तेरी गली से निकले तो कुछ रास्ते हुए तुझ सेे नज़र हटी तो बड़े फ़ैसले हुए उल्फ़त में मेरे साथ अजब हादसे हुए क़ुर्बत में हिज्र जैसे कई तजरबे हुए जो था नहीं कभी वो तअल्लुक़ निभाने में इतने क़रीब आए कि बस फ़ासले हुए अलमारी तक भरी हुई है तेरी याद से हैं बस तेरी पसंद के कपड़े रखे हुए हँसते थे साथ देख के दोनों जिसे कभी मैं रो पड़ा हूँ फ़िल्म वही देखते हुए तस्वीर तेरी आज भी पूरी नहीं बनी फिर कॉल आ गए हैं वही मस'अले हुए तेरे लबों का ज़ाइक़ा आँखों में आ गया देखा तुझे जो ख़्वाब में कल चूमते हुए यूँँ हाल तेरे आने से बदला है बाग़ का मिट्टी खिली हुई है तो पत्थर हरे हुए कानों में गूँजते हैं फ़ऊलुन मुफ़ाइलुन शायद किसी ग़ज़ल के हैं क़ैदी बने हुए क्या देखने तुम आ गए सय्यद नदी तले क्यूँ ज़िंदगी उभारते हो डूबते हुए
Related Ghazal
चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का
Waseem Barelvi
103 likes
कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
Tehzeeb Hafi
435 likes
मुझ को दरवाज़े पर ही रोक लिया जाता है मेरे आने से भला आप का क्या जाता है तुम अगर जाने लगे हो तो पलट कर मत देखो मौत लिखकर तो क़लम तोड़ दिया जाता है तुझ को बतलाता मगर शर्म बहुत आती है तेरी तस्वीर से जो काम लिया जाता है
Tehzeeb Hafi
90 likes
अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
Ahmad Faraz
130 likes
उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है
Waseem Barelvi
107 likes
More from Aves Sayyad
हाँ वही सब कुछ पुराना चल रहा था बैठे थे सुनना सुनाना चल रहा था चल रही थी अपनी बज़्म-ए-शायरी भी साथ में सिगरट जलाना चल रहा था गर मैं साक़ी बहका हूँ, नाराज़ क्यूँ है अपना तो पीना पिलाना चल रहा था यार इतने तो दिवाने हम नहीं थे जो हमारा दिल दुखाना चल रहा था दर्द ले कर बैठे थे महफ़िल में हम सब और ग़म का कारख़ाना चल रहा था कुछ नहीं बदला था दुनिया में कभी बस आदमी का आना जाना चल रहा था कर रहा था मैं घड़ी तरतीब में तब वक़्त का भी अपना गाना चल रहा था जाम उस के तर्ज़ पर ही था बनाया देखो फिर भी उस का ना ना चल रहा था कोई मेरी आँख की पुतली से पूछे ख़्वाब में कैसा ज़माना चल रहा था लौट आए सब उसे बस देख कर के आग पर जो इक दिवाना चल रहा था लोग पानी जब बहाने में लगे थे मेरा साहिल को मिलाना चल रहा था मैं था तुम थे वक़्त रातें चाँदनी थी इश्क़ भी कितना सुहाना चल रहा था गुम थे अपने दर्दो-ग़म में इस लिए सब क्योंकि सय्यद का फ़साना चल रहा था
Aves Sayyad
2 likes
क्या बताए अब तुम्हें क्या चल रहा है दिल में बस यादों का मेला चल रहा है कोई अनबन ही नहीं हम दोनो में अब चाहता है जो वो वैसा चल रहा है बेझिझक सोए हुए है हम यहाँ पर और ख़्वाबों का ये धंधा चल रहा है रात, तन्हाई, उदासी, तेरी यादें उस पे ये नुसरत का गाना चल रहा है पर कटे हैं, हौसला बाक़ी है अब भी पेड़ से गिर कर परिंदा चल रहा है वक़्त मेरा हिज्र का है यार लेकिन एक दिन तुझ पर बकाया चल रहा है ज़िंदा रहना और करना शा'इरी भी काम ये शाना-ब-शाना चल रहा है फूल है कोई न कोई इत्र तो फिर क्या है जो इतना महकता चल रहा है लोग अक्सर घर पे आ कर कहते है अब आप का साहब ये बेटा चल रहा है मैं तो सय्यद कब का थक कर रुक गया हूँ धूप में पर मेरा साया चल रहा है
Aves Sayyad
1 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Aves Sayyad.
Similar Moods
More moods that pair well with Aves Sayyad's ghazal.







