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hamare baa'd ab mahfil men afsane bayan honge baharen ham ko dhundhengi na jaane ham kahan honge isi andaz se jhumega mausam gaegi duniya mohabbat phir hasin hogi nazare phir javan honge na ham honge na tum hoge na dil hoga magar phir bhi hazaron manzilen hongi hazaron karvan honge hamare ba'd ab mahfil mein afsane bayan honge bahaaren hum ko dhundhengi na jaane hum kahan honge isi andaz se jhumega mausam gaegi duniya mohabbat phir hasin hogi nazare phir jawan honge na hum honge na tum hoge na dil hoga magar phir bhi hazaron manzilen hongi hazaron karwan honge

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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जब हुआ इरफ़ाँ तो ग़म आराम-ए-जाँ बनता गया सोज़-ए-जानाँ दिल में सोज़-ए-दीगराँ बनता गया रफ़्ता रफ़्ता मुंक़लिब होती गई रस्म-ए-चमन धीरे धीरे नग़्मा-ए-दिल भी फ़ुग़ाँ बनता गया मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया मैं तो जब जानूँ कि भर दे साग़र-ए-हर-ख़ास-ओ-आम यूँँ तो जो आया वही पीर-ए-मुग़ाँ बनता गया जिस तरफ़ भी चल पड़े हम आबला-पायान-ए-शौक़ ख़ार से गुल और गुल से गुलसिताँ बनता गया शरह-ए-ग़म तो मुख़्तसर होती गई उस के हुज़ूर लफ़्ज़ जो मुँह से न निकला दास्ताँ बनता गया दहर में 'मजरूह' कोई जावेदाँ मज़मूँ कहाँ मैं जिसे छूता गया वो जावेदाँ बनता गया

Majrooh Sultanpuri

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आह-ए-जाँ-सोज़ की महरूमी-ए-तासीर न देख हो ही जाएगी कोई जीने की तदबीर न देख हादसे और भी गुज़रे तिरी उल्फ़त के सिवा हाँ मुझे देख मुझे अब मेरी तस्वीर न देख ये ज़रा दूर पे मंज़िल ये उजाला ये सुकूँ ख़्वाब को देख अभी ख़्वाब की ता'बीर न देख देख ज़िंदाँ से परे रंग-ए-चमन जोश-ए-बहार रक़्स करना है तो फिर पाँव की ज़ंजीर न देख कुछ भी हूँ फिर भी दुखे दिल की सदा हूँ नादाँ मेरी बातों को समझ तल्ख़ी-ए-तक़रीर न देख वही 'मजरूह' वही शाइर-ए-आवारा-मिज़ाज कोई उट्ठा है तिरी बज़्म से दिल-गीर न देख

Majrooh Sultanpuri

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यूँँ तो आपस में बिगड़ते हैं ख़फ़ा होते हैं मिलने वाले कहीं उल्फ़त में जुदा होते हैं हैं ज़माने में अजब चीज़ मोहब्बत वाले दर्द ख़ुद बनते हैं ख़ुद अपनी दवा होते हैं हाल-ए-दिल मुझ से न पूछो मिरी नज़रें देखो राज़ दिल के तो निगाहों से अदा होते हैं मिलने को यूँँ तो मिला करती हैं सब से आँखें दिल के आ जाने के अंदाज़ जुदा होते हैं ऐसे हंस हंस के न देखा करो सब की जानिब लोग ऐसी ही अदाओं पे फ़िदा होते हैं

Majrooh Sultanpuri

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हम हैं मता-ए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह उठती है हर निगाह ख़रीदार की तरह इस कू-ए-तिश्नगी में बहुत है कि एक जाम हाथ आ गया है दौलत-ए-बेदार की तरह वो तो कहीं है और मगर दिल के आस-पास फिरती है कोई शय निगह-ए-यार की तरह सीधी है राह-ए-शौक़ पे यूँँही कहीं कहीं ख़म हो गई है गेसू-ए-दिलदार की तरह बे-तेशा-ए-नज़र न चलो राह-ए-रफ़्तगाँ हर नक़्श-ए-पा बुलंद है दीवार की तरह अब जा के कुछ खुला हुनर-ए-नाख़ून-ए-जुनूँ ज़ख़्म-ए-जिगर हुए लब-ओ-रुख़्सार की तरह 'मजरूह' लिख रहे हैं वो अहल-ए-वफ़ा का नाम हम भी खड़े हुए हैं गुनहगार की तरह

Majrooh Sultanpuri

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मुझे सहल हो गईं मंज़िलें वो हवा के रुख़ भी बदल गए  तिरा हाथ हाथ में आ गया कि चराग़ राह में जल गए  वो लजाए मेरे सवाल पर कि उठा सके न झुका के सर  उड़ी ज़ुल्फ़ चेहरे पे इस तरह कि शबों के राज़ मचल गए  वही बात जो वो न कह सके मिरे शेर-ओ-नग़्मा में आ गई  वही लब न मैं जिन्हें छू सका क़दह-ए-शराब में ढल गए  वही आस्ताँ है वही जबीं वही अश्क है वही आस्तीं  दिल-ए-ज़ार तू भी बदल कहीं कि जहाँ के तौर बदल गए  तुझे चश्म-ए-मस्त पता भी है कि शबाब गर्मी-ए-बज़्म है  तुझे चश्म-ए-मस्त ख़बर भी है कि सब आबगीने पिघल गए  मिरे काम आ गईं आख़िरश यही काविशें यही गर्दिशें  बढ़ीं इस क़दर मिरी मंज़िलें कि क़दम के ख़ार निकल गए  वही आस्ताँ है वही जबीं वही अश्क है वही आस्तीं  दिल-ए-ज़ार तू भी बदल कहीं कि जहाँ के तौर बदल गए  तुझे चश्म-ए-मस्त पता भी है कि शबाब गर्मी-ए-बज़्म है  तुझे चश्म-ए-मस्त ख़बर भी है कि सब आबगीने पिघल गए  मिरे काम आ गईं आख़िरश यही काविशें यही गर्दिशें  बढ़ीं इस क़दर मिरी मंज़िलें कि क़दम के ख़ार निकल गए

Majrooh Sultanpuri

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