुआ जहाँ कहीं ठहर गए हो ख़ुश रहो ख़ुशी हुई है आज तुम को देख कर बहुत निखर सँवर गए हो ख़ुश रहो उदास हो किसी की बे-वफ़ाई पर वफ़ा कहीं तो कर गए हो ख़ुश रहो गली में और लोग भी थे आश्ना हमें सलाम कर गए हो ख़ुश रहो तुम्हें तो मेरी दोस्ती पे नाज़ था इसी से अब मुकर गए हो ख़ुश रहो किसी की ज़िन्दगी बनो कि बंदगी मिरे लिए तो मर गए हो ख़ुश रहो

Fazil Jamili

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वो एक पक्षी जो गुंजन कर रहा है वो मुझ में प्रेम सृजन कर रहा है बहुत दिन हो गए है तुम सेे बिछड़े तुम्हें मिलने को अब मन कर रहा है नदी के शांत तट पर बैठ कर मन तेरी यादें विसर्जन कर रहा है

Azhar Iqbal

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सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं सुना है रब्त है उस को ख़राब-हालों से सो अपने आप को बर्बाद कर के देखते हैं सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उस की सो हम भी उस की गली से गुज़र के देखते हैं सुना है उस को भी है शे'र ओ शा'इरी से शग़फ़ सो हम भी मो'जिज़े अपने हुनर के देखते हैं सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं सुना है हश्र हैं उस की ग़ज़ाल सी आँखें सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उस की सुना है शाम को साए गुज़र के देखते हैं सुना है उस की सियह-चश्मगी क़यामत है सो उस को सुरमा-फ़रोश आह भर के देखते हैं सुना है उस के लबों से गुलाब जलते हैं सो हम बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं सुना है आइना तिमसाल है जबीं उस की जो सादा दिल हैं उसे बन-सँवर के देखते हैं सुना है जब से हमाइल हैं उस की गर्दन में मिज़ाज और ही लाल ओ गुहर के देखते हैं सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में पलंग ज़ाविए उस की कमर के देखते हैं सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं वो सर्व-क़द है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं कि उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं बस इक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का सो रह-रवान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं सुना है उस के शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त मकीं उधर के भी जल्वे इधर के देखते हैं रुके तो गर्दिशें उस का तवाफ़ करती हैं चले तो उस को ज़माने ठहर के देखते हैं किसे नसीब कि बे-पैरहन उसे देखे कभी कभी दर ओ दीवार घर के देखते हैं कहानियाँ ही सही सब मुबालग़े ही सही अगर वो ख़्वाब है ता'बीर कर के देखते हैं अब उस के शहर में ठहरें कि कूच कर जाएँ 'फ़राज़' आओ सितारे सफ़र के देखते हैं

Ahmad Faraz

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सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो कहीं नहीं कोई सूरज धुआँ धुआँ है फ़ज़ा ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो

Nida Fazli

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तेरी गली से निकले तो कुछ रास्ते हुए तुझ सेे नज़र हटी तो बड़े फ़ैसले हुए उल्फ़त में मेरे साथ अजब हादसे हुए क़ुर्बत में हिज्र जैसे कई तजरबे हुए जो था नहीं कभी वो तअल्लुक़ निभाने में इतने क़रीब आए कि बस फ़ासले हुए अलमारी तक भरी हुई है तेरी याद से हैं बस तेरी पसंद के कपड़े रखे हुए हँसते थे साथ देख के दोनों जिसे कभी मैं रो पड़ा हूँ फ़िल्म वही देखते हुए तस्वीर तेरी आज भी पूरी नहीं बनी फिर कॉल आ गए हैं वही मस'अले हुए तेरे लबों का ज़ाइक़ा आँखों में आ गया देखा तुझे जो ख़्वाब में कल चूमते हुए यूँँ हाल तेरे आने से बदला है बाग़ का मिट्टी खिली हुई है तो पत्थर हरे हुए कानों में गूँजते हैं फ़ऊलुन मुफ़ाइलुन शायद किसी ग़ज़ल के हैं क़ैदी बने हुए क्या देखने तुम आ गए सय्यद नदी तले क्यूँ ज़िंदगी उभारते हो डूबते हुए

Aves Sayyad

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क्या बताए अब तुम्हें क्या चल रहा है दिल में बस यादों का मेला चल रहा है कोई अनबन ही नहीं हम दोनो में अब चाहता है जो वो वैसा चल रहा है बेझिझक सोए हुए है हम यहाँ पर और ख़्वाबों का ये धंधा चल रहा है रात, तन्हाई, उदासी, तेरी यादें उस पे ये नुसरत का गाना चल रहा है पर कटे हैं, हौसला बाक़ी है अब भी पेड़ से गिर कर परिंदा चल रहा है वक़्त मेरा हिज्र का है यार लेकिन एक दिन तुझ पर बकाया चल रहा है ज़िंदा रहना और करना शा'इरी भी काम ये शाना-ब-शाना चल रहा है फूल है कोई न कोई इत्र तो फिर क्या है जो इतना महकता चल रहा है लोग अक्सर घर पे आ कर कहते है अब आप का साहब ये बेटा चल रहा है मैं तो सय्यद कब का थक कर रुक गया हूँ धूप में पर मेरा साया चल रहा है

Aves Sayyad

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