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क्या बताए अब तुम्हें क्या चल रहा है दिल में बस यादों का मेला चल रहा है कोई अनबन ही नहीं हम दोनो में अब चाहता है जो वो वैसा चल रहा है बेझिझक सोए हुए है हम यहाँ पर और ख़्वाबों का ये धंधा चल रहा है रात, तन्हाई, उदासी, तेरी यादें उस पे ये नुसरत का गाना चल रहा है पर कटे हैं, हौसला बाक़ी है अब भी पेड़ से गिर कर परिंदा चल रहा है वक़्त मेरा हिज्र का है यार लेकिन एक दिन तुझ पर बकाया चल रहा है ज़िंदा रहना और करना शा'इरी भी काम ये शाना-ब-शाना चल रहा है फूल है कोई न कोई इत्र तो फिर क्या है जो इतना महकता चल रहा है लोग अक्सर घर पे आ कर कहते है अब आप का साहब ये बेटा चल रहा है मैं तो सय्यद कब का थक कर रुक गया हूँ धूप में पर मेरा साया चल रहा है

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए

Khumar Barabankvi

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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हाँ वही सब कुछ पुराना चल रहा था बैठे थे सुनना सुनाना चल रहा था चल रही थी अपनी बज़्म-ए-शायरी भी साथ में सिगरट जलाना चल रहा था गर मैं साक़ी बहका हूँ, नाराज़ क्यूँ है अपना तो पीना पिलाना चल रहा था यार इतने तो दिवाने हम नहीं थे जो हमारा दिल दुखाना चल रहा था दर्द ले कर बैठे थे महफ़िल में हम सब और ग़म का कारख़ाना चल रहा था कुछ नहीं बदला था दुनिया में कभी बस आदमी का आना जाना चल रहा था कर रहा था मैं घड़ी तरतीब में तब वक़्त का भी अपना गाना चल रहा था जाम उस के तर्ज़ पर ही था बनाया देखो फिर भी उस का ना ना चल रहा था कोई मेरी आँख की पुतली से पूछे ख़्वाब में कैसा ज़माना चल रहा था लौट आए सब उसे बस देख कर के आग पर जो इक दिवाना चल रहा था लोग पानी जब बहाने में लगे थे मेरा साहिल को मिलाना चल रहा था मैं था तुम थे वक़्त रातें चाँदनी थी इश्क़ भी कितना सुहाना चल रहा था गुम थे अपने दर्दो-ग़म में इस लिए सब क्योंकि सय्यद का फ़साना चल रहा था

Aves Sayyad

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तेरी गली से निकले तो कुछ रास्ते हुए तुझ सेे नज़र हटी तो बड़े फ़ैसले हुए उल्फ़त में मेरे साथ अजब हादसे हुए क़ुर्बत में हिज्र जैसे कई तजरबे हुए जो था नहीं कभी वो तअल्लुक़ निभाने में इतने क़रीब आए कि बस फ़ासले हुए अलमारी तक भरी हुई है तेरी याद से हैं बस तेरी पसंद के कपड़े रखे हुए हँसते थे साथ देख के दोनों जिसे कभी मैं रो पड़ा हूँ फ़िल्म वही देखते हुए तस्वीर तेरी आज भी पूरी नहीं बनी फिर कॉल आ गए हैं वही मस'अले हुए तेरे लबों का ज़ाइक़ा आँखों में आ गया देखा तुझे जो ख़्वाब में कल चूमते हुए यूँँ हाल तेरे आने से बदला है बाग़ का मिट्टी खिली हुई है तो पत्थर हरे हुए कानों में गूँजते हैं फ़ऊलुन मुफ़ाइलुन शायद किसी ग़ज़ल के हैं क़ैदी बने हुए क्या देखने तुम आ गए सय्यद नदी तले क्यूँ ज़िंदगी उभारते हो डूबते हुए

Aves Sayyad

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