ghazalKuch Alfaaz

जला के मिश'अल-ए-जाँ हम जुनूँ-सिफ़ात चले जो घर को आग लगाए हमारे साथ चले दयार-ए-शाम नहीं मंज़िल-ए-सहर भी नहीं अजब नगर है यहाँ दिन चले न रात चले हमारे लब न सही वो दहान-ए-ज़ख़्म सही वहीं पहुँचती है यारो कहीं से बात चले सुतून-ए-दार पे रखते चलो सरों के चराग़ जहाँ तलक ये सितम की सियाह रात चले हुआ असीर कोई हम-नवा तो दूर तलक ब-पास-ए-तर्ज़-ए-नवा हम भी साथ साथ चले बचा के लाए हम ऐ यार फिर भी नक़्द-ए-वफ़ा अगरचे लुटते रहे रहज़नों के हाथ चले फिर आई फ़स्ल कि मानिंद बर्ग-ए-आवारा हमारे नाम गुलों के मुरासलात चले क़तार-ए-शीशा है या कारवान-ए-हम-सफ़राँ ख़िराम-ए-जाम है या जैसे काएनात चले भुला ही बैठे जब अहल-ए-हरम तो ऐ 'मजरूह' बग़ल में हम भी लिए इक सनम का हाथ चले

Related Ghazal

समुंदर उल्टा सीधा बोलता है सलीक़े से तो प्यासा बोलता है यहाँ तो उस का पैसा बोलता है वहाँ देखेंगे वो क्या बोलता है तुम्हारे साथ उड़ाने बोलती है हमारे साथ पिंजरा बोलता है निगाहें करती रह जाती हैं हिज्जे वो जब चेहरे से इमला बोलता है मैं चुप रहता हूँ इतना बोल कर भी तू चुप रह कर भी कितना बोलता है मैं हर शाइ'र में ये भी देखता हूँ बिना माइक के वो क्या बोलता है

Fahmi Badayuni

40 likes

एक और शख़्स छोड़ कर चला गया तो क्या हुआ हमारे साथ कौन सा ये पहली मर्तबा हुआ अज़ल से इन हथेलियों में हिज्र की लकीर थी तुम्हारा दुख तो जैसे मेरे हाथ में बड़ा हुआ मेरे ख़िलाफ़ दुश्मनों की सफ़ में है वो और मैं बहुत बुरा लगूँगा उस पर तीर खींचता हुआ

Tehzeeb Hafi

183 likes

सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

140 likes

बात ऐसी है ऐसा था पहले दर्द होने पे रोता था पहले जैसे चाहे वो खेला करता था मैं किसी का खिलौना था पहले तुझ पे कितना भरोसा करता था ख़ुद पे कितना भरोसा था पहले आख़िरी रास्ते पे चलने को पैर उस ने उठाया था पहले अब तो तस्वीर तक नहीं बनती मैं तो पैकर बनाता था पहले रौशनी आई जब जला कोई सबकी आँखों पे पर्दा था पहले गिनती पीछे से की गई वरना मेरा नंबर तो पहला था पहले

Himanshi babra KATIB

45 likes

ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

102 likes

More from Majrooh Sultanpuri

जब हुआ इरफ़ाँ तो ग़म आराम-ए-जाँ बनता गया सोज़-ए-जानाँ दिल में सोज़-ए-दीगराँ बनता गया रफ़्ता रफ़्ता मुंक़लिब होती गई रस्म-ए-चमन धीरे धीरे नग़्मा-ए-दिल भी फ़ुग़ाँ बनता गया मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया मैं तो जब जानूँ कि भर दे साग़र-ए-हर-ख़ास-ओ-आम यूँँ तो जो आया वही पीर-ए-मुग़ाँ बनता गया जिस तरफ़ भी चल पड़े हम आबला-पायान-ए-शौक़ ख़ार से गुल और गुल से गुलसिताँ बनता गया शरह-ए-ग़म तो मुख़्तसर होती गई उस के हुज़ूर लफ़्ज़ जो मुँह से न निकला दास्ताँ बनता गया दहर में 'मजरूह' कोई जावेदाँ मज़मूँ कहाँ मैं जिसे छूता गया वो जावेदाँ बनता गया

Majrooh Sultanpuri

1 likes

यूँँ तो आपस में बिगड़ते हैं ख़फ़ा होते हैं मिलने वाले कहीं उल्फ़त में जुदा होते हैं हैं ज़माने में अजब चीज़ मोहब्बत वाले दर्द ख़ुद बनते हैं ख़ुद अपनी दवा होते हैं हाल-ए-दिल मुझ से न पूछो मिरी नज़रें देखो राज़ दिल के तो निगाहों से अदा होते हैं मिलने को यूँँ तो मिला करती हैं सब से आँखें दिल के आ जाने के अंदाज़ जुदा होते हैं ऐसे हंस हंस के न देखा करो सब की जानिब लोग ऐसी ही अदाओं पे फ़िदा होते हैं

