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समुंदर उल्टा सीधा बोलता है सलीक़े से तो प्यासा बोलता है यहाँ तो उस का पैसा बोलता है वहाँ देखेंगे वो क्या बोलता है तुम्हारे साथ उड़ाने बोलती है हमारे साथ पिंजरा बोलता है निगाहें करती रह जाती हैं हिज्जे वो जब चेहरे से इमला बोलता है मैं चुप रहता हूँ इतना बोल कर भी तू चुप रह कर भी कितना बोलता है मैं हर शाइ'र में ये भी देखता हूँ बिना माइक के वो क्या बोलता है

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गाहे गाहे बस अब यही हो क्या तुम से मिल कर बहुत ख़ुशी हो क्या मिल रही हो बड़े तपाक के साथ मुझ को यकसर भुला चुकी हो क्या याद हैं अब भी अपने ख़्वाब तुम्हें मुझ से मिल कर उदास भी हो क्या बस मुझे यूँँही इक ख़याल आया सोचती हो तो सोचती हो क्या अब मिरी कोई ज़िंदगी ही नहीं अब भी तुम मेरी ज़िंदगी हो क्या क्या कहा इश्क़ जावेदानी है! आख़िरी बार मिल रही हो क्या हाँ फ़ज़ा याँ की सोई सोई सी है तो बहुत तेज़ रौशनी हो क्या मेरे सब तंज़ बे-असर ही रहे तुम बहुत दूर जा चुकी हो क्या दिल में अब सोज़-ए-इंतिज़ार नहीं शम-ए-उम्मीद बुझ गई हो क्या इस समुंदर पे तिश्ना-काम हूँ मैं बान तुम अब भी बह रही हो क्या

Jaun Elia

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महीनों बा'द दफ्तर आ रहे हैं हम एक सद में से बाहर आ रहे हैं तेरी बाहों से दिल उकता गया हैं अब इस झूले में चक्कर आ रहे हैं कहाँ सोया है चौकीदार मेरा ये कैसे लोग अंदर आ रहे हैं समुंदर कर चुका तस्लीम हम को खजाने ख़ुद ही ऊपर आ रहे हैं यही एक दिन बचा था देखने को उसे बस में बिठा कर आ रहे हैं

Tehzeeb Hafi

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मंज़िल पे न पहुँचे उसे रस्ता नहीं कहते दो चार क़दम चलने को चलना नहीं कहते इक हम हैं कि ग़ैरों को भी कह देते हैं अपना इक तुम हो कि अपनों को भी अपना नहीं कहते कम-हिम्मती ख़तरा है समुंदर के सफ़र में तूफ़ान को हम दोस्तो ख़तरा नहीं कहते बन जाए अगर बात तो सब कहते हैं क्या क्या और बात बिगड़ जाए तो क्या क्या नहीं कहते

Nawaz Deobandi

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चाँद को दामन में ला कर रख दिया उस ने मेरी गोद में सर रख दिया आँख में आँसू है किस के नाम के किस ने कश्ती में समुंदर रख दिया वो बताने लग गया मजबूरियाँ और फिर हम ने रिसीवर रख दिया

Zubair Ali Tabish

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सफ़र से लौट जाना चाहता है परिंदा आशियाना चाहता है कोई स्कूल की घंटी बजा दे ये बच्चा मुस्कुराना चाहता है उसे रिश्ते थमा देती है दुनिया जो दो पैसे कमाना चाहता है यहाँ साँसों के लाले पड़ रहे हैं वो पागल ज़हर खाना चाहता है जिसे भी डूबना हो डूब जाए समुंदर सूख जाना चाहता है हमारा हक़ दबा रक्खा है जिस ने सुना है हज को जाना चाहता है

Shakeel Jamali

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सहराओं ने माँगा पानी दरियाओं पर बरसा पानी बुनियादें कमज़ोर नहीं थीं दीवारों से आया पानी आख़िर किस किस नीम की जड़ में कब तक डालें मीठा पानी छत का हाल बता देता है परनाले से गिरता पानी फ़िक्र-ओ-मसाइल याद-ए-जानाँ गर्म हवाएँ ठंडा पानी प्यासे बच्चे खेल रहे हैं मछली मछली कितना पानी

Fahmi Badayuni

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चलती साँसों को जाम करने लगा वो नज़र से कलाम करने लगा रात फ़रहाद ख़्वाब में आया और फ़र्शी सलाम करने लगा फिर मैं ज़हरीले कार-ख़ानों में ज़िंदा रहने का काम करने लगा साफ़ इनकार कर नहीं पाया वो मिरा एहतिराम करने लगा लैला घर में सिलाई करने लगी क़ैस दिल्ली में काम करने लगा हिज्र के माल से दिल-ए-नादाँ वस्ल का इंतिज़ाम करने लगा

Fahmi Badayuni

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जब रेतीले हो जाते हैं पर्वत टीले हो जाते हैं तोड़े जाते हैं जो शीशे वो नोकीले हो जाते हैं बाग़ धुएँ में रहता है तो फल ज़हरीले हो जाते हैं नादारी में आग़ोशों के बंधन ढीले हो जाते हैं फूलों को सुर्ख़ी देने में पत्ते पीले हो जाते हैं

Fahmi Badayuni

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चारासाज़ों के बस की बात नहीं मैं दवाओं के बस की बात नहीं चाहता हूँ मैं दीमकों से नजात जो किताबों के बस की बात नहीं तेरी ख़ुशबू को क़ैद में रखना इत्रदानों के बस की बात नहीं ख़त्म कर दे अज़ाब क़ब्रों का ताज-महलों के बस की बात नहीं आँसुओं में जो झिलमिलाहट है वो सितारों के बस की बात नहीं ऐसा लगता है अब तेरा दीदार सिर्फ़ आँखों के बस की बात नहीं

Fahmi Badayuni

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नहीं हो तुम तो ऐसा लग रहा है कि जैसे शहर में कर्फ़्यूँँ लगा है मिरे साए में उस का नक़्श-ए-पा है बड़ा एहसान मुझ पर धूप का है कोई बर्बाद हो कर जा चुका है कोई बर्बाद होना चाहता है लहू आँखों में आ कर छुप गया है न जाने शहर-ए-दिल में क्या हुआ है कटी है उम्र बस ये सोचने में मिरे बारे में वो क्या सोचता है बराए नाम हैं उन से मरासिम बराए नाम जीना पड़ रहा है सितारे जगमगाते जा रहे हैं ख़ुदा अपना क़सीदा लिख रहा है गुलों की बातें छुप कर सुन रहा हूँ तुम्हारा ज़िक्र अच्छा लग रहा है

Fahmi Badayuni

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