ghazalKuch Alfaaz

मुझे सहल हो गईं मंज़िलें वो हवा के रुख़ भी बदल गए  तिरा हाथ हाथ में आ गया कि चराग़ राह में जल गए  वो लजाए मेरे सवाल पर कि उठा सके न झुका के सर  उड़ी ज़ुल्फ़ चेहरे पे इस तरह कि शबों के राज़ मचल गए  वही बात जो वो न कह सके मिरे शेर-ओ-नग़्मा में आ गई  वही लब न मैं जिन्हें छू सका क़दह-ए-शराब में ढल गए  वही आस्ताँ है वही जबीं वही अश्क है वही आस्तीं  दिल-ए-ज़ार तू भी बदल कहीं कि जहाँ के तौर बदल गए  तुझे चश्म-ए-मस्त पता भी है कि शबाब गर्मी-ए-बज़्म है  तुझे चश्म-ए-मस्त ख़बर भी है कि सब आबगीने पिघल गए  मिरे काम आ गईं आख़िरश यही काविशें यही गर्दिशें  बढ़ीं इस क़दर मिरी मंज़िलें कि क़दम के ख़ार निकल गए  वही आस्ताँ है वही जबीं वही अश्क है वही आस्तीं  दिल-ए-ज़ार तू भी बदल कहीं कि जहाँ के तौर बदल गए  तुझे चश्म-ए-मस्त पता भी है कि शबाब गर्मी-ए-बज़्म है  तुझे चश्म-ए-मस्त ख़बर भी है कि सब आबगीने पिघल गए  मिरे काम आ गईं आख़िरश यही काविशें यही गर्दिशें  बढ़ीं इस क़दर मिरी मंज़िलें कि क़दम के ख़ार निकल गए

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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मैं ने जो कुछ भी सोचा हुआ है, मैं वो वक़्त आने पे कर जाऊँगा तुम मुझे ज़हर लगते हो और मैं किसी दिन तुम्हें पी के मर जाऊँगा तू तो बीनाई है मेरी तेरे अलावा मुझे कुछ भी दिखता नहीं मैं ने तुझ को अगर तेरे घर पे उतारा तो मैं कैसे घर जाऊँगा चाहता हूँ तुम्हें और बहुत चाहता हूँ, तुम्हें ख़ुद भी मालूम है हाँ अगर मुझ सेे पूछा किसी ने तो मैं सीधा मुँह पर मुकर जाऊँगा तेरे दिल से तेरे शहर से तेरे घर से तेरी आँख से तेरे दर से तेरी गलियों से तेरे वतन से निकाला हुआ हूँ किधर जाऊँगा

Tehzeeb Hafi

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जब हुआ इरफ़ाँ तो ग़म आराम-ए-जाँ बनता गया सोज़-ए-जानाँ दिल में सोज़-ए-दीगराँ बनता गया रफ़्ता रफ़्ता मुंक़लिब होती गई रस्म-ए-चमन धीरे धीरे नग़्मा-ए-दिल भी फ़ुग़ाँ बनता गया मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया मैं तो जब जानूँ कि भर दे साग़र-ए-हर-ख़ास-ओ-आम यूँँ तो जो आया वही पीर-ए-मुग़ाँ बनता गया जिस तरफ़ भी चल पड़े हम आबला-पायान-ए-शौक़ ख़ार से गुल और गुल से गुलसिताँ बनता गया शरह-ए-ग़म तो मुख़्तसर होती गई उस के हुज़ूर लफ़्ज़ जो मुँह से न निकला दास्ताँ बनता गया दहर में 'मजरूह' कोई जावेदाँ मज़मूँ कहाँ मैं जिसे छूता गया वो जावेदाँ बनता गया