Majrooh Sultanpuri

4 likes

आह-ए-जाँ-सोज़ की महरूमी-ए-तासीर न देख हो ही जाएगी कोई जीने की तदबीर न देख हादसे और भी गुज़रे तिरी उल्फ़त के सिवा हाँ मुझे देख मुझे अब मेरी तस्वीर न देख ये ज़रा दूर पे मंज़िल ये उजाला ये सुकूँ ख़्वाब को देख अभी ख़्वाब की ता'बीर न देख देख ज़िंदाँ से परे रंग-ए-चमन जोश-ए-बहार रक़्स करना है तो फिर पाँव की ज़ंजीर न देख कुछ भी हूँ फिर भी दुखे दिल की सदा हूँ नादाँ मेरी बातों को समझ तल्ख़ी-ए-तक़रीर न देख वही 'मजरूह' वही शाइर-ए-आवारा-मिज़ाज कोई उट्ठा है तिरी बज़्म से दिल-गीर न देख

Majrooh Sultanpuri

1 likes

मुझे सहल हो गईं मंज़िलें वो हवा के रुख़ भी बदल गए  तिरा हाथ हाथ में आ गया कि चराग़ राह में जल गए  वो लजाए मेरे सवाल पर कि उठा सके न झुका के सर  उड़ी ज़ुल्फ़ चेहरे पे इस तरह कि शबों के राज़ मचल गए  वही बात जो वो न कह सके मिरे शेर-ओ-नग़्मा में आ गई  वही लब न मैं जिन्हें छू सका क़दह-ए-शराब में ढल गए  वही आस्ताँ है वही जबीं वही अश्क है वही आस्तीं  दिल-ए-ज़ार तू भी बदल कहीं कि जहाँ के तौर बदल गए  तुझे चश्म-ए-मस्त पता भी है कि शबाब गर्मी-ए-बज़्म है  तुझे चश्म-ए-मस्त ख़बर भी है कि सब आबगीने पिघल गए  मिरे काम आ गईं आख़िरश यही काविशें यही गर्दिशें  बढ़ीं इस क़दर मिरी मंज़िलें कि क़दम के ख़ार निकल गए  वही आस्ताँ है वही जबीं वही अश्क है वही आस्तीं  दिल-ए-ज़ार तू भी बदल कहीं कि जहाँ के तौर बदल गए  तुझे चश्म-ए-मस्त पता भी है कि शबाब गर्मी-ए-बज़्म है  तुझे चश्म-ए-मस्त ख़बर भी है कि सब आबगीने पिघल गए  मिरे काम आ गईं आख़िरश यही काविशें यही गर्दिशें  बढ़ीं इस क़दर मिरी मंज़िलें कि क़दम के ख़ार निकल गए

Majrooh Sultanpuri

0 likes

हम को जुनूँ क्या सिखलाते हो हम थे परेशाँ तुम से ज़ियादा चाक किए हैं हम ने अज़ीज़ो चार गरेबाँ तुम से ज़ियादा चाक-ए-जिगर मोहताज-ए-रफ़ू है आज तो दामन सर्फ़-ए-लहू है इक मौसम था हम को रहा है शौक़-ए-बहाराँ तुम से ज़ियादा अहद-ए-वफ़ा यारों से निभाएँ नाज़-ए-हरीफ़ाँ हँस के उठाएँ जब हमें अरमाँ तुम से सिवा था अब हैं पशेमाँ तुम से ज़ियादा हम भी हमेशा क़त्ल हुए और तुम ने भी देखा दूर से लेकिन ये न समझना हम को हुआ है जान का नुक़साँ तुम से ज़ियादा जाओ तुम अपने बाम की ख़ातिर सारी लवें शम्ओं की कतर लो ज़ख़्म के मेहर-ओ-माह सलामत जश्न-ए-चराग़ाँ तुम से ज़ियादा देख के उलझन ज़ुल्फ़-ए-दोता की कैसे उलझ पड़ते हैं हवा से हम से सीखो हम को है यारो फ़िक्र-ए-निगाराँ तुम से ज़ियादा ज़ंजीर ओ दीवार ही देखी तुम ने तो 'मजरूह' मगर हम कूचा कूचा देख रहे हैं आलम-ए-ज़िंदाँ तुम से ज़ियादा

Majrooh Sultanpuri

1 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Majrooh Sultanpuri.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Majrooh Sultanpuri's ghazal.