जब हुआ इरफ़ाँ तो ग़म आराम-ए-जाँ बनता गया सोज़-ए-जानाँ दिल में सोज़-ए-दीगराँ बनता गया रफ़्ता रफ़्ता मुंक़लिब होती गई रस्म-ए-चमन धीरे धीरे नग़्मा-ए-दिल भी फ़ुग़ाँ बनता गया मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया मैं तो जब जानूँ कि भर दे साग़र-ए-हर-ख़ास-ओ-आम यूँँ तो जो आया वही पीर-ए-मुग़ाँ बनता गया जिस तरफ़ भी चल पड़े हम आबला-पायान-ए-शौक़ ख़ार से गुल और गुल से गुलसिताँ बनता गया शरह-ए-ग़म तो मुख़्तसर होती गई उस के हुज़ूर लफ़्ज़ जो मुँह से न निकला दास्ताँ बनता गया दहर में 'मजरूह' कोई जावेदाँ मज़मूँ कहाँ मैं जिसे छूता गया वो जावेदाँ बनता गया
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आँख को आइना समझते हो तुम भी सबकी तरह समझते हो दोस्त अब क्यूँ नहीं समझते तुम तुम तो कहते थे ना समझते हो अपना ग़म तुम को कैसे समझाऊँ सब सेे हारा हुआ समझते हो मेरी दुनिया उजड़ गई इस में तुम इसे हादसा समझते हो आख़िरी रास्ता तो बाक़ी है आख़िरी रास्ता समझते हो
Himanshi babra KATIB
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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मैं ने जो कुछ भी सोचा हुआ है, मैं वो वक़्त आने पे कर जाऊँगा तुम मुझे ज़हर लगते हो और मैं किसी दिन तुम्हें पी के मर जाऊँगा तू तो बीनाई है मेरी तेरे अलावा मुझे कुछ भी दिखता नहीं मैं ने तुझ को अगर तेरे घर पे उतारा तो मैं कैसे घर जाऊँगा चाहता हूँ तुम्हें और बहुत चाहता हूँ, तुम्हें ख़ुद भी मालूम है हाँ अगर मुझ सेे पूछा किसी ने तो मैं सीधा मुँह पर मुकर जाऊँगा तेरे दिल से तेरे शहर से तेरे घर से तेरी आँख से तेरे दर से तेरी गलियों से तेरे वतन से निकाला हुआ हूँ किधर जाऊँगा
Tehzeeb Hafi
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यूँँ तो आपस में बिगड़ते हैं ख़फ़ा होते हैं मिलने वाले कहीं उल्फ़त में जुदा होते हैं हैं ज़माने में अजब चीज़ मोहब्बत वाले दर्द ख़ुद बनते हैं ख़ुद अपनी दवा होते हैं हाल-ए-दिल मुझ से न पूछो मिरी नज़रें देखो राज़ दिल के तो निगाहों से अदा होते हैं मिलने को यूँँ तो मिला करती हैं सब से आँखें दिल के आ जाने के अंदाज़ जुदा होते हैं ऐसे हंस हंस के न देखा करो सब की जानिब लोग ऐसी ही अदाओं पे फ़िदा होते हैं
Majrooh Sultanpuri
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आह-ए-जाँ-सोज़ की महरूमी-ए-तासीर न देख हो ही जाएगी कोई जीने की तदबीर न देख हादसे और भी गुज़रे तिरी उल्फ़त के सिवा हाँ मुझे देख मुझे अब मेरी तस्वीर न देख ये ज़रा दूर पे मंज़िल ये उजाला ये सुकूँ ख़्वाब को देख अभी ख़्वाब की ता'बीर न देख देख ज़िंदाँ से परे रंग-ए-चमन जोश-ए-बहार रक़्स करना है तो फिर पाँव की ज़ंजीर न देख कुछ भी हूँ फिर भी दुखे दिल की सदा हूँ नादाँ मेरी बातों को समझ तल्ख़ी-ए-तक़रीर न देख वही 'मजरूह' वही शाइर-ए-आवारा-मिज़ाज कोई उट्ठा है तिरी बज़्म से दिल-गीर न देख
Majrooh Sultanpuri
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मुझे सहल हो गईं मंज़िलें वो हवा के रुख़ भी बदल गए तिरा हाथ हाथ में आ गया कि चराग़ राह में जल गए वो लजाए मेरे सवाल पर कि उठा सके न झुका के सर उड़ी ज़ुल्फ़ चेहरे पे इस तरह कि शबों के राज़ मचल गए वही बात जो वो न कह सके मिरे शेर-ओ-नग़्मा में आ गई वही लब न मैं जिन्हें छू सका क़दह-ए-शराब में ढल गए वही आस्ताँ है वही जबीं वही अश्क है वही आस्तीं दिल-ए-ज़ार तू भी बदल कहीं कि जहाँ के तौर बदल गए तुझे चश्म-ए-मस्त पता भी है कि शबाब गर्मी-ए-बज़्म है तुझे चश्म-ए-मस्त ख़बर भी है कि सब आबगीने पिघल गए मिरे काम आ गईं आख़िरश यही काविशें यही गर्दिशें बढ़ीं इस क़दर मिरी मंज़िलें कि क़दम के ख़ार निकल गए वही आस्ताँ है वही जबीं वही अश्क है वही आस्तीं दिल-ए-ज़ार तू भी बदल कहीं कि जहाँ के तौर बदल गए तुझे चश्म-ए-मस्त पता भी है कि शबाब गर्मी-ए-बज़्म है तुझे चश्म-ए-मस्त ख़बर भी है कि सब आबगीने पिघल गए मिरे काम आ गईं आख़िरश यही काविशें यही गर्दिशें बढ़ीं इस क़दर मिरी मंज़िलें कि क़दम के ख़ार निकल गए
Majrooh Sultanpuri
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जला के मिश'अल-ए-जाँ हम जुनूँ-सिफ़ात चले जो घर को आग लगाए हमारे साथ चले दयार-ए-शाम नहीं मंज़िल-ए-सहर भी नहीं अजब नगर है यहाँ दिन चले न रात चले हमारे लब न सही वो दहान-ए-ज़ख़्म सही वहीं पहुँचती है यारो कहीं से बात चले सुतून-ए-दार पे रखते चलो सरों के चराग़ जहाँ तलक ये सितम की सियाह रात चले हुआ असीर कोई हम-नवा तो दूर तलक ब-पास-ए-तर्ज़-ए-नवा हम भी साथ साथ चले बचा के लाए हम ऐ यार फिर भी नक़्द-ए-वफ़ा अगरचे लुटते रहे रहज़नों के हाथ चले फिर आई फ़स्ल कि मानिंद बर्ग-ए-आवारा हमारे नाम गुलों के मुरासलात चले क़तार-ए-शीशा है या कारवान-ए-हम-सफ़राँ ख़िराम-ए-जाम है या जैसे काएनात चले भुला ही बैठे जब अहल-ए-हरम तो ऐ 'मजरूह' बग़ल में हम भी लिए इक सनम का हाथ चले
Majrooh Sultanpuri
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कोई हम-दम न रहा कोई सहारा न रहा हम किसी के न रहे कोई हमारा न रहा शाम तन्हाई की है आएगी मंज़िल कैसे जो मुझे राह दिखा दे वही तारा न रहा ऐ नज़ारो न हँसो मिल न सकूँगा तुम से तुम मिरे हो न सके मैं भी तुम्हारा न रहा क्या बताऊँ मैं कहाँ यूँँही चला जाता हूँ जो मुझे फिर से बुला ले वो इशारा न रहा
Majrooh Sultanpuri
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