ghazalKuch Alfaaz

हँसते हुए माँ-बाप की गाली नहीं खाते बच्चे हैं तो क्यूँँ शौक़ से मिट्टी नहीं खाते तुम से नहीं मिलने का इरादा तो है लेकिन तुम से न मिलेंगे ये क़सम भी नहीं खाते सो जाते हैं फ़ुटपाथ पे अख़बार बिछा कर मज़दूर कभी नींद की गोली नहीं खाते बच्चे भी ग़रीबी को समझने लगे शायद अब जाग भी जाते हैं तो सहरी नहीं खाते दावत तो बड़ी चीज़ है हम जैसे क़लंदर हर एक के पैसों की दवा भी नहीं खाते अल्लाह ग़रीबों का मदद-गार है 'राना' हम लोगों के बच्चे कभी सर्दी नहीं खाते

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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कभी मिलेंगे तो ये कर्ज़ भी उतारेंगे तुम्हारे चेहरे को पहरों तलक निहारेंगे ये क्या सितम कि खिलाड़ी बदल दिया उस ने हम इस उमीद पे बैठे थे हम ही हारेंगे हमारे बा'द तेरे इश्क़ में नए लड़के बदन तो चू मेंगे ज़ुल्फ़ें नहीं सँवारेंगे

Vikram Gaur Vairagi

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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा

Hasan Abbasi

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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो

Jaun Elia

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मुझ को गहराई में मिट्टी की उतर जाना है ज़िंदगी बाँध ले सामान-ए-सफ़र जाना है घर की दहलीज़ पे रौशन हैं वो बुझती आँखें मुझ को मत रोक मुझे लौट के घर जाना है मैं वो मेले में भटकता हुआ इक बच्चा हूँ जिस के माँ बाप को रोते हुए मर जाना है ज़िंदगी ताश के पत्तों की तरह है मेरी और पत्तों को बहर-हाल बिखर जाना है एक बे-नाम से रिश्ते की तमन्ना ले कर इस कबूतर को किसी छत पे उतर जाना है

Munawwar Rana

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छाँव मिल जाए तो कम दाम में बिक जाती है अब थकन थोड़े से आराम में बिक जाती है आप क्या मुझ को नवाज़ेंगे जनाब-ए-आली सल्तनत तक मिरे इनआ'म में बिक जाती है शे'र जैसा भी हो इस शहर में पढ़ सकते हो चाय जैसी भी हो आसाम में बिक जाती है वो सियासत का इलाक़ा है उधर मत जाना आबरू कूचा-ए-बद-नाम में बिक जाती है

Munawwar Rana

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किसी ग़रीब की बरसों की आरज़ू हो जाऊँ मैं इस सुरंग से निकलूँ तू आब-जू हो जाऊँ बड़ा हसीन तक़द्दुस है उस के चेहरे पर मैं उस की आँखों में झाँकूँ तो बा-वज़ू हो जाऊँ मुझे पता तो चले मुझ में ऐब हैं क्या क्या वो आइना है तो मैं उस के रू-ब-रू हो जाऊँ किसी तरह भी ये वीरानियाँ हों ख़त्म मिरी शराब-ख़ाने के अंदर की हाव-हू जाऊँ मिरी हथेली पे होंटों से ऐसी मोहर लगा कि उम्र-भर के लिए मैं भी सुर्ख़-रू हो जाऊँ कमी ज़रा सी भी मुझ में न कोई रह जाए अगर मैं ज़ख़्म की सूरत हूँ तो रफ़ू हो जाऊँ नए मिज़ाज के शहरों में जी नहीं लगता पुराने वक़्तों का फिर से मैं लखनऊ हो जाऊँ

Munawwar Rana

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घर में रहते हुए ग़ैरों की तरह होती हैं लड़कियाँ धान के पौदों की तरह होती हैं उड़ के इक रोज़ बहुत दूर चली जाती हैं घर की शाख़ों पे ये चिड़ियों की तरह होती हैं सहमी सहमी हुई रहती हैं मकान-ए-दिल में आरज़ूएँ भी ग़रीबों की तरह होती हैं टूट कर ये भी बिखर जाती हैं इक लम्हे में कुछ उमीदें भी घरोंदों की तरह होती हैं आप को देख के जिस वक़्त पलटती है नज़र मेरी आँखें मिरी आँखों की तरह होती हैं

Munawwar Rana

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ये दरवेशों की बस्ती है यहाँ ऐसा नहीं होगा लिबास-ए-ज़िंदगी फट जाएगा मैला नहीं होगा शेयर-बाज़ार में क़ीमत उछलती गिरती रहती है मगर ये ख़ून-ए-मुफ़्लिस है कभी महँगा नहीं होगा तिरे एहसास की ईंटें लगी हैं इस इमारत में हमारा घर तिरे घर से कभी ऊँचा नहीं होगा हमारी दोस्ती के बीच ख़ुद-ग़र्ज़ी भी शामिल है ये बे-मौसम का फल है ये बहुत मीठा नहीं होगा पुराने शहर के लोगों में इक रस्म-ए-मुरव्वत है हमारे पास आ जाओ कभी धोका नहीं होगा ये ऐसी चोट है जिस को हमेशा दुखते रहना है ये ऐसा ज़ख़्म है जो उम्र भर अच्छा नहीं होगा

Munawwar Rana

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