ghazalKuch Alfaaz

तेरी गली से निकले तो कुछ रास्ते हुए तुझ सेे नज़र हटी तो बड़े फ़ैसले हुए उल्फ़त में मेरे साथ अजब हादसे हुए क़ुर्बत में हिज्र जैसे कई तजरबे हुए जो था नहीं कभी वो तअल्लुक़ निभाने में इतने क़रीब आए कि बस फ़ासले हुए अलमारी तक भरी हुई है तेरी याद से हैं बस तेरी पसंद के कपड़े रखे हुए हँसते थे साथ देख के दोनों जिसे कभी मैं रो पड़ा हूँ फ़िल्म वही देखते हुए तस्वीर तेरी आज भी पूरी नहीं बनी फिर कॉल आ गए हैं वही मस'अले हुए तेरे लबों का ज़ाइक़ा आँखों में आ गया देखा तुझे जो ख़्वाब में कल चूमते हुए यूँँ हाल तेरे आने से बदला है बाग़ का मिट्टी खिली हुई है तो पत्थर हरे हुए कानों में गूँजते हैं फ़ऊलुन मुफ़ाइलुन शायद किसी ग़ज़ल के हैं क़ैदी बने हुए क्या देखने तुम आ गए सय्यद नदी तले क्यूँ ज़िंदगी उभारते हो डूबते हुए

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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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मुझ को दरवाज़े पर ही रोक लिया जाता है मेरे आने से भला आप का क्या जाता है तुम अगर जाने लगे हो तो पलट कर मत देखो मौत लिखकर तो क़लम तोड़ दिया जाता है तुझ को बतलाता मगर शर्म बहुत आती है तेरी तस्वीर से जो काम लिया जाता है

Tehzeeb Hafi

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

Waseem Barelvi

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हाँ वही सब कुछ पुराना चल रहा था बैठे थे सुनना सुनाना चल रहा था चल रही थी अपनी बज़्म-ए-शायरी भी साथ में सिगरट जलाना चल रहा था गर मैं साक़ी बहका हूँ, नाराज़ क्यूँ है अपना तो पीना पिलाना चल रहा था यार इतने तो दिवाने हम नहीं थे जो हमारा दिल दुखाना चल रहा था दर्द ले कर बैठे थे महफ़िल में हम सब और ग़म का कारख़ाना चल रहा था कुछ नहीं बदला था दुनिया में कभी बस आदमी का आना जाना चल रहा था कर रहा था मैं घड़ी तरतीब में तब वक़्त का भी अपना गाना चल रहा था जाम उस के तर्ज़ पर ही था बनाया देखो फिर भी उस का ना ना चल रहा था कोई मेरी आँख की पुतली से पूछे ख़्वाब में कैसा ज़माना चल रहा था लौट आए सब उसे बस देख कर के आग पर जो इक दिवाना चल रहा था लोग पानी जब बहाने में लगे थे मेरा साहिल को मिलाना चल रहा था मैं था तुम थे वक़्त रातें चाँदनी थी इश्क़ भी कितना सुहाना चल रहा था गुम थे अपने दर्दो-ग़म में इस लिए सब क्योंकि सय्यद का फ़साना चल रहा था

Aves Sayyad

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क्या बताए अब तुम्हें क्या चल रहा है दिल में बस यादों का मेला चल रहा है कोई अनबन ही नहीं हम दोनो में अब चाहता है जो वो वैसा चल रहा है बेझिझक सोए हुए है हम यहाँ पर और ख़्वाबों का ये धंधा चल रहा है रात, तन्हाई, उदासी, तेरी यादें उस पे ये नुसरत का गाना चल रहा है पर कटे हैं, हौसला बाक़ी है अब भी पेड़ से गिर कर परिंदा चल रहा है वक़्त मेरा हिज्र का है यार लेकिन एक दिन तुझ पर बकाया चल रहा है ज़िंदा रहना और करना शा'इरी भी काम ये शाना-ब-शाना चल रहा है फूल है कोई न कोई इत्र तो फिर क्या है जो इतना महकता चल रहा है लोग अक्सर घर पे आ कर कहते है अब आप का साहब ये बेटा चल रहा है मैं तो सय्यद कब का थक कर रुक गया हूँ धूप में पर मेरा साया चल रहा है

Aves Sayyad

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