हँसते हुए माँ-बाप की गाली नहीं खाते बच्चे हैं तो क्यूँँ शौक़ से मिट्टी नहीं खाते तुम से नहीं मिलने का इरादा तो है लेकिन तुम से न मिलेंगे ये क़सम भी नहीं खाते सो जाते हैं फ़ुटपाथ पे अख़बार बिछा कर मज़दूर कभी नींद की गोली नहीं खाते बच्चे भी ग़रीबी को समझने लगे शायद अब जाग भी जाते हैं तो सहरी नहीं खाते दावत तो बड़ी चीज़ है हम जैसे क़लंदर हर एक के पैसों की दवा भी नहीं खाते अल्लाह ग़रीबों का मदद-गार है 'राना' हम लोगों के बच्चे कभी सर्दी नहीं खाते
Related Ghazal
ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
355 likes
मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
456 likes
कभी मिलेंगे तो ये कर्ज़ भी उतारेंगे तुम्हारे चेहरे को पहरों तलक निहारेंगे ये क्या सितम कि खिलाड़ी बदल दिया उस ने हम इस उमीद पे बैठे थे हम ही हारेंगे हमारे बा'द तेरे इश्क़ में नए लड़के बदन तो चू मेंगे ज़ुल्फ़ें नहीं सँवारेंगे
Vikram Gaur Vairagi
70 likes
तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
235 likes
तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो
Jaun Elia
315 likes
More from Munawwar Rana
मुझ को गहराई में मिट्टी की उतर जाना है ज़िंदगी बाँध ले सामान-ए-सफ़र जाना है घर की दहलीज़ पे रौशन हैं वो बुझती आँखें मुझ को मत रोक मुझे लौट के घर जाना है मैं वो मेले में भटकता हुआ इक बच्चा हूँ जिस के माँ बाप को रोते हुए मर जाना है ज़िंदगी ताश के पत्तों की तरह है मेरी और पत्तों को बहर-हाल बिखर जाना है एक बे-नाम से रिश्ते की तमन्ना ले कर इस कबूतर को किसी छत पे उतर जाना है
Munawwar Rana
5 likes
छाँव मिल जाए तो कम दाम में बिक जाती है अब थकन थोड़े से आराम में बिक जाती है आप क्या मुझ को नवाज़ेंगे जनाब-ए-आली सल्तनत तक मिरे इनआ'म में बिक जाती है शे'र जैसा भी हो इस शहर में पढ़ सकते हो चाय जैसी भी हो आसाम में बिक जाती है वो सियासत का इलाक़ा है उधर मत जाना आबरू कूचा-ए-बद-नाम में बिक जाती है
Munawwar Rana
5 likes
किसी ग़रीब की बरसों की आरज़ू हो जाऊँ मैं इस सुरंग से निकलूँ तू आब-जू हो जाऊँ बड़ा हसीन तक़द्दुस है उस के चेहरे पर मैं उस की आँखों में झाँकूँ तो बा-वज़ू हो जाऊँ मुझे पता तो चले मुझ में ऐब हैं क्या क्या वो आइना है तो मैं उस के रू-ब-रू हो जाऊँ किसी तरह भी ये वीरानियाँ हों ख़त्म मिरी शराब-ख़ाने के अंदर की हाव-हू जाऊँ मिरी हथेली पे होंटों से ऐसी मोहर लगा कि उम्र-भर के लिए मैं भी सुर्ख़-रू हो जाऊँ कमी ज़रा सी भी मुझ में न कोई रह जाए अगर मैं ज़ख़्म की सूरत हूँ तो रफ़ू हो जाऊँ नए मिज़ाज के शहरों में जी नहीं लगता पुराने वक़्तों का फिर से मैं लखनऊ हो जाऊँ
Munawwar Rana
2 likes
घर में रहते हुए ग़ैरों की तरह होती हैं लड़कियाँ धान के पौदों की तरह होती हैं उड़ के इक रोज़ बहुत दूर चली जाती हैं घर की शाख़ों पे ये चिड़ियों की तरह होती हैं सहमी सहमी हुई रहती हैं मकान-ए-दिल में आरज़ूएँ भी ग़रीबों की तरह होती हैं टूट कर ये भी बिखर जाती हैं इक लम्हे में कुछ उमीदें भी घरोंदों की तरह होती हैं आप को देख के जिस वक़्त पलटती है नज़र मेरी आँखें मिरी आँखों की तरह होती हैं
Munawwar Rana
6 likes
ये दरवेशों की बस्ती है यहाँ ऐसा नहीं होगा लिबास-ए-ज़िंदगी फट जाएगा मैला नहीं होगा शेयर-बाज़ार में क़ीमत उछलती गिरती रहती है मगर ये ख़ून-ए-मुफ़्लिस है कभी महँगा नहीं होगा तिरे एहसास की ईंटें लगी हैं इस इमारत में हमारा घर तिरे घर से कभी ऊँचा नहीं होगा हमारी दोस्ती के बीच ख़ुद-ग़र्ज़ी भी शामिल है ये बे-मौसम का फल है ये बहुत मीठा नहीं होगा पुराने शहर के लोगों में इक रस्म-ए-मुरव्वत है हमारे पास आ जाओ कभी धोका नहीं होगा ये ऐसी चोट है जिस को हमेशा दुखते रहना है ये ऐसा ज़ख़्म है जो उम्र भर अच्छा नहीं होगा
Munawwar Rana
4 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Munawwar Rana.
Similar Moods
More moods that pair well with Munawwar Rana's ghazal.