Majrooh Sultanpuri

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यूँँ तो आपस में बिगड़ते हैं ख़फ़ा होते हैं मिलने वाले कहीं उल्फ़त में जुदा होते हैं हैं ज़माने में अजब चीज़ मोहब्बत वाले दर्द ख़ुद बनते हैं ख़ुद अपनी दवा होते हैं हाल-ए-दिल मुझ से न पूछो मिरी नज़रें देखो राज़ दिल के तो निगाहों से अदा होते हैं मिलने को यूँँ तो मिला करती हैं सब से आँखें दिल के आ जाने के अंदाज़ जुदा होते हैं ऐसे हंस हंस के न देखा करो सब की जानिब लोग ऐसी ही अदाओं पे फ़िदा होते हैं

Majrooh Sultanpuri

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हम हैं मता-ए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह उठती है हर निगाह ख़रीदार की तरह इस कू-ए-तिश्नगी में बहुत है कि एक जाम हाथ आ गया है दौलत-ए-बेदार की तरह वो तो कहीं है और मगर दिल के आस-पास फिरती है कोई शय निगह-ए-यार की तरह सीधी है राह-ए-शौक़ पे यूँँही कहीं कहीं ख़म हो गई है गेसू-ए-दिलदार की तरह बे-तेशा-ए-नज़र न चलो राह-ए-रफ़्तगाँ हर नक़्श-ए-पा बुलंद है दीवार की तरह अब जा के कुछ खुला हुनर-ए-नाख़ून-ए-जुनूँ ज़ख़्म-ए-जिगर हुए लब-ओ-रुख़्सार की तरह 'मजरूह' लिख रहे हैं वो अहल-ए-वफ़ा का नाम हम भी खड़े हुए हैं गुनहगार की तरह

Majrooh Sultanpuri

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आह-ए-जाँ-सोज़ की महरूमी-ए-तासीर न देख हो ही जाएगी कोई जीने की तदबीर न देख हादसे और भी गुज़रे तिरी उल्फ़त के सिवा हाँ मुझे देख मुझे अब मेरी तस्वीर न देख ये ज़रा दूर पे मंज़िल ये उजाला ये सुकूँ ख़्वाब को देख अभी ख़्वाब की ता'बीर न देख देख ज़िंदाँ से परे रंग-ए-चमन जोश-ए-बहार रक़्स करना है तो फिर पाँव की ज़ंजीर न देख कुछ भी हूँ फिर भी दुखे दिल की सदा हूँ नादाँ मेरी बातों को समझ तल्ख़ी-ए-तक़रीर न देख वही 'मजरूह' वही शाइर-ए-आवारा-मिज़ाज कोई उट्ठा है तिरी बज़्म से दिल-गीर न देख

Majrooh Sultanpuri

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जला के मिश'अल-ए-जाँ हम जुनूँ-सिफ़ात चले जो घर को आग लगाए हमारे साथ चले दयार-ए-शाम नहीं मंज़िल-ए-सहर भी नहीं अजब नगर है यहाँ दिन चले न रात चले हमारे लब न सही वो दहान-ए-ज़ख़्म सही वहीं पहुँचती है यारो कहीं से बात चले सुतून-ए-दार पे रखते चलो सरों के चराग़ जहाँ तलक ये सितम की सियाह रात चले हुआ असीर कोई हम-नवा तो दूर तलक ब-पास-ए-तर्ज़-ए-नवा हम भी साथ साथ चले बचा के लाए हम ऐ यार फिर भी नक़्द-ए-वफ़ा अगरचे लुटते रहे रहज़नों के हाथ चले फिर आई फ़स्ल कि मानिंद बर्ग-ए-आवारा हमारे नाम गुलों के मुरासलात चले क़तार-ए-शीशा है या कारवान-ए-हम-सफ़राँ ख़िराम-ए-जाम है या जैसे काएनात चले भुला ही बैठे जब अहल-ए-हरम तो ऐ 'मजरूह' बग़ल में हम भी लिए इक सनम का हाथ चले

Majrooh Sultanpuri

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